दुख होने पर अपने विश्वसनीय से करें ये बात तो दूर हो जाएगी हर परेशानी

Sunil Sharma

Publish: Aug, 29 2017 04:39:00 (IST)

Religion and Spirituality
दुख होने पर अपने विश्वसनीय से करें ये बात तो दूर हो जाएगी हर परेशानी

दुविधा या दु:ख के क्षण जब प्रबल होते हैं तब मनुष्य यदि अपने विचारों को किसी से साझा नहीं करे तो अवसाद उसे घेरने लगता है

अवसाद, तनाव जैसे भारी शब्दों को मात देने का केवल एक ही उपचार है संवाद यानी बातचीत। विचारों को साझा करना दु:खों को कम करने के समान है।

महाभारत के मैदान में जब महान धनुर्धर अर्जुन ने शत्रु सेना में अपने गुरु, पितामह और चचेरे भाइयों को देखा तो उन्हें इस दुविधा ने घेर लिया कि यदि राज्य प्राप्ति के लिए अपने इन आत्मीयजनों से ही युद्ध करना पड़े तो ऐसी विजय किस काम की? इस दुविधा के चलते अर्जुन कुछ क्षणों के लिए मानसिक अवसाद का शिकार हो गए। श्रीकृष्ण ने अर्जुन की मानसिकता को पहचानते हुए संवाद किया और ज्ञान दिया कि तू शास्त्रविहित कर्म कर क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। उसके बाद अर्जुन मिसाल बन गए। कहते हैं कि दुविधा या दु:ख के क्षण जब प्रबल होते हैं तब मनुष्य यदि अपने विचारों को किसी से साझा नहीं करे तो अवसाद उसे घेरने लगता है। कई बार व्यक्ति जब अपने मन की बात किसी से साझा नहीं कर सकता तो एकाकीपन में चला जाता है और यह स्थिति अवसाद को जन्म देने लगती है।

संवाद की पहल पर अवसाद दम तोड़ देता है...
जैन आगम में एक कथा है। प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव के सौ पुत्र थे। ऋषभदेव की दीक्षा के बाद उनका राज्य पुत्रों में बराबर बांट दिया गया। सबसे बड़े पुत्र भरत की चक्रवर्ती सम्राट बनने की इच्छा हुई। सभी भाइयों ने अपना राज्य उन्हें सौंप दिया लेकिन बाहुबली नामक पुत्र ने कहा कि उन्हें युद्ध करना होगा। युद्ध में हालांकि विजय बाहुबली की हुई लेकिन उनके मन में वैराग्य जाग गया और वह सारा राजपाट भरत के हवाले कर तपस्या करने चल दिए। बाहुबली के मन में यह कसक थी कि वो जिस धरती पर तपस्या कर रहे हैं, वह धरती तो चक्रवर्ती भरत की है। भरत को जब यह बात पता चली तो वो बाहुबली के दर्शन के लिए गए और पूजन करने के बाद बोले कि यह धरती किसी की नहीं है हम सब तो एक दिन चले जाएंगे, धरती यहीं रहेगी। इसके बाद बाहुबली को दिव्यज्ञान प्राप्त हो गया। भरत ने संवाद की पहल की तो दुविधा के रूप में पनपते अवसाद ने वहीं दम तोड़ दिया।

पात्र व्यक्ति का करें चयन
अपने दु:ख, अपने दर्द या अपनी दुविधा के बारे में किसी व्यक्ति से बात करने के पहले यह अवश्य सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि जिस व्यक्ति से हम अपनी दुविधा साझा कर रहे हैं, वह उस विश्वास का वास्तविक पात्र है या नहीं। कई बार ऐसा भी होता है कि लोग हमारी पीड़ा के बारे में जानकर उससे उबरने में हमारी वास्तविक मदद करने की अपेक्षा उपहास का विषय बना देते हैं। एक बार अपने आप से भी अपनी दुविधा के बारे में चर्चा कर लेनी चाहिए। वास्तविक दिशा निर्देश तो व्यक्ति के अंतस का आलोक ही करता है।

स्वयं का हो आत्मावलोकन
किसी दार्शनिक ने कहा है कि व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम एक बार अपने आप से बात अवश्य करनी चाहिए। स्वयं का आत्मावलोकन करें। यानी हम अपनी कमजोरियों, अपनी सामथ्र्य और लक्ष्य की दिशा में किए जा रहे अपने सभी प्रयासों का अपने आप के सम्मुख ईमानदारी से आकलन करें। हमें यदि अपनी कमजोरियों, अपनी सामथ्र्य और अपने द्वारा किए गए परिश्रम की ईमानदार जानकारी है तो फिर अभाव हमें प्रेरणा देंगे और उपलब्धियां विनयशील बनाएंगी।

सार्थक संवाद देता है दिशा
कुछ मनोवैज्ञानिक तो यहां तक कहते हैं कि यदि किसी के पास ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिससे वो अपने मन की बात कह सके तो उसे चाहिए कि आइने के सामने खड़ा होकर या अपना कमरा बंद करके मन की भड़ास निकाल ले और जो भड़ास निकालना है, यह भी संवाद का एक उग्र रूप है। इसके बाद भी मन को कुछ सार्थक दिशा में सोचने की प्रेरणा मिलती है क्योंकि भड़ास को निकालने के बाद हमें इस बात का अहसास हो जाता है कि हम सार्थक संवादों के माध्यम से ही सही दिशा को प्राप्त कर सकते हैं।

सुख-दु:ख करते रहें आपस में साझा
कई सर्वेक्षणों और अनुसंधानों के अनुसार अवसाद वर्ष 2030 तक दुनिया की सबसे भयावह बीमारी बन जाएगा। हर साल दुनियाभर में होने वाली मौतों का एक बड़ा कारण अवसाद होता है। अधिकांश मामलों में यह पाया गया है कि प्रभावित पक्षों में से किसी भी एक पक्ष द्वारा यदि संवाद की पहल कर दी गई होती तो हताशा के उन समस्याओं का हल निकाला जा सकता था, जिसके कारण अवसाद ने जन्म लिया। शायद यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘हताशा के खिलाफ संवाद’ को इस वर्ष की थीम चुना है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यदि व्यक्ति अपने मन की दुविधा या दु:ख को किसी के साथ साझा कर ले तो उस घुटन से बाहर आ सकता है, जो घुटन उसे अनेक मानसिक और आत्मिक व्याधियों का शिकार बनाती है।

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