भगवान विष्णु के माया में फंस गए थे नारद जी, बनना पड़ा था बंदर!

भगवान विष्णु के माया में फंस गए थे नारद जी, बनना पड़ा था बंदर!

भगवान विषणु के माया में फंस गए थे नारद जी, बनना पड़ा था बंदर!

एक बार की बात है जब देवर्षि नारद को अपनी तपस्या पर घमंड हो गया था। कथा के अनुसार, कहा जाता है कि जब नारद जी तपस्या कर रहे थे तो कोई भी उनकी तपस्या भंग नहीं कर पाया तो उन्होंने सबसे पहले अपने पिता ब्रह्मा जी के पास गए और तपस्या सफल होने की जानकारी दी। उसके बाद नारद जी भगवान शंकर के पास गए और उन्हें भी तपस्या पूर्ण होने की जानकारी दी।

इसके बाद भगवान शंकर को लग गया कि नारद जी को अपनी तपस्या का घमंड हो गया है। तब उन्होंने कहा कि देवर्षि नारद इस बात की जानकारी भगवान विष्णु को मत देना। लेकिन मना करने के बावजूद नारद जी भगवान विष्णु के पास गए तपस्या के बारे में जानकारी दी। इसके बाद भगवान विष्णु को लग गया कि नारद जी को कामदेव को जीतने का घमंड हो गया है। इसके बाद उन्होंने सोचा कि अब नारद जी का घमंड तोड़ना ही होगा।

इसके बाद भगवान विष्णु ने माया रची और माता लक्ष्मी को विश्वमोहिनी का रूप धारण करने को कहा। जब नारदी जा रहे थे तो उन्हें रास्ते में एक बड़ा राज्य दिखाई दिया। जहां पर उन्होंने देखा कि धूम-धाम से समारोह मनाया जा रहा है। वहां के राजा शीलनिधि ने अपनी पुत्री विश्वमोहिनी का स्वयंवर रचाया था। सब कुछ जान कर नारद जी भी वहां पहुंचे। वहां नारद जी आदर- सत्कार हुआ। उसके बाद राजा ने अपनी पुत्री का भविष्य पूछा। इस पर देवर्षि ने कहा कि विश्वमोहिनी का पति काफी भाग्यशाली और त्रिलोक का स्वामी होगा।

इसके बाद विश्वमोहिनी के रूप और गुण से मोहित होकर नारद जी भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उनसे प्रार्थना किया कि उन्हें ऐसा सुंदर रूप प्रदार करें कि विश्वमोहिनी स्वयंबर में उनका वरण कर ले। इस पर भगवान विष्णु ने देवर्षि का मुख बंदर का बना दिया और शरीर मनुष्य का ही रहने दिया। इसका आभास नारद जी को नहीं हुआ।

उसके बाद नारद जी शीलनिधि के दरबार में पहुंचे और विश्वमोहिनी के सामने जाकर खड़े हुए ताकि उनके गले में वह वरमाला डाल दे। वहां पर भगवान शिव के दो गण भी मौजूद थे। जब उन्होंने बंदर रूप वाले नारद जी को देखा तो दोनों उनका उपहास करने लगे। कुछ समय पश्चात भगवान विष्णु स्वयं में प्रकट हुए और विश्वमोहिनी ने उनके गले में वरमाला डाल दी। उसके भगवान विष्णु विश्वमोहिनी को लेकर चले गए।

इस पर देवर्षि नारद आश्चर्य चकित हो गए और दरबार में उपस्थि अन्य लोगों को निहारा, इस पर शिवगणों ने उनको अपना मुख दर्पण में देखने को कहा। जब नारद जी ने दर्पण को देखा तो अपना मुख बंदर का पाया। इस पर नारद जी क्रोधित हो गए और भगवान विष्णु का श्राप दिया कि तू भी पत्नी के वियोग में इधर-उधर भटकेगा और यही बंदर तेरी सहायता करेंगे।

इसके बाद भगवान विष्णु ने माया हटा ली। माया के हटते ही नारद जी चैतन्य हो गए और उन्हें खुद पर फश्चाताप होने लगा। नारद जी श्राप पर बहुत शर्मिन्दा हुए। उसके बाद भगवान विष्णु ने उनका श्राप सत्य होने का वचन दिया। कहा जाता है कि नारद जी के श्राप के कारण ही त्रेतायुग में विष्णु अवतार भगवान राम पत्नी सीता के वियोग में जंगल-जंगल भटके थे।

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