स्पंदन - विवेक

स्पंदन - विवेक

अशिक्षित तो आज भी सोच-समझकर कार्य करता है, किन्तु जिसे हम शिक्षित कह रहे हैं, वह सोचना चाहता भी नहीं, सोचना जानता भी नहीं। वस्तुत: उसका दोष नहीं है। शिक्षा जीने के लिए तो काम आती ही नहीं है।

व्यक्ति अपने सुख और स्वार्थ के अनुसार ही प्रत्येक कार्य सोच-विचार कर करता है। सही समझ कर ही करता है। ऐसे कम लोग होते हैं जो जानबूझकर गलत कार्य करते हैं। किन्तु, आज की परिस्थिति में विशेष अन्तर आ रहा है। जहां व्यक्ति को सही और गलत का भेद ही दिखाई नहीं पड़ता। उसके चारों ओर एक वातावरण बन रहा है, जिसके अनुसार ही वह जीता है। वर्तमान शिक्षा ने उसके व्यवहार का विवेक छीन लिया है।

शिक्षा का उद्देश्य
शिक्षा का उद्देश्य ही ज्ञान है। ज्ञान विवेक का जनक है। विवेक सही-गलत में भेद करना सिखाता है। आज सब कुछ उलटा होता दिखाई पड़ रहा है। अशिक्षित तो आज भी सोच-समझकर कार्य करता है, किन्तु जिसे हम शिक्षित कह रहे हैं, वह सोचना चाहता भी नहीं, सोचना जानता भी नहीं। वस्तुत: उसका दोष नहीं है। शिक्षा जीने के लिए तो काम आती ही नहीं है। मात्र नौकरी के उद्देश्य से ली जाती है। ज्ञान से इसका वास्ता ही नहीं है। आज की शिक्षा प्रणाली में भारतीयता भी दिखाई नहीं पड़ती। हमारा दर्शन, हमारी परम्पराएं, जीवन-व्यवहार के विभिन्न पक्ष आदि सब-कुछ लुप्त हो गए हैं।

नई पीढ़ी को तो आज के वातावरण ने यहां तक प्रभावित कर दिया है कि वह भारतीय संस्कृति से दूर भागने लगी है। हर भारतीय परम्परा को वह रुढि़ कहकर एक ओर सरका देती है। जबकि पाश्चात्य संस्कृति से वह तुरन्त प्रभावित हो जाती है। सामाजिक शिक्षा का दूसरा कार्य आज टेलीविजन कर रहा है। जीवन की जो छवि टेलीविजन प्रस्तुत करता है, वह तो इतनी भयावह है कि सभी निरुत्तर हैं। टेलीविजन विज्ञापनों के जरिए एक धीमा विष दर्शकों के मानस पटल पर छोड़ता जा रहा है। नई उपभोक्ïता वस्तुओं की विभिन्न श्रेणियां आज टेलीविजन के प्रभाव से ही बाजार में छा रही हैं। बच्चा भी विज्ञापन देखकर जिद करता है, गृहिणी खरीद की सूची में नित नए परिवर्तन कर रही है। उधार पर मिलने की नई-नई नीतियों ने अग्रिम खरीद का सपना दिखाया और किस्तें बांध लीं। पूरी वेतन-राशि किस्तों में जाने लगी।

बदलती प्राथमिकताएं
जीवन-व्यवहार में आज इतने परिवर्तन आ रहे हैं कि व्यक्ïित का सोच कहीं दिखाई ही नहीं देता। उसकी प्राथमिकताएं इतनी तेजी से बदल रही हैं कि उसको इसका आभास तक नहीं होता। एक ओर वह सुख-सुविधाओं की ओर भाग रहा है, तो दूसरी ओर तैयार माल की ओर। चाहे इसके लिए उसे कितनी ही कीमत चुकानी पड़े।

अपने इसी विवेक का शिकार आज हर व्यक्ति होने लगा है। नई शिक्षा ने उसे विवेकहीन बना दिया है। वह न तो शरीर के बारे में जानता है, न प्रकृति के बारे में। न ही जीवन व्यवहार में वह दक्ष है। किताबें और टेलीविजन आज उसके एकमात्र मार्गदर्शक हैं। वह विवेक के धरातल पर पराधीन हो गया है। क्या खाना है और क्या खा रहा है उसे यह भी सही पता नहीं। उसके मन में एक इच्छा है तो विकासवादी दिखाई पडऩे की, इसीलिए सबसे पहले वह भारतीय जीवन-व्यवहार को छोड़ता है।

आज किसी शहरी बच्चे को चमड़े के जूते पहनने की बात कहो, उसे लगेगा कि वह महाभारत काल में चला जाएगा। चाहे उसके पांव से बदबू आए अथवा नेत्रज्योति घटे, उसे तो आधुनिक और भारी महंगे ‘स्पोट्र्स-शू’ ही पहनने हैं। किसी माता से कहें कि वह बच्चे की आंखों में काजल डाले, तो वह बिगड़ सकती है क्योंकि काजल आज अवैज्ञानिक और हानिकारक माना जाता है। बड़ी उम्र के लोग आज रूखी चपातियां खाते नजर आते हैं। चर्बी बढऩे का डर है। पहले बुजुर्गों के लिए अलग से घी और मेवा डालकर सर्दियों में लड्डू बनते थे, ताकि शरीर चलता रहे। जीवन के हर पहलू में विवेक आवश्यक है। हमें समय के साथ बदलना तो चाहिए, किन्तु हर चीज नहीं बदल सकती। जो शाश्ïवत है, वह शाश्ïवत ही रहेगा। आवरण और परिधि के विषय एवं उनका स्वरूप बदल सकता है। कटोरी में न खाकर चम्मच-प्लेट में खा सकते हैं लेकिन खाद्य में रूपान्तरण नहीं होगा। शाश्ïवत को बचाने और बनाए रखने का कार्य विवेकपूर्ण चिन्तन से ही सम्भव है।

स्व-विवेक से निर्णय
स्वयं का ज्ञान नहीं होने के कारण हर क्षेत्र में पराधीन होना स्वाभाविक ही है। हर छोटी-बड़ी तकलीफ में उसे डॉक्टर की शरण लेनी है क्योंकि घर में काम आने वाले नुस्खे उसे ज्ञात नहीं हैं। खान-पान की नई संस्कृति ने उसके जीवन में कितने विष घोल दिए, उसे पता ही नहीं। कितन ही नए रोग विश्ïव में प्रकट हो गए हैं फिर भी उसे तथाकथित विकासवादी दृष्ïिटकोण उसे जकड़े हुए है। उसका स्व-विवेक मानो खो गया है। जीवन में सलाहकार मिलते रहेंगे; उनकी कोई कमी नहीं है। हम हर सलाह को काम में लेने लग जाते हैं, केवल इसलिए कि हम समझ नहीं पाते कि हमारे लिए क्या उचित है। आप सलाह ले सकते हैं, निर्णय स्व-विवेक से होना चाहिए।

हम उन किताबों से प्रभावित हैं, जो हम पढ़ चुके हैं। टेलीविजन से प्रतिदिन नया प्रभाव लेकर उठते हैं। उन पर विचार करने की क्षमता हम में नहीं है। विज्ञान के नाम पर हमने अनेक नई धारणाएं विकसित कर ली हैं जो हमारे लिए हितकारी नहीं हैं। सिर्फ इसलिए कि हमारा विवेक शान्त बैठ गया है। जीवन के गुण-दोष का विवेचन हम नहीं कर पाते। हमारा आत्मविश्ïवास भी कमजोर पड़ गया है। इसीलिए नौकरी के लिए भागते हैं, व्यवसाय नहीं करना चाहते। अपने जीवन को एक ऐसे ताने-बाने में बुनकर बैठ जाते हैं, जिसको हम स्वयं नहीं समझते। हमारी पहली आवश्यकता है कि हम अपने जीवन को समझें, आवश्यकताओं का आकलन करें, सुख को भी परिभाषित करें, व्यवहार की मर्यादा का ध्यान रखें, दूसरों के प्रति संवेदनशील बनें ताकि अनुकूल-प्रतिकूल बातों का विश्ïलेषण कर सकें।

इन सबके लिए विवेक जाग्रत होना आवश्यक है। आज नई पीढ़ी को भारतीय दर्शन से जोड़े रखना भी अपने आप में बहुत बड़ा कार्य है। आखिर, हमारे देश का भविष्य इसी के साथ तो जुड़ा है।

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