आध्यात्मिक गुलामी से मुक्ति ही है परम आनंद का आधार

Sunil Sharma

Publish: Aug, 23 2017 03:02:00 PM (IST)

धर्म और आध्यात्मिकता
आध्यात्मिक गुलामी से मुक्ति ही है परम आनंद का आधार

मन और विचारों से मुक्त होने के साथ भावनात्मक तौर पर मुक्त होना बेहद आवश्यक है।

जीवन के परम आनंद को जानने के लिए व्यक्ति को आध्यात्मिक गुलामी से मुक्त होना चाहिए। उसके लिए व्यक्ति कई परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। इसके लिए बाहरी आवरण के साथ-साथ ही आंतरिक रूप से भी मुक्त होना चाहिए। मन से मुक्त हुए बगैर परमानंद को प्राप्त नहीं किया जा सकता है। परमानंद की प्राप्ति के लिए हमें आध्यात्मिक बंधनों से भी दूर होना होगा। आध्यात्मिक बंधन यानी हमारी चेतना पर पड़ा अहंकार का मोटा आवरण।

शरीर के मालिक बन करें इंद्रियों पर राज
विज्ञान ने संतुलन की एक छठी इंद्री की खोज की है ‘सेंस ऑफ बैलेंस ऑर्गन’। यह इंद्री कान में छुपी है और इसलिए बाहर से इसका पता नहीं चलता। इसी इंद्री के कारण, नशे की स्थिति में शरीर का संतुलन खो जाता है। हमारी कर्मेंद्रियां यानी हाथ-पैर हमारी सातवीं इंद्री है। प्रकृति ने ये सातों इन्द्रियां हमें इनका उपयोग करने के लिए दी थीं, लेकिन स्थिति उलट गई है। इन इंद्रियों ने ही हमें गुलाम बना लिया है। अगर शरीर मालिक हो जाए और आत्मा इंद्रियों के आदेश का पालन करे तो आत्मा गुलाम हो जाती है। शरीर की वास्तविक स्वतंत्रता वह है जब आत्मा मालिक हो और वही इंद्रियों का उपयोग करे।

मन के बंधन से मुक्त होने पर आनंद ही आनंद
आज विज्ञापन हमारे अवचेतन का हिस्सा बन गए हैं और जो विज्ञापनदाता बोलता है, वही हमारी भाषा हो गई है। ऐसे ही जिन्हें हम वैज्ञानिक कहते हैं, वे भी अपने विषय क्षेत्र के ज्ञान के कारागृह में बंद हैं। मुश्किल यह है कि बड़े समझदार लोग भी इस कारागृह को ही अपना घर समझने लगे हैं। अपने को विचारशील-बुद्धिजीवी कहने वाला भी वास्तव में विचारपूर्वक, विवेकपूर्ण तरीके से नहीं जीता। यह मानसिक परतंत्रता है। सच्चाई यही है कि जब तक मन की आजादी नहीं मिलेगी तब तक मानसिक आनंद का भी एहसास नहीं होगा।

स्मृतियों, कल्पनाओं और आशाओं से मुक्ति
अतीत में हमने जो जाना वह हमारी ‘मेमोरी’ बनकर मौजूद है और हम उसके कटघरे में बन्द हैं। वही स्मृतियां निर्देशित करती हैं कि हमें क्या करना चाहिए, क्या नहीं। स्मृति की गुलामी के कारण ही आप महानगर में रह रहे कवि को गांव के गुण गाते देखेंगे। अपने छोटे-छोटे स्वप्न को साकार करने के लिए व्यक्ति जीवन को न्योछावर कर देता है और जीवन के बड़े सुख लेने से वंचित रह जाता है। ऐसे ही हम आशा के सहारे जिए चले जाते हैं और हममें से अधिकतर अंतत: निराशा के शिकार होकर अवसाद में चले जाते हैं। ये तीनों जंजीरें भी मन के तल पर हैं।

अहंकारमुक्त जीवन है जीने का मूलमंत्र
शरीर, मन और हृदय के तल पर जो ये सात-सात बिंदु हैं, इन्हीं का समेकित नाम है अहंकार। इन तीनों की गुलामी से चेतना की मुक्ति हो जाए तो व्यक्ति अहंकार से मुक्त होता है और वही आध्यात्मिक स्वतंत्रता है। हम चार तल पर जीते हैं, शरीर, मन, हृदय और आत्मा। आत्मा केंद्र में है और स्वतंत्र है किंतु उसके ऊपर शरीर, मन और हृदय रूपी जो परिधियां हैं, वे जंजीरों की तरह हैं। शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक गुलामी के रूप में जो आंतरिक दासता है, उसकी पहचान से ही मुक्ति का ख्याल आएगा। अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानो, अपनी द्रष्टा आत्मा को जानो। यह भी समझ लें कि न तो कोई व्यक्ति सौ फीसदी परतंत्र होता है न स्वतंत्र। हम हम बाहरी जगत में केवल परस्पर निर्भर हो सकते हैं। अहंकार मुक्त और परस्पर निर्भर जीवन से ही हमारी चेतना पूर्ण स्वतंत्र होती है और उसी अवस्था को महावीर ‘मोक्ष’ बुद्ध ‘निर्वाण’ उपनिषद के ऋषि ‘कैवल्य’ और ईसा मसीह ‘प्रभु का राज्य’ कहते हैं। नाम कुछ भी दो, वही स्थिति आध्यात्मिक जीवन का असली लक्ष्य है क्योंकि वही वास्तविक स्वतंत्रता है। इसी स्वतंत्रता के साथ जीना ही असल मुक्ति और परमानंद की प्राप्ति भी है।

काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईष्र्या, द्वेष और भय से मुक्ति ही भावनात्मक स्वतंत्रता
हृदय यानी भावनाओं के जगत की गुलामी मन से भी गहरी होती है। यदि व्यक्ति मन और विचारों से स्वतंत्र हो भी जाए किंतु भावनात्मक स्तर पर स्वतंत्र न हो सके तो यह दीए तले अंधेरे जैसा होगा। भावनात्मक परतंत्रता से मुक्त हुए बगैर हमारा वास्तविक स्वरूप प्रकट हो ही नहीं सकता। काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईष्र्या, द्वेष और भय हमारी भावनात्मक परतंत्रता है जिनके साथ हम मन से भी अधिक गहराई से बंधे हुए हैं। मन की जंजीरों से मुक्त होने का तो खयाल कभी आ भी सकता है लेकिन ये सप्तरिपु हमें इतने गहरे जकड़े हुए हैं कि हमें खयाल भी नहीं आता कि हम इनके गुलाम है। इतनी तरह की गुलामियों में जी रहा व्यक्ति वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र नहीं कहा जा सकता। जिस दिन आपके भीतर इसको लेकर एक दिव्य असंतोष पैदा होगा, आपके प्राण बेचैनी से भर जाएंगे।

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