स्पंदन - संयम

स्पंदन - संयम

जीवन के अनेक आयाम हैं, अत: संयम के भी अनेक आयाम हैं। फिर भी मूलरूप से संयम व्यक्ति से शुरू होता है और पूरे देश पर लागू होता है। संयम एक तप है, एक संकल्प है, एक साधना है।

सुखी जीवन का सूत्र है-सन्तुलन, यम, नियम। स्वतन्त्र होना ही इसके मूल में है। व्यक्ति इससे दीर्घजीवी बनता है, क्योंकि ऐसा करने से जीवन शक्तियों का अपव्यय नहीं होता। समाज का व्यवहार, धार्मिक सिद्धान्त, परम्पराएं आदि का यदि आकलन किया जाए तो संयम बरतने के अनेक उदाहरण सामने आएंगे। चूंकि, जीवन के अनेक आयाम हैं, अत: संयम के भी अनेक आयाम हैं। फिर भी मूलरूप से संयम व्यक्ति से शुरू होता है और पूरे देश पर लागू होता है। संयम एक तप है, एक संकल्प है, एक साधना है। बिना संकल्प के साधना नहीं हो सकती, त्याग नहीं हो सकता तथा अभ्यास नहीं हो सकता। व्यक्ति गलतियों का पुतला है, सदा कुछ न कुछ गलती करता रहता है। संयम का अभ्यास उसके कार्यों को नियंत्रण में रखता है।

मनुष्य का मन स्वभाव से चञ्चल है, वह बदलता रहता है। संयम इस मन के लिए अंकुश का कार्य करता है। इसी प्रकार मनुष्य की बुद्धि तर्क-वितर्क-कुतर्क में भटकाती है। संयम से बुद्धि में विवेक की प्रधानता आती है। व्यक्ति की जीवनचर्या भी भौतिक सुख की दौड़ में अनेक प्रकार की विसंगतियों से घिरी रहती है। खान-पान और दिनचर्या का अधिकतर भाग आज विकृति की राह चल पड़ा है। अनेक कष्टप्रद रोग मानव को झेलने पड़ रहे हैं। संयम व्यक्ति को प्रकृति के अनुकूल जीने के लिए प्रेरित करता है तो स्वस्थ जीवन का मार्ग भी प्रशस्त करता है।

जीव सदा अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश जैसे पञ्च क्लेशों से जुड़ा रहता है। प्रकृति स्वाभाविक रूप से अपना कार्य करती है, इसका विरोध नहीं किया जा सकता। वृत्तियां सात्विक बनी रहें तथा राजस और तामस के योग से क्षिप्त, मूढ़ और विक्षिप्त न हों, यह केवल संयम से ही सम्भव है। हमारे शास्त्र इन नकारात्मक वृत्तियों को निरोधावस्था में लाने के लिए ही लिखे गए हैं।

अपने इष्ट के चिन्तन को अभ्यास कहते हैं। कुछ लोग लौकिक सुख की प्राप्ति के लिए अभ्यास करते हैं, कुछ वैराग्य की प्राप्ति के लिए। अभ्यास हमारा कर्तव्य बन जाता है, क्योंकि वह हमें इष्ट के रूप में स्वयं में प्रवृत्त करता है, अत: स्थाई फल देने वाला होता है। हमें संयम के लिए प्रेरित करता है। अभ्यास और वैराग्य से मिलकर हमारी वृत्तियां अनुकूल बनती हैं।

शरीर का संयम
सर्वप्रथम शरीर का संयम आवश्यक है। यदि शरीर चञ्चल है तो मन टिक नहीं सकता। आप एक स्थान पर शान्त होकर बैठ जाएं और कुछ चिन्तन शुरू कर दें। किसी कारण से यदि शरीर की हलचल बनी रहती है तो आप विषय पर एकाग्र नहीं हो पाएंगे। कभी भूख-प्यास लगने लगे, कभी विसर्जन के लिए उठना पड़े, कभी पांव थक जाएं। शरीर संयम हमारा प्रथम सोपान है। इसके लिए शुरुआत मिताहार से होती है। लाघव अभीष्ट होता है। आहार नियमन ही अन्नमय शरीर को स्वस्थ रख सकता है। तप में उपवास का महत्त्व है, भूख-प्यास पर विजय प्राप्त कर लेना। चर्बी का कम होना श्वास-संस्थान का कार्य सुगम करता है, रक्ïतसंचार के अवरोध घटाता है, शक्तियों का अपव्यय रोकता है।

इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर का संयम विकसित किया जाता है। सूक्ष्म शरीर का संचालन हमारा प्राण संस्थान करता है। इसके लिए प्राणायाम का विधान है। स्थूल शरीर के संयम के बिना प्राणायाम सम्भव नहीं होता। प्राणायाम से हमारे नाड़ी संïस्थान और स्नायु-संस्थान शक्ïित प्राप्त करते हैं, विकसित होते हैं। अनेक सुप्त शक्तियों को प्राणायाम से जागृत किया जाता है। व्यक्ति अनेक असाध्य रोगों से स्वत: ही मुक्त हो जाता है। उसकी ऊर्जा बढऩे लगती है, चेहरा ओजस्वी दिखाई पड़ता है। चूंकि प्राण संïस्थान हमारे स्थूल और कारण शरीर के मध्य सेतु का कार्य करता है, अत: प्राणों का नियमन इन दोनों शरीरों के बीच एक सन्तुलन स्थापित करता है। कोई भी व्याधि हो, पहले कारण शरीर में पहुंचती है। प्राण शरीर के माध्यम से वह समय के साथ स्थूल शरीर में प्रकट होती है। हमारा स्थूल शरीर हमारे कारण शरीर की ही अभिव्यक्ति तो है। शक्तियों का ग्रहण और विसर्जन दोनों ही कार्य प्राण-शक्तियों द्वारा निष्पादित होते हैं। इस दृष्टि से प्राण संयम के महत्व को आसानी से समझा जा सकता है।

मन का संयम
इसी क्रम में मन का संयम आवश्यक होता है। मन एक ओर चञ्चल है तो वहीं दूसरी ओर हमारे आत्मा का प्रतिनिधि भी है। मन- इच्छित जो भी कार्य हम करते हैं, उनके परिणाम से ही हमारी जीवन-यात्रा बनती है। शरीर और प्राणों का संयम हो जाने के बाद स्वत: ही व्यक्ति का ध्यान मन की ओर चला जाता हैै। मन की वृत्तियों का नियमन ही जीवन को उत्कृष्टता प्रदान करता है।

मन के नाना रूप हैं, नाना रूप व्यवहार हैं। मन इन्द्रियों का राजा है। मर्जी हुई तो योग में चला गया, मर्जी हुई तो भोग में लिप्त हो गया। किन्तु, स्वस्थ मन राग-द्वेष से मुक्त होता है, ऊध्र्वगामी होता है, सकारात्मक भाव लिए होता है, मैत्री-प्रधान होता है।

मन को समझना आवश्यक है। मन अनेक स्मृतियों में खोया रहता है। अनेक प्रतिक्रियाएं मन में चलती रहती हैं। उसी के अनुरूप अनेक योजनाएं मन बनाता रहता है। इसी प्रकार भावी जीवन की कई कल्पनाएं मन को घेरे रहती हैं।

अहंकार इनमें सर्वोपरि होता है। व्यक्ति का मन कभी भी खाली दिखाई नहीं पड़ता, शान्त नहीं रहता। सदा सुख की तलाश में दु:खी नजर आता है। अत: मन का संयम आवश्यक है। हमारा सुख-शान्ति का लक्ष्य इसी से पूर्णत: प्राप्त हो सकता है। मन का संयम करने के लिए स्वाध्याय की आवश्यकता होती है। इष्ट के प्रति समर्पण की आवश्यकता होती है, ताकि मन का अहंकार गल जाए, ध्यान की पृष्ठभूमि तैयार हो सके, व्यक्ति स्वयं का आकलन कर सके और उसी के अनुरूप स्वयं को अभिव्यक्त कर सके।

मन को संयमित करने के लिए विवेक की भी आवश्यकता है। बुद्धि के संयम की भी आवश्यकता है। बुद्धि की एकाग्रता का अभ्यास विवेकपूर्ण विचारों से ही सम्भव है। ज्ञानार्जन, गुरुकृपा और प्रभुकृपा भी उतना ही बड़ा प्रभाव रखते हैं। इन सबके लिए पहली आवश्यकता है उचित वातावरण की। उसी से बुद्धि और मन की दिशा तय होती है। प्रेरणा बनी रहती है, आस्था बलवान होती है और अन्तत: संयम का मार्ग प्रशस्त होता है।

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