scriptawadhesh pratap singh university rewa | रीवा राज्य के तत्कालीन प्रधानमंत्री अवधेश प्रताप सिंह ने विश्वविद्यालय स्थापना का देखा था सपना | Patrika News

रीवा राज्य के तत्कालीन प्रधानमंत्री अवधेश प्रताप सिंह ने विश्वविद्यालय स्थापना का देखा था सपना


विश्वविद्यालय ने जगाई शिक्षा की अलख तो विंध्य में खुली तरक्की की राह
- अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय का 55वां स्थापना दिवस

रीवा

Published: July 21, 2022 11:17:46 am


मृगेन्द्र सिंह, रीवा। अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय की स्थापना उस समय की गई जब विंध्य क्षेत्र शिक्षा में काफी पिछड़ रहा था। बढ़ती मांग के बीच विश्वविद्यालय स्थापित हुआ और क्षेत्र में शिक्षा का आधार स्थापित होने लगा। युवाओं को अपने यहां अच्छी शिक्षा मिलने लगी, जिससे उनके लिए रोजगार के द्वार खुलने लगे। बड़ी संख्या में युवाओं को हर साल अच्छी नौकरियां मिलने लगी जिससे वह अपने परिवार को संभालने में सक्षम हुए और पूरे अंचल की तरक्की की राह खुल गई।
पहले इस क्षेत्र के छात्र इलाहाबाद, बनारस, सागर अथवा अन्य सुदूर विश्वविद्यालय जाया करते थे। रीवा में दरबार कालेज (ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय), शासकीय विज्ञान महाविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान, सागर विश्वविद्यालय से सम्बद्ध थे। रीवा में विश्वविद्यालय के साथ ही मेडिकल कालेज, इंजीनियरिंग कालेज, कृषि महाविद्यालय सहित सैनिक स्कूल आदि की स्थापना उसी दौर में की गई। जिससे रीवा शिक्षा के प्रमुख केन्द्र बन गया।
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अवधेश प्रताप आजादी के बाद से थे प्रयासरत
स्वतंत्रता सेनानी रहे विंध्य प्रदेश के तत्कालीन प्रधानमंत्री कप्तान अवधेश प्रताप सिंह रीवा में विश्वविद्यालय की मांग लगातार करते रहे। इसी के चलते कई बार प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें मजाक में मिस्टर युनिवर्सिटी कहकर भी पुकारा। सिंह के सपनों को उनके पुत्र गोविन्द नारायण सिंह ने मुख्यमंत्री बनने के दौरान साकार किया। 20 जुलाई 1968 को यह विश्वविद्यालय विधिवत अस्तित्व में आया। इसका कार्यालय पहले कोठी कंपाउंड में खुला बाद में सिविल लाइंस रीवा के बंगला नंबर २५, फिर पीके स्कूल परिसर से संचालन हुआ। 1972 में शासकीय विज्ञान महाविद्यालय रीवा में बीएससी प्रथम वर्ष में प्रवेश शुरू हुआ था। प्रथम कुलपति पं शम्भूनाथ शुक्ल बने थे। शुरुआत में इसका क्षेत्र रीवा, सतना, सीधी, शहडोल सहित बुन्देलखण्ड के पन्ना, टीकमगढ़ एवं छतरपुर तक था। बाद में नए दूसरे विश्वविद्यालयों का विस्तार होने से कार्यक्षेत्र घटा।
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पहले दीक्षांत समारोह में भवनों की आधार शिला रखी
विश्वविद्यालय के पहले दीक्षान्त समारोह में तत्कालीन राज्यपाल सत्यनारायण सिन्हा एवं मुख्यमंत्री प्रकाश चन्द्र सेठी वर्ष 1973 में शामिल हुए। इसी दौरान कई भवनों की आधार शिला भी रखी गई, बाद में जो बनकर तैयार हुए। विश्वविद्यालय परिसर में विक्रम अंतरिक्ष भौतिकी केन्द्र की स्थापना 21 मई 1975 को की गई। इस केन्द्र का प्रभार अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉ.संत प्रसाद अग्रवाल को दिया गया। विश्वविद्यालय के प्रथम शैक्षणिक विभाग के रूप में पर्यावरण जीवविज्ञान विभाग की स्थापना वर्ष 1977 में हुई। विश्वविद्यालय के प्रथम चयनित आचार्य प्रो. जेएस राठौर के नेतृत्व में इस विभाग में शैक्षणिक कार्य प्रारम्भ हुआ। विभाग द्वारा आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी भी आए। इसके बाद लगातार कई नए विभाग स्थापित हुए। इसके बाद कुलपति प्रो. हीरालाल निगम, प्रो. डीपी सिंह, प्रो. वीसी सिन्हा, प्रो. एडीएन वाजपेयी, प्रो. रहस्यमणि मिश्रा सहित कई ऐसे कुलपति आए जिन्होंने विश्वविद्यालय के विस्तार का काम किया। दूसरा दीक्षांत समारोह लंबे अंतराल के बाद वर्ष 2009 में और तीसरा वर्ष 2010 में हुआ। इसके बाद दीक्षांत समारोह भी नियमित होने लगे। चौथा एवं पांचवां वर्ष 2015 एवं 2016 में हुआ। कुछ महीने पहले ही नौवां दीक्षांत समारोह आयोजित हुआ था।
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शोध केन्द्र और पीठों की स्थापना बढ़ा रही गरिमा
विश्वविद्यालय में सर्वधर्म समभाव की भावना को जागृत करने के लिए जहां एक ओर 'जैन शोध पीठ' की स्थापना की गई है, वहीं दूसरी ओर 'गांधी और अम्बेडकर के विचारों' पर भी शोध केन्द्र स्थापित हैं। बघेलखण्ड अपनी साहित्यिक सम्पदा के लिए भी जाना जाता है और बघेली को भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए किए जा रहे प्रयासों में विश्वविद्यालय ने 'बघेली पीठ' स्थापित कर इसे ऊर्जा प्रदान की है। विश्वविद्यालय में नियमित भाषण मालाओं का आयोजन भी अलग पहचान बनाए हुए है।
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आनंद विभाग भी किया स्थापित
जीवन से विलुप्त होते आनन्द की प्राप्ति के लिए आनन्द विभाग की विश्वविद्यालय में स्थापना एक ऐसा अभिनव प्रयोग है जो मनुष्य को बेहतर जीवन पद्धति तो सिखाएगा ही आपस में सौहार्द और सामंजस्य का संचार भी करेगा।
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