विश्वविद्यालय प्रबंधन को झटका, 84 नियुक्तियां अवैध ही मानी जाएंगी


- विश्वविद्यालय द्वारा भेजे गए प्रस्ताव को उच्च शिक्षा विभाग ने किया निरस्त

By: Mrigendra Singh

Published: 13 Oct 2021, 09:14 PM IST


रीवा। अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय प्रबंधन को शासन एक बड़ा झटका दिया है। जिसके चलते अब विश्वविद्यालय प्रबंधन को बड़ा आर्थिक भार उठाना पड़ेगा। विश्वविद्यालय द्वारा पूर्व में 84 कर्मचारियों की नियुक्ति किए जाने के मामले में अब तक शासन से पद ही स्वीकृत नहीं कराए गए थे।

कई बार इस पर विश्वविद्यालय प्रबंधन को नोटिस जारी होती रही है। कुछ समय पहले ही विश्वविद्यालय ने एक प्रस्ताव शासन को भेजा था, जिसमें कार्यरत कर्मचारियों का पद स्वीकृत करते हुए पूर्व की नियुक्तियों को वैधता देने की मांग की गई थी।

विश्वविद्यालय के इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए उच्च शिक्षा विभाग ने कहा है कि यह पूरी तरह से नियम विरुद्ध इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। विश्वविद्यालय कार्यपरिषद ने भी शासन से पद स्वीकृत हुए बिना ही दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को स्थाई कर्मचारी का दर्जा दिए जाने को गलत बताया गया है।
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चार महीने बाद आया शासन का जवाब
विश्वविद्यालय प्रबंधन ने बीते एक जून को पत्र भेजकर शासन से अनुरोध किया था कि सभी 84 कर्मचारियों के लिए पद स्वीकृत किया जाए ताकि वह भी अन्य कर्मचारियों की तरह शासन की योजनाओं का लाभ पा सकें। इस पत्र का जवाब देने में शासन को चार महीने से अधिक का समय लग गया। अब विश्वविद्यालय के पास यह पत्र पहुंचा है जिसमें स्पष्ट कर दिया गया है कि जो नियुक्ति पहले हुई थी वह अवैध थी और आगे भी अवैध ही मानी जाएगी। विश्वविद्यालय के प्रस्ताव को इसी जवाब के साथ नस्तीबद्ध भी कर दिया गया है।
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इन लाभों से वंचित रहेंगे कर्मचारी
शासन द्वारा पद स्वीकृत नहीं किए जाने की वजह से विश्वविद्यालय प्रबंधन के ऊपर बड़ा आर्थिक भार बढ़ेगा। पहले ही वेतन का भुगतान अपने कोष से कर रहे विश्वविद्यालय को उम्मीद थी कि पद स्वीकृत होंगे तो पेंशन सहित अन्य स्वत्वों का भुगतान शासन से प्राप्त होगा। अब शासन के निर्णय के बाद कर्मचारियों को वरिष्ठता सूची में समाहित नहीं किया जाएगा, पेंशन का लाभ नहीं मिलेगा, पदोन्नति, क्रमोन्नति, समयमान वेतनमान, अनुकंपा नियुक्ति, अवकाश नकदीकरण सहित अन्य प्रमुख योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाएगा।
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पूर्व कुलसचिव के विरुद्ध जांच भी नस्तीबद्ध
कर्मचारियों की नियुक्तियों में नियमों की अनदेखी करने के आरोप में वर्ष 2014 में विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलसचिव मगन सिंह अवास्या को जिम्मेदार मानते हुए विभागीय जांच शुरू की गई थी। विभाग ने त्वरित रूप से अवास्या पर कार्रवाई नहीं की, जिसके बाद वह सेवानिवृत्त हो गए। सेवानिवृत्ति के चार वर्ष बीतने की वजह से शासन द्वारा बनाए गए नियमों का हवाला देते हुए मगन सिंह अवास्या का प्रकरण भी नस्तीबद्ध कर दिया गया है।
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यह है नियुक्तियों से जुड़ा मामला
विश्वविद्यालय में वर्ष 1988 से पहले अलग-अलग समय पर 104 दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों की नियुक्ति की गई थी। इसमें 20 पद शासन से स्वीकृत हुए तो उन्हें समायोजित कर दिया गया। इसके बाद विश्वविद्यालय प्रबंधन द्वारा 27 मई 1995 को शेष 84 दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को नियमित कर दिया गया, जबकि इनके लिए शासन से पद ही स्वीकृत नहीं था। विश्वविद्यालय ने उस दौरान इन कर्मचारियों के वेतन की मांग शासन से की लेकिन वहां से इंकार कर दिया गया तो विश्वविद्यालय खुद के बजट से इनको भुगतान करने लगा। अब तक वित्तीय भार विश्वविद्यालय स्वयं ही उठा रहा है। इसके पहले शासन और राजभवन की ओर से कई पत्र आए लेकिन विश्वविद्यालय प्रबंधन स्वयं के स्तर पर अपनी जवाबदेही तय करने से कतराता रहा है।
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- पेंशन और अनुकंपा नियुक्तियां अटकी
जिन दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को शासन से पद स्वीकृति के बिना विश्वविद्यालय ने नियमित कर दिया था, वह अब रिटायर्ड भी होते जा रहे हैं। स्वीकृति नहीं होने की वजह से शासन द्वारा पेंशन का लाभ इन्हें नहीं दिया जा रहा है। जिसकी शिकायत लेकर ये रिटायर्ड कर्मचारी भटक रहे हैं। इसके साथ ही पांच कर्मचारियों की मौत हो चुकी है, उनके आश्रितों की अनुकंपा नियुक्ति के मामले इसलिए लंबित हैं कि कर्मचारियों की नियुक्ति ही पद स्वीकृति के बिना हुई थी। आडिट में भी लगातार आपत्तियां आ रही हैं।

Mrigendra Singh Reporting
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