स्पंदन - मन

स्पंदन - मन

Shri Gulab Kothari | Publish: Mar, 02 2019 04:22:06 PM (IST) | Updated: Mar, 02 2019 04:22:07 PM (IST) धर्म और आध्यात्मिकता

त्रिगुण माया का स्वरूप है। प्रकृति है। सृष्टि का व्यवहार है। इसके चंगुल से निकलने के लिए इसको समझना पड़ेगा। जीवन व्यवहार में मन की चंचलता का आधार भी माया ही है। मन, प्राण और वाक् अविनाभाव में साथ रहते हैं।

मन प्रतिपल पैदा होता रहता है, मरता रहता है। मन इच्छा से पैदा होता है। इच्छा मन का बीज रूप है। इच्छा पूर्ण होते ही मन भर जाता है। शुद्ध मन आत्मा-स्वरूप है जो सब प्राणियों में एक-सा होता है। जिस मन का हमें आभास होता है, वह त्रिगुण के आवरण में ढका हुआ मन है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य इस आवरण को हटाकर शुद्ध मन को समझना ही है। इसे ब्रह्म स्वरूप कह सकते हैं।

ध्यान के मार्ग
त्रिगुण माया का स्वरूप है। प्रकृति है। सृष्टि का व्यवहार है। इसके चंगुल से निकलने के लिए इसको समझना पड़ेगा। जीवन व्यवहार में मन की चंचलता का आधार भी माया ही है। मन, प्राण और वाक् अविनाभाव में साथ रहते हैं। मन के धरातल तक पहुंचने के लिए वाक् का आधार और प्राणों का प्रणनन चाहिए। शरीर और बुद्धि को मन की ओर मोडऩा होगा। अवधान, धारणा और ध्यान इसके मार्ग हैं। मन को किसी वस्तु अथवा विषय की ओर आकर्षित करना अवधान है। विषय पर एकाग्र होने को धारणा कहते हैं। एकाग्रता की निरन्तरता ही ध्यान है जो समाधि में बदल जाती है।

प्रश्न आता है कि अवधान किसका करें? एकाग्रता का विषय क्या हो? मन की क्षमताओं को समझकर उन्हें विकसित करना ही इसका लक्ष्य होना चाहिए। क्योंकि मन में उठने वाली इच्छाओं को समझना और उनका बुद्धि से नियंत्रण करना ही इसका उद्देश्य होना चाहिए। मन इन्द्रियों का राजा है। हर इन्द्रिय से होने वाले सभी अनुभव मन तक पहुंचते हैं। यह अनुभव बाह्य सृष्टि के भी हो सकते हैं और भीतर के भी। मन विषय को कितना पकड़ पाता है, कितनी देर तक पकड़ पाता है, यह उसकी क्षमता पर निर्भर है। एक बार में एक विषय पर टिकता है अथवा अनेक विषयों पर कार्य कर सकता है, यह उसकी एक क्षमता है। एक चावल को देखकर पूरे का अनुमान लगा ले, यह भी उसकी क्षमता पर निर्भर करता है। सम्प्रेषण की शक्ति उसकी सबसे बड़ी क्षमता है। सम्प्रेषण में स्थान की दूरी तथा मध्य के जो अवरोध बाधक होते हैं वे उसके समाप्त हो जाते हैं। यह मन की बहुत बड़ी क्षमता है। दूरियों को समेट कर चलना भी मन की क्षमता है। आप कितनी भी दूर बैठे व्यक्ति तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं। मन का आत्मोन्मुखी होना इसकी प्राकृतिक क्षमता है। मूल स्वरूप है-जहां से पैदा हुआ, वहीं समा जाना। शरीर और इन्द्रियों को स्वयं में समेटते हुए अन्तर्मुखी हो जाना।

मन को समझना
इस जगत् में हम जीते हैं, केवल मन की इच्छाओं को पूरा करने के लिए। शरीर और बुद्धि उपकरण की तरह इसमें सहायक होते हैं। मन हमारी भावनाओं का धरातल है। सुख और दु:ख की अनुभूति का धरातल है। आदान-प्रदान का धरातल है। जीवन व्यवहार में तो मन ही सब का धरातल है। हमें इस मन को समझना है, इसमें उठने वाली तरंगों को देखना है, उन्हें शान्त करना है। तभी तो हम शान्त होंगे। मन तो विकल्पों का केन्द्र है। जब भी किसी विषय पर एकाग्र होने का प्रयास करते हैं, तो अनेक व्यवधान आने लगते हैं। मन एक विषय पर टिकता ही नहीं। जीवन विकास के लिए आवश्यक है-मन की क्षमताओं का विकास, नियंत्रण का विकास।

हम एक आसन में बैठें, शान्त जगह पर। शरीर को ढीला छोड़ दें। लम्बा श्वास लें और श्वास को देखें। कुछ क्षण रोककर भीतर की हलचल को भी देखें। श्वास छोड़ें और श्वास को ही देखते रहें। विचारों के विकल्प उठेंगे, आप चिन्ता न करें, किसी भी विचार को रोकने का प्रयास न करें। कई प्रकार के चित्र उभरेंगे, उन्हें आने दें, जाने दें। रोकने का प्रयास न करें। धीरे-धीरे श्वास पर ध्यान केन्द्रित करने का अभ्यास बढ़ाते जाएं। विचारों का क्रम अपने आप टूटने लगेगा।

खबरें और लेख पड़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते है । हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते है ।
OK
Ad Block is Banned