त्याग और आध्यात्मिक शक्तियों से खुलता है सफलता का द्वार

Sunil Sharma

Publish: Dec, 08 2017 01:34:03 (IST)

Religion and Spirituality
त्याग और आध्यात्मिक शक्तियों से खुलता है सफलता का द्वार

स्वामी विवेकानंद कहते थे कि आत्मसंघर्ष से साधारण परिस्थितियों में असाधारण परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। रुको नहीं, थको नहीं....

तेजस्वी युवा का उत्साह उसके संकल्प की शक्ति में समाहित होता है। युवाओं के उत्साह से ही राष्ट्र तेजस्वी बनता है। भारतवर्ष एक शताब्दी से भी अधिक समय से स्वामी विवेकानंद के जीवन से प्रेरणा ले रहा है। उम्र तो शरीर की होती है। उम्र का असर आत्मा पर नहीं होता वह तो नित्य नवीन है। युवा नरेन्द्र का यही भावबोध मनुष्य मात्र को करुणा और सेवा के रास्ते शुभ की ओर गतिशील करता है। नया विचार, नई योजना और नया संकल्प जीवन को फिर से ऊर्जावान बना देता है। परम्परा को पोषित करने और आधुनिकता को स्वीकारने के लिए इसी ऊर्जा की आवश्यकता है। जीवन के सभी क्षेत्रों में अराजकता को दूर धकेलने का लक्ष्य मनुष्यता को चुनौती दे रहा है। जो भी मानव इस चुनौती को स्वीकार करता है वही युवा है। यह सभ्यता की निरंतरता को बनाए रखने की चुनौती है और इसके लिए उत्सर्ग अपेक्षित है।

त्याग की राह पर चलने की शिक्षा
मनुष्य का विवेक तीर के अग्रभाग के समान तीक्ष्ण होना चाहिए। विवेकवान संकल्प ही राष्ट्र को गति प्रदान करता है। आज का भारत युवाओं का भारत है और यह शक्ति भारत को विश्व में अद्वितीय बना देती है। लोकतांत्रिक समाज में कत्र्तव्य पालन के प्रत्येक संदर्भ को कानून और संविधान के प्रावधानों के घेरे में लेना कोई कारगर उपाय नहीं है। युवाशक्ति के पास प्रेरित करने वाले आदर्श हैं।

विवेकानंद ने आध्यात्मिक चेतना को प्राथमिकता दी है। चेतना का यह मार्ग उत्सर्ग की मांग करता है। जो त्याग कर सकता है वह ही इस मार्ग का पथिक है। उन्होंने त्याग के मार्ग पर चलने वाले को ‘वेदशीर्ष’ कहा है। आज की परिस्थितियों में परिवर्तन की गति बहुत तीव्र है। इस तीव्रता में दिशाबोध को बनाए रखना कठिन है। पथ प्रदर्शक के रूप में विवेकानंद का जीवन दर्शन और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है।

विपरीत समय और परिस्थितियों में उन्होंने आत्मा की तेजस्विता को प्राप्त करने की शिक्षा दी है। एक बेहतर कम्युनिकेटर, प्रबंधन गुरु , आध्यात्मिक गुरु, वेदांतों का भाष्य करने वाला संन्यासी, धार्मिकता और आधुनिकता को साधने वाला साधक, अंतिम व्यक्ति की पीड़ा और उसके संघर्षों में उसके साथ खड़ा सेवक, देशप्रेमी, कुशल संगठनकर्ता, लेखक-संपादक, आदर्श शिष्य जैसी न जाने कितनी छवियां स्वामी विवेकानंद से जुड़ी हैं। किंतु हर छवि में वे अव्वल नजर आते हैं।

आत्मानुभूति का भाव बनाता है श्रेष्ठ
स दियों पुरानी सभ्यता का युवा ऋषि हमें आत्म स्वरूप की अनुभूति का ही संदेश देता है। वे कहते हैं सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति सर्वत्र उदार होता है। आज के समय में हमें उदारमना मनुष्यों की ही आवश्यकता है। उदारता से वैमनस्य का शमन होता है। आत्मानुभूति हमें किसी भी क्षण शक्तिहीन नहीं रहने देती। आत्मानुभूति का अनुशासन मनुष्य को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर बनाता है। चेतना सर्वोपरि है और जो चैतन्य है वह दैन्य नहीं हो सकता। दीनता कायरता है। मनोवेगों की गुलामी से ही शक्ति का अपव्यय होता है। प्रकृति और नियति युवावस्था के उद्दाम संकल्पों की नित्य सहचरी है। अथक और अनवरत परिश्रम ने ही सभ्यता के सुंदरतम सपनों का सच कर दिखाया है।

विवेकानंद का पत्र साहित्य हमारी राष्ट्रीय संस्कृति की अनुपम निधि है। जो नई पीढ़ी को धर्म, दर्शन, संस्कृति, शिक्षा, समाज और राष्ट्र निर्माण स्फूर्तिदाई संदेश देते हैं। निडरता और साहसी कार्यों की और उन्मुख करते हैं। उन्होंने बार-बार कर्मरूपी यज्ञ की अग्नि को प्रज्वलित करने का संकल्प दिलाया है। उनके विचार और आचरण का अनुकरण करते हुए निरंतर कर्म करते रहना चाहिए। स्वामी विवेकानंद कहते थे कि आत्मसंघर्ष से साधारण परिस्थितियों में असाधारण परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। मानव सभ्यता और भारतवर्ष का भविष्य युवाशक्ति और उसके विवेक सम्मत व्यवहार और सम्यक लक्ष्य पर निर्भर है।

दिशाहीन गति को पहचानें
विवेकानंद के शब्दों में अथक प्रयत्न करने वाला युवा हर युग की चुनौतियों का सामना कर सकता है। अप्रासंगिक विचार मस्तिष्क को पंगु बना देते हैं। उस युवा तपस्वी ने विचारों की जड़ता और आचरण के आलस्य को दूर करने का आह्वान किया। उन्होंने युवाओं से तेजस्वी मन के साथ सुदृढ़ शरीर की अपेक्षा की। वे मानते थे कि युवक का शरीर इस्पात की तरह मजबूत होना चाहिए। विश्व सभ्यता और संस्कृति के रथ को मजबूत कंधे ही गति दे सकते हैं। आलस्य शरीर को दीमक की तरह जर्जर बना देता है।

बीमार शरीर में ना उत्साह होता है और ना ही विवेकपूर्ण निर्णय लेने का सामथ्र्य। भौतिकता की चकाचौंध ने उपलब्धियों की अंधी दौड़ शुरु कर दी है। युवक इसी बाधादौड़ के मोह में है। दौड़ के समाप्त होने से पहले ही जीवन का प्रयोजन समाप्त हो जाता है। विवेकानंद की शिक्षाएं और उनका व्यक्तित्व विराट दायित्व का बोध कराता है। दिशाहीन गति मनुष्य को दायित्वहीन जीवन की ओर ले जा रही है। युवा आंदोलन प्रतिक्रिया में उलझ गया है। समय प्रतिक्रिया का नहीं पहल का है। बीड़ा उठाने का है।

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