30 अगस्त को रवि प्रदोष, जानें कैसे करें भगवान शंकर को प्रसन्न

भगवान शिव के साथ ही मिलेगा सूर्य देव का भी आशीर्वाद...

By: दीपेश तिवारी

Published: 24 Aug 2020, 03:00 PM IST

हिंदू धर्म में प्रदोष की तिथि बहुत ही खास होती है। प्रदोष व्रत हर माह के शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन पड़ते हैं। एक माह में दो प्रदोष पड़ते हैं। इस दिन भगवान शंकर की पूजा की जाती है। रविवार के दिन जो प्रदोष व्रत पड़ता है वो रवि प्रदोष व्रत कहलाता है। सोमवार 31 अगस्त को त्रयोदशी होने से 30 अगस्त 2020 को रवि प्रदोष व्रत है, इस दिन भाद्रपद शुक्ल द्वादशी व नक्षत्र उत्तराषाढ़ दिन में 1.52 बजे तक है। आइए विस्तार से जानते हैं रवि प्रदोष व्रत की कथा और पूजन विधि। इस माह यानि अगस्त में कुल दो रवि प्रदोष पड़े हैं, जिनमें पहला 16 अगस्त को था, वहीं अब 30 अगस्त को एक बार फिर रवि प्रदोष है।

प्रदोष काल वह समय कहलाता है जिस समय दिन और रात का मिलन होता है। भगवान शंकर की पूजा और उपवास व्रत के विशेष काल और दिन रुप में जाना जाने वाला यह प्रदोष काल बहुत ही उत्तम समय होता है। पंउित सुनील शर्मा के अनुसार इस दौरान भगवान शिव की साधना सारे मनोरथ पूरे करने वाली होती है। ये व्रत हिंदू पंचांग के अनुसार त्रयोदशी तिथि को होता है। इस दिन पूजा-कीर्तन और व्रत करने से भगवान शिव के भक्त की मनोकामनाएं शीघ्र ही पूरी होती है।

मान्यता है कि प्रदोष व्रत को सबसे पहले चंद्र देव ने किया था. जिसके शुभ प्रभाव से चंद्रमा का क्षय रोग खत्म हो गया था। त्रयोदशी के दिन किया जाने वाला प्रदोष व्रत सौ गायों के दान के बराबर पुण्य प्रदान करता है। प्रदोष व्रत को किसी भी मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से प्रारंभ किया जा सकता है। इस समय की गई भगवान शिव की पूजा से अमोघ फल की प्राप्ति होती है। यह व्रत शत्रुओं पर विजय हासिल करने के लिए अच्छा माना गया है।

रवि प्रदोष: ऐसे करें शंकरजी की पूजा...
भगवान शिव और माता पार्वती के साथ सूर्य देव का आशीर्वाद पाने के लिए रविवार के दिन पड़ने वाली त्रयोदशी तिथि पर सूर्योदय से पहले यानी ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाएं। इसके बाद स्नान-ध्यान आदि करके उगते सूर्य को तांबे के पात्र में जल, रोली और अक्षत डालकर अर्घ्य दें। इसके बाद भगवान शिव और पार्वती का ध्यान करके इस व्रत को विधि-विधान से पूरा करने का संकल्प करें। पूरे दिन नियम और संयम के साथ व्रत करने के बाद शाम के समय एक बार फिर से स्नान करके साफ वस्त्र धारण करें। स्नान के बाद भगवान शिव की बिल्ब पत्र, कमल या फिर दूसरे किसी पुष्प जो उपलब्ध हो और धतूरे के फल आदि के साथ पूजा करें।

भगवान शिव संग माता पार्वती की पूजा करना बिल्कुल न भूलें। पूजन के बाद रुद्राक्ष की माला से 'ॐ नम: शिवाय' मंत्र का कम से कम एक माला जप करें। पूजन के बाद भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करके सभी को प्रसाद बांटें। किसी ब्राह्मण को अपने सामर्थ्य के अनुसार भोजन और दक्षिणा आदि का दान दें।

रवि प्रदोष का महत्व...
प्रदोष व्रत की महत्ता सप्ताह के दिनों के अनुसार अलग-अलग होती है। रविवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत और पूजा से आयु वृद्धि तथा अच्छा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है। रविवार को शिव-शक्ति पूजा करने से दाम्पत्य सुख भी बढ़ता है। इस दिन प्रदोष व्रत और पूजा करने से परेशानियां दूर होने लगती हैं।

रवि प्रदोष का संयोग कई तरह के दोषों को दूर करता है। इस संयोग के प्रभाव से तरक्की मिलती है। इस व्रत को करने से परिवार हमेशा आरोग्य रहता है। साथ ही सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

रवि प्रदोष व्रत की पूजा का समय शाम 4.30 से शाम 7.00 बजे के बीच उत्तम रहता है, अत: इस समय पूजा की जानी चाहिए। नैवेद्य में जौ का सत्तू, घी एवं शकर का भोग लगाएं, तत्पश्चात आठों दिशाओं में 8‍ दीपक रखकर प्रत्येक की स्थापना कर उन्हें 8 बार नमस्कार करें। इसके बाद नंदीश्वर (बछड़े) को जल एवं दूर्वा खिलाकर स्पर्श करें। शिव-पार्वती एवं नंदकेश्वर की प्रार्थना करें।

रवि प्रदोष व्रत का फल-
भगवान शिव, माता पार्वती संग प्रत्यक्ष देवता सूर्य देव का आशीर्वाद दिलाने वाला रवि प्रदोष व्रत साधक को सुख-समृद्धि के साथ आरोग्य और लंबी आयु का आशीर्वाद दिलाने वाला है। इस व्रत को करने वाला व्यक्ति रोग-शोक आदि से मुक्त रहता है। दाम्पत्य सुख पाने के लिए भी ये व्रत अत्यंत शुभ माना जाता है।

Show More
दीपेश तिवारी
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned