उषा-2

Shri Gulab Kothari

Publish: Aug, 27 2017 03:49:00 (IST)

Religion and Spirituality
उषा-2

बात उषा की हो रही है, तब उसके चारों ओर भी देखना पड़ेगा। उषा कोई एकल तत्त्व नहीं है

बात उषा की हो रही है, तब उसके चारों ओर भी देखना पड़ेगा। उषा कोई एकल तत्त्व नहीं है। सृष्टि के प्रत्येक कर्म में सभी तत्त्व सम्मिलित रहते हैं। प्रलयकाल में जब सृष्टि लुप्त हो जाती है तब भी सभी तत्त्व वहां रहते ही हैं। परमेष्ठी, क्षीरसागर रहता है, विष्णु रहते हैं, लक्ष्मी, नारद, ब्रह्मा, ऋषि प्राण आदि रहते हैं। हां, स्वरूप बदला हुआ होगा। इसी प्रकार उषा के साथ प्रकाश, किरणें, ताप, सूर्य, आकाश, परमेष्ठी, जल, गायत्री, सावित्री, सविता, आदित्य (वरुण-मित्र-भग-अर्यमा आदि), असुर, अन्धकार जैसे सभी तत्त्व तो रहेंगे ही। उनका वर्णन प्रतीक रूप में ही होगा। वेद काव्यात्मक शैली में रचे गए हैं। हमें इन मन्त्रों को खोलना पड़ेगा तथा मूल आध्यात्मिक दृष्टि से ही खोलना पड़ेगा। कई बार स्थूल अर्थ स्पष्ट दिखाई दे जाते हैं, तब लगता है कि बात तो बहुत सरल ही है।

सावित्री
उषा सूर्य के उस प्रकाश का नाम है जो सूर्य के पहले दिखाई पड़ता है। प्रकाश जब अन्धकार को तोडक़र बाहर आता है तो एक बिन्दु पर पहले बारहवां आदित्य प्रकाशित होता है, फिर ग्यारहवां, दसवां.. अन्त में सूर्य पिण्ड उस बिन्दु से गुजरता है। उस बिन्दु का तापमान क्रमश: बढ़ता है और आर्द्रता क्रमश: घटती जाती है। इसी क्रम में वहां गायत्री के पांच मुंह, पचरंगा प्रकाश दिखाई देता है। सूर्य पृथ्वी से नीचा रहता है, तब उसका प्रकाश पहले अन्तरिक्ष में जाता है। वहां से टकराकर परोक्ष भाव में पृथ्वी पर पहुंचता है। सूर्योदय के बाद प्रकाश सीधा पृथ्वी पर आने लगता है। इस प्रकाश को अब सावित्री कहने लगते हैं।

पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्यौ नामक तीन लोक हैं। वैदिक परिभाषा में इनको तीन विश्व मानते हैं। इन तीनों में क्रमश: ऋक्-यजु:-सामात्मक अग्नि-वायु-आदित्य नामक तीन अग्नियां प्रतिष्ठित हैं और नर-नायक-अधिष्ठाता है। भू: पहला विश्व पृथिवी है, भुव: अन्तरिक्ष तथा तीसरा द्यौ स्व: है। स्व: लोक सूर्य का लोक है। इन तीनों नरों के यजन या संयोग से तापधर्मा अग्नि पैदा होता है, जिसको वैश्वानर कहा जाता है। पं. मोतीलाल शास्त्री ने लिखा है, ‘त्रिलोकी में जो अस्फुट ध्वनि प्रतिष्ठित है, जो नाद की उत्तर अवस्था मानी गई है और शब्द की जननी है, वही वैश्वानर है।’ यही ‘अग्निर्वाग् भूत्वा मुखं प्राविशत्’ है तथा ‘तस्माद् ध्वनि: शब्द:’ उद्घोष हुआ।

परिक्रमण
पृथ्वी, चन्द्रमा और सूर्य तीनों ही पिण्ड निरन्तर भ्रमण-परिक्रमण करते रहते हैं। भूपिण्ड सूर्य को केन्द्र मानकर क्रान्तिवृत्त पर घूम रहा है। यह पथ अण्डकार है जो ब्रह्माण्ड कहलाता है। दोनों पिण्डों के बीच समानाकर्षण रहता है। भूपिण्ड स्वभाव से सीधा जाना चाहता है। सूर्य अपने आकर्षण से इसे अपनी ओर किसी एक बिन्दु पर खींचता है। यहां से पुन: सीधा जाना चाहता है। गति चक्र की इस धारावाहिक कुटिलता से ही अण्डकार स्वरूप बनता है। सूर्य भी चूंकि गतिमान है, अत: उषा की स्थिति भी इसी अनुरूप बदलती जाती है। पृथ्वी और अन्तरिक्ष की गति सूर्य की गति से कम है। सूर्य और पृथ्वी दोनों ही परमेष्ठी लोक में भ्रमण करते हैं। परमेष्ठी का सोम इन पिण्डों की अग्नि-प्रतिष्ठा को बनाए रखता है। उषा दोनों पिण्डों की गति सूचकता का प्रमाण भी है।

समृद्धि दाता
सूर्य और पृथ्वी के साथ स्वयं परमेष्ठी लोक या गोलोक भी स्वयंभू लोक की परिक्रमा करता रहता है। परमेष्ठी भृगु-अङ्गिरा का उत्पादक स्थान है, गोलोक अर्थात् विद्युत् का लोक है। सूर्य जब परमेष्ठी में गुजरता है तब इन तत्त्वों के सम्पर्क में आता है। सर्वप्रथम उषा रूप में सूर्य की किरणें इन तत्त्वों को छूती हैं। एक ओर तो रात्रि का अन्धकार दूर होता है, वहीं दूसरी ओर उषा रूप किरणें सूर्य के लिए जल ग्रहण करती आगे बढ़ती हैं। सूर्य देवराज इन्द्र है। सूर्य को देवताओं का मुख भी कहा जाता है। सूर्य वर्षा का कारक है, किन्तु उषा का निमित्त कारण बनता है। वर्षा से ही अन्न पैदा होता है। अत: उषा को ही अन्न-धन बांटने वाला कहा गया है। समृद्धि दाता कहा है। सूर्य और अन्तरिक्ष के मध्य सेतु का कार्य उषा करती है।

शरीर भी वस्तिगुहा भु: है, उदरगुहा भुव: है तथा उरोगुहा स्व: है। शिरोगुहा परमेष्ठी लोक है। इनमें से तीन में क्रमश: पार्थिव अपान, अन्तरिक्ष का व्यान, तथा दिव्य प्राण प्रतिष्ठित हैं। ये भी मूल में तो अग्नि-वायु-आदित्य ही हैं। इन्हीं के परस्पर संघर्ष से शरीर में भी वैश्वानर अग्नि उत्पन्न होता है। कृष्ण ने गीता में कहा है-‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रित:।’

उषा सूर्य का ‘विजिटिंग कार्ड’ है। सूर्य के आधा घण्टा बाद प्रकट होने की सूचना है। परमेष्ठी सोम के सूर्याग्नि से मिलकर नई अग्नि-सोमात्मक आधिदैविक सृष्टि होने की घण्टी है। मृत्युलोक में, पृथ्वी पर भी, उषा के प्रकट होते ही प्राणीमात्र को दृष्टि मिल जाती है। उस प्रकाश में सृष्टि दृष्टिगोचर होने लगती है, जो कि रात्रि में सूर्य के अस्त होते ही खो गई थी। अधिभूत और अध्यात्म में भी सृष्टि कार्य, खेती की तैयारियां, पक्षियों का चहकना जैसे कर्म शुरू हो जाते हैं।

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