उषा-४

Shri Gulab Kothari

Publish: Sep, 10 2017 01:24:00 (IST)

Religion and Spirituality
उषा-४

वेद की भाषा से संकेत मिलता है कि सूर्य दिव्य ज्योति देने वाली शक्ति का प्रतीक है और स्व: दिव्य सत्य का लोक है

वेद की भाषा से संकेत मिलता है कि सूर्य दिव्य ज्योति देने वाली शक्ति का प्रतीक है और स्व: दिव्य सत्य का लोक है। इस दिव्य सत्य की विजय ही ऋषियों का वास्तविक लक्ष्य और उनके सूक्तों का मुख्य विषय है।’ वामदेव सूक्त (४.१६.४) में इन्द्र से कहा है कि ‘जब प्रकाश के सूक्तों द्वारा स्व: सदृश्य रूप में पा लिया गया और उन अङ्गिराओं ने रात्रि में से महान ज्योति को चमकाया तब इन्द्र ने अन्धकार के सब बन्धनों को ढीला कर दिया ताकि मनुष्य अच्छी तरह देख सके।’

यह स्व: यज्ञ के द्वारा मिलता है। यही हमारी जीवन यात्रा का अन्त है। यह आनन्द का लोक है। यह आनन्द ज्योति के उदय होने से मिलता है। अङ्गिरस इसे इच्छुक मानवता के लिए तब पा लेते हैं, जब वे सूर्य, उषा और दिन को प्रकट कर लेते हैं।

स्व: किसी अन्धकार के कारण हमारी दृष्टि से ओझल है। इसे पाना तभी संभव है जब उषा का जन्म हो, सूर्य का उदय हो और सूर्य की गौएं अपनी गुप्त गुहा से बाहर आएं।
वेद स्पष्ट रूप से कहता है कि गौएं ज्योति हैं। वह बाड़ा जिसमें वे छिपी हुई हैं अन्धकार है। ऋ. (१.९२.४) में है-‘उषा ने गौ के बाड़े की तरह अन्धकार को खोल दिया।’

एक स्पष्ट कथन और मिलता है कि ९-१० महीने बैठ चुकने के बाद ही अङ्गिरस ऋषियों को खोया हुआ प्रकाश और खोया हुआ सूर्य फिर से मिला। ‘हमारे पितरों ने छिपी हुई ज्योति को ढूंढक़र पा लिया। उनके विचार में जो सत्य था उसके द्वारा उन्होंने उषा को जन्म दिया।७.७६.४’

प्रकृत यज्ञ
व्यवहार में भी सूर्य ८-१० घण्टे रात्रि के अन्धकार में छिपा ही रहता है। भौगोलिक स्थितियों के कारण यह समय अवधि कम या अधिक हो सकती है। इसी प्रकार सम्वत्सर के वर्षाकाल में भी देव सो जाया करते हैं। एक निश्चित अवधि के बाद ही इनका जागरण होता है। इसका भी विज्ञान भाव समानार्थक ही है। जहां अन्धकार है वहां अप् है, सोम का बाहुल्य है। आसुरी प्राणों का साम्राज्य होता है। दिखाई कुछ देता नहीं है। सूर्य का दक्षिणायन काल भी सम्वत्सर का रात्रि काल ही कहलाता है। यज्ञ की पूर्णता सदा अग्नि के बाहुल्य से ही सम्भव है। रात्रिकाल प्रकृत यज्ञ में बाधक बनता है। उषा इस काल की समाप्ति की शुभ सूचना है। प्रकृत यज्ञ का शुभारम्भ ही नवनिर्माण का मार्ग प्रशस्त करता है। सूर्य स्वयं ही इन्द्र है। वही अन्धकार के वृत्तासुर का वध करके उषा को प्रकट करता है।

व्यक्ति अन्धकार से डरता है, जहां आसुरी शक्तियां बलवान रहती हैं। उषा का प्रकाश जीवन में नई आशा और प्रेरणा का संचार करता है।

महर्षि अरविन्द की दृष्टि वेद के प्रतीकों को समझने में, उषा की व्याख्या में महत्वपूर्ण है। हमारे सामने अश्विनों को कहा गया प्रस्कण्व काण्व का सूक्त (१.४६) है जिसमें उस ज्योतिर्मय अन्त:प्रेरणा का संकेत है जो हमें अन्धकार में से पार कराके दूसरे किनारे पर पहुंचा देती है। इस सूक्त का उषा और रात्रि के वैदिक विचार के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसमें वेद में नियत रूप से आने वाले बहुत से अलंकारों का संकेत मिलता है, जैसे ऋत् के मार्ग का, नदियों को पार करने का, सूर्य के उदय होने का, उषा और अश्विनों में परस्पर सम्बन्ध का, सोम-रस के रहस्यमय प्रभाव का और उसके सामुद्रिक रस का।

एषो उषा अपूव्र्या व्युच्छति प्रिया दिव:।
स्तेषु वामश्विना बृहत् ॥
देखो, आकाश में उषा खिल रही है, जिससे अधिक उच्च और कोई वस्तु नहीं है, जो आनन्द से भरी हुई है। हे अश्विनों! मैं तुम्हारी महान् स्तुति करता हूं।
या न: पीपरदश्विना ज्योतिष्मती तमस्तिर:।
तामस्मे रासाथामिषम् ॥
हे अश्विनों! हमें वह ज्योतिष्मती अन्त:प्रेरणा दो, जो हमें तमस् से निकालकर पार पहुंचा दे।

इससे स्पष्ट है कि इन सूक्तों में उषा सत्य को लाने वाली के रूप में आती है, स्वयं वह सत्य की ज्योति से जगमगाने वाली है। वह दिव्य उषा है और यह भौतिक उषा (प्रभात होना) उसकी केवल छायामात्र है और प्राकृतिक जगत् में उसका प्रतीक है।

सत्-*****त्
चारों वेद ऋक्-यजु:-साम-अथर्व ही तत्त्ववेद रूप अग्नि-वायु-आदित्य-सोम रूप हैं। चूंकि अन्न रूप अथर्व या सोम अग्नित्रयी में आहुत हो जाता है, अत: अग्नि ही मुख्य रहता है। पार्थिव भूताग्नि को ही वसु कहते हैं। हमारे शरीर में यही भूताग्नि वैश्वानर अग्नि कहलाता है। इसमें तीनों अग्नि-वायु-आदित्य अग्नियों का योग है। इसकी व्याप्ति पृथ्वी-अन्तरिक्ष-द्यु लोक में रहती है। आदित्य का योग उषा की किरणों से प्रभावी होता है। इसके पूर्व तो सम्पूर्ण अन्तरिक्ष रात्रि के अन्धकार में डूबा रहता है।

इस अन्धकार के लिए ही कहा जाता है कि ‘जब कुछ न था, तो क्या था? विश्व के पहले क्या था?’ श्रुति कहती है-‘*****त्’ था। *****त् भावार्थक या तत्त्वात्मक है। ‘क्या स्वरूप था, उस *****त् का?’ उत्तर दिया-‘ऋषि ही *****त् तत्त्व था। प्राण तत्त्व ही ऋषि था।’ प्राणवान् वस्तु को सत् कहते हैं। ‘इसे प्राण ऋषि क्यों कहा?’ उत्तर था- प्राण तत्त्व ही सृष्टि कामना से गतिशील होता है। पं. मोतीलाल शास्त्री लिखते हैं कि जिस सम्वत्सर के आधार पर अग्निसोम विद्या प्रतिष्ठित है, वह सौर-चन्द्र-पार्थिव रूप से तीन भागों में विभक्त हो गया है।

श्रुति कहती है कि सत्य अग्नि और सत्य सोम से सृष्टि नहीं होती। सूर्य-पृथ्वी आदि सत्याग्नि पिण्ड तथा चन्द्रमा-शुक्रादि सत्य सोम पिण्ड हैं। इनके पृथक् होने वाले ही ऋत अग्नि-सोम होंगे। इन्हीं से सृष्टि होती है। ऋत् अग्नि दक्षिण से उत्तर की ओर बहता है। ऋत् सोम उत्तर से दक्षिण की ओर, अग्नि में आहुत होता जाता है। यही सम्वत्सर यज्ञ है। पार्थिव प्रजा का उपादान कारण है। इस यज्ञ का परिणाम ‘ऋतु’ कहलाता है। वर्ष की सभी छह ऋतुएं क्रमश: इसी यज्ञ से पैदा होती हैं।

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