दिमागी बुखार ने बुझा दिया घर का चिराग

जीएमएच पहुंचने से पहले टूटी सांस, देवतालाब से लेकर आए थे अस्पताल

By: Manoj singh Chouhan

Published: 18 Aug 2017, 02:13 PM IST

रीवा। अगस्त माह साकेत परिवार पर भारी पड़ गया। घर का हंसता-खेलता चिराग देखते ही देखते काल के मुंह में समा गया। मृत्यु से महज चार घंटे पहले की ही बात है, वह स्कूल से लौटा था। मां से कहा सिरदर्द हो रहा है। मां ने हाथ फेरा तो बेटे का माथा आग सा तप रहा था। वह पड़ोसियों के साथ अपने इकलौते बेटे को लेकर जैसे-तैसे जीएमएच तक पहुुंची ही थी कि सीढिय़ां चढ़ते-चढ़ते बच्चे की सासे थम गईं। डॉक्टर के यह कहते ही कि आने में देरी कर दी वह फफक पड़ी। पहले पति की मौत और बेटे की... उस पर गमों का पहाड़ टूट पड़ा। उसकी करुण चीखें जिसने भी सुनीं उसकी आंखे छलक आईं। महिलाएं ढांढस बंधाती रही लेकिन मां की ममता मानने को तैयार नहीं थी।
यह हृदय विदारक घटना देवतालाब निवासी प्रेमवती साकेत के साथ घटी। उसका बारह वर्षीय पुत्र अभिषेक साकेत सुबह स्कूल गया था लेकिन अन्य दिनों की अपेक्षा वह आज दोपहर 11 बजे ही घर आ गया। उसे तेज बुखार के साथ सिरदर्द हो रहा था।
बेटे की हालत देखकर पड़ोसियों को बुलाया। देवतालाब अस्पताल पहुंची। वहां डॉक्टरों ने बच्चे की हालत गंभीर देखते हुए फौरन जीएमएच के लिए रेफर कर दिया। डेढ़ घंटे बाद वह अस्पताल पहुंची। शिशु रोग विभाग की गहन चिकित्सा इकाई में डॉक्टरों ने उसे देखते ही मृत घोषित कर दिया। रोती-बिलखती प्रेमवती ने बताया कि इकलौता बेटा था। पति की तीन साल पहले मौत हो चुकी है। वह मजदूरी कर बेटे को पढ़ा रही थी ताकि उसे अच्छा बना सके। बुढ़ापे में सहारा बन सके। लेकिन किस्मत को मंजूर नहीं था। बेटे के शव से लिपटी वह बार-बार यही कह रही थी कि अब वह किसके सहारे जीएगी। शिशु रोग विभाग के डॉक्टरों का कहना है कि घरवालों से जैसी हिस्ट्री पता चली है उससे कहा जा सकता है कि यह दिमागी बुखार का अटैक है। इन दिनों मौसम के बदलाव के चलते दिमागी बुखार के केस आ भी रहे हैं। तीन बच्चे इस बीमारी के भर्ती भी हैं।

नहीं थे पैसे, नि:शुल्क भेजा वाहन
गरीबी की छत तले गमों में जिदंगी जीने वाली प्रेमवती के पास इतने भी पैसे नहीं थे कि वह बेटे के शव को घर तक ले जाती। पड़ोसी भी जल्दी-जल्दी में चले आए थे, इस विषम परिस्थिति में उपअधीक्षक डॉ. एसके पाठक ने मदद की। अस्पताल के शव वाहन से शव को देवतालाब भिजवाया।

समय पर न चेते तो गोरखपुर जैसे होंगे हाल
उत्तर प्रदेश का गोरखपुर इंसेफेलाइटिस (दिमागी बुखार) को लेकर इन दिनों सुर्खियों में है। इसे बच्चों के लिए काल माना जाता है। इसके वायरस ने बीते दो साल से विंध्य में भी कोहराम मचा रखा है। दो साल में तीन दर्जन से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है। धीरे-धीरे गोरखपुर जैसी स्थिति पैदा हो रही है लेकिन स्वास्थ्य विभाग अभी तक गंभीर नहीं है। इस बीमारी से बचाव के लिए टीकाकरण श़ुरू नहीं हुआ है। न ही बीमारी की जांच के लिए स्थानीय स्तर पर लैब की सुविधा मुहैया कराई जा रही है। जिससे त्वरित उपचार मयस्सर नहीं है। जीएमएच के शिशु रोग विशेषज्ञों का कहना है कि लाक्षणिक इलाज ही कर रहे हैं।

आपकी सर्तकता ही है बचाव
डॉ. ज्योती सिंह ने बताया कि अगर बच्चे को तीव्र बुखार है। सिरदर्द हो रहा है। उल्टियां और चक्कर आ रहे हैं। झटके के साथ बेहोशी आ रही है तो समझिए दिमागी बुखार का अटैक है। अस्पताल पहुंचने तक बच्चे के माथे पर पट्टी करते रहें। पैरासीटामाल की गोली फौरन दे दें। कोशिश करें कि नजदीकी डॉक्टर, अस्पताल जाएं। क्योंकि इसमें समय बहुत कम होता है। मच्छर के काटने से होता है इसलिए घर में बच्चों को मच्छर से बचाएं।

डराते हैं ये आंकड़ेे
वर्ष 2017-18 की रिपोर्ट
-54 बच्चे हुए हैं भर्ती।
-10 बच्चों हो चुकी हैं मौत
वर्ष 2016-17 की रिपोर्ट
-70 बच्चे हुए थे भर्ती।
-14 बच्चों की हुई थी मौत

Manoj singh Chouhan Desk
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