त्याग के साथ जीना ही जीवन की सर्वोत्तम कला

प्रेम और कृतज्ञता एक जोड़ी हैं, प्रसन्नता और सद्भाव उनकी संतान हैं

प्रेम और कृतज्ञता एक जोड़ी हैं, प्रसन्नता और सद्भाव उनकी संतान हैं। यदि अहंकार के कारण आपको लगता है कि वह तो आपका अधिकार था तो आप आभारी महसूस करने में सफल ही नहीं हो पाएंगे।

ईशावास्योपनिषद के अनुसार त्यागते हुए जीना ही जीवन की सर्वोत्तम कला है। इस समाज से अर्जित किया जाए तो उसका समाज के हित में विसर्जन भी किया जाए, तभी भोग और त्याग का सम्यक संतुलन बन पाएगा। जीवन को सुखद बनाने के लिए शास्त्रों में कई सूत्र भी बताए गए हैं-

पहला सूत्र: आलोचना मुक्त रहिए
दू सरों के आचार-विचार को लेकर या तो हम आलोचक बन जाते हैं या फिर न्यायाधीश जैसी भूमिका निभाने लगते हैं। कौन क्या कर रहा है? कैसे कर रहा है? क्या ऐसा करना उसके अधिकार सीमाओं में है? जबरदस्ती ऐसे विचारों में हम खोए रहते हैं। ऐसी सोच से हम जितना जल्दी मुक्त होंगे, स्वयं को उतना जल्दी ही लक्ष्य के निकट पाएंगे।  बुराई की मानसिकता से आप खुद हमेशा अशांत, बैचेन बने रहेंगे। ऐसी स्थिति आपको अपने लक्ष्य से भटका देगी। आपकी योग्यता को आप सबसे अच्छी तरह से जानते हैं। किंतु दूसरों की आलोचना में मानसिक शक्ति गंवाने से आप अपनी काबिलियत का पूरा उपयोग नहीं कर पाते। इससे मिली असफलता आपका आत्मविश्वास कम करती है। बुराई का स्वभाव लोगों की नजर में आपकी छवि खराब करता है।

दूसरा सूत्र : चित्त शुद्ध और मन निर्मल रहे
जीवन को वास्तविक अंदाज में जीने के लिए स्वयं को कपट से मुक्त रखें, पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह से दूर रहकर ही  जिंदगी की सच्चाई का सामना किया जा सकता है। महान कवि टेनिसन कहते थे कि मुझमें दस जनों की ताकत है क्योंकि मेरा हृदय पवित्र है। रामचरित्र मानस में भी गोस्वामी तुलसी दास ने भगवान श्रीराम के श्रीमुख से कहलवाया है कि मुझे निर्मल मन वाले लोग पसन्द है। छल कपट रखने वाले जन मुझे नहीं सुहाते।

निर्मल मन-जन सो मोहे पावा,
मोहे कपट छल छिद्र न भावा।

केवल भगवान ही नहीं आम इंसान भी निश्छल व्यक्ति से ही दोस्ती पसन्द करेगा। जीवन को सुखमय बनाने के लिए जो जैसा है वैसा ही दिखे और रहे तो भी जिंदगी को एक अलग अंदाज से जिया जा सकता है।

तीसरा सूत्र  : काम में हो कुशलता
कुशलता है जीवन को निखारने की कला, जिसके लिए ग्र्रंथों में लिखा भी गया है। योग: कर्मसु कौशलम्। हम क्या करते हैं ये महत्त्वपूर्ण नहीं है, महत्त्वपूर्ण यह है कि हम वह काम कितने मनोयोग से करते हैं? जुलाहे के रूप में कपड़ा बुनने के बाद कबीर उसे हाट में ले जाते। कोई ग्राहक पसंद कर लेता तो बड़े खुश होते। आज तो रामजी को मेरा बुना हुआ वस्त्र पसंद आया। वे ग्राहक में रामजी को देखते। अपने रामजी को राजी करने के लिए वे बड़ी लगन और तन्मयता से कपड़े बुनते थे। हम प्रतिदिन छोटे से छोटे काम भी कुशलता से करेंगे तो जीवन में सफलता के नए आयाम स्पर्श कर पाएंगे।

चौथा सूत्र : उत्साह के साथ काम  

धैर्य धारण करते हुए मन में जोशभर कर यदि काम किए जाएं तो परिणाम अच्छे आते हैं। मन में भरपूर जोश हो परन्तु होश कायम रखते हुए। अगर यह सोच लें कि आज हमारी जिंदगी का आखिरी दिन है तो सर्वोच्च प्राथमिकता से हम अच्छे अच्छे काम करेंगे। हमें उत्साह पूर्वक जीना चाहिए, इस महामंत्र को यदि अच्छी प्रकार सीख लें तो आपको धन की कमी, साधनों का अभाव, कुछ भी यह कुछ भी परेशान करने वाले नहीं। आपके हृदय में उत्साह का बल होना चाहिए। यह बल आप पा गए तो आप सदैव प्रसन्नता से आत्म-विभोर बने रहेंगे।

 पांचवां और अंतिम सूत्र : कृतज्ञता

ह म अपने जीवन में जो कुछ मिला है उसके लिए ईश्वर के प्रति, परिवार के प्रति, समाज और राष्ट्र प्रति कृतज्ञ बनें। कृतज्ञता के बिना कोई आदमी धार्मिक नहीं हो सकता। अकृतज्ञ मनुष्य क्या धार्मिक होंगे? कृतज्ञता को अनुभव करें, आप हैरान हो जाएंगे। प्रेम और कृतज्ञता एक जोड़ी है, प्रसन्नता और सद्भाव उनकी संतान हैं। यदि अहंकार या अज्ञान के कारण आपको यह प्रतीत होता है कि वह तो आप का अधिकार था तो आप आभारी महसूस करने में सफल ही नहीं हो पाएंगे। इससे आपको न प्रसन्नता मिलेगी, न शांति और आनंद का अनुभव होगा।
सुनील शर्मा
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