कलेक्टर ने खेत में नरवाई जलाने पर प्रतिबंध लगाने लागू की धारा-144

जिले में गेहूं व अन्य फसलों की नइवई न जलाए जाने के लिए कलेक्टर ने जारी किया आदेश

By: Rajesh Patel

Updated: 12 Nov 2020, 07:28 AM IST

रीवा. पर्यावरण प्रदूषित न हो, घटनाएं न घटे, पशुओं को पर्याप्त चारा उपलब्ध रहे। आदि व्यवस्थाओं के मद्दे नजर कलेक्टर ने फसलों की नरवई जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। कलेक्टर एवं जिला दण्डाधिकारी डॉ. इलैयाराजा टी ने गेंहू एवं अन्य फसलों की नरबाई न जलाएं इसके लिए प्रभावी आदेश जारी करते हुए धारा 144 के तहत प्रतिबंधित कर दिया है।
गेहूं समेत अन्य फसलों को जला देते हैं किसान
कलेक्टर ने कहा है कि गेंहू एवं धान की फसल कटाई अधिकांश कम्बाइंड हार्वेस्टर द्वारा की जाती है। कटाई के उपरांत कृषक बचे हुए गेंहू के डंठलों से भूसा न बनाकर इसे जला देते हैं। इसी तरह धान के पैरा को भी आग लगा देते हैं। जिससे धान का पैरा एवं भूसे का उपयोग पशु आहार के रूप में नहीं हो पाता है। भूसे का उपयोग पशु आहार के साथ ही अन्य वैकल्पिक रूप में किया जा सकता है। एकत्रित किया गया भूसा ईट, भ_ा तथा अन्य उद्योगों में उपयोग किया जाता है। भूसे एवं धान के पैरा की मांग प्रदेश के अन्य जिलो के साथ ही अनेक प्रदेशों में होती है।
भूसा 4.5 रुपए प्रति किलो की दर से बिक रहा
भूसा 4.5 रुपए प्रति किलो ग्राम की दर से विक्रय किया जा सकता है। इसी तरह धान का पैरा भी बहु उपयोगी है। पर्याप्त मात्रा में भूसा और पैरा उपलब्ध न होने के कारण पशु अन्य हानिकारक पदार्थ जैसे पॉलीथीन आदि खाते हैं जिससे वे बीमार होते हैं तथा अनेक बार उनकी मृत्यु भी हो जाती है। इससे पशुधन की भी हानि होती है। नरबाई का भूसा 2 से 3 माह बाद दुगनी दर पर विक्रय होता है तथा कृषकों को भी यही भूसा बढ़ी हुई दरों पर क्रय करना पड़ता है। कलेक्टर ने आदेश दिया है कि नरबाई एवं धान के पैरा में आग लगाना कृषि के लिए नुकसानदायक होने के साथ ही पर्यावरण की दृष्टि से भी हानिकारक है। साथ ही पर्यावरण को भी हानि पहुंचती है।
गंभीर घटनाएं हो रहीं
नरबाई जलाने से विगत वर्षों में गंभीर अग्निदुर्घटनाएं घटित हुई हैं तथा व्यापक संपत्ति की हानि हुई है। कानून व्यवस्था के लिए विपरित परिस्थितियां निर्मित होती हैं। खेत की आग के अनियंत्रित होने पर जन-धन संपत्ति प्राकृतिक वनस्पति एवं जीव-जन्तु नष्ट हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि खेत की मिट्टी में प्राकृतिक रूप से पाये जाने वाले लाभकारी सूक्ष्म जीवाणु नष्ट हो जाते हैं जिससे खेत की उर्वरा शक्ति धीरे-धीरे घट रही है और उत्पादन प्रभावित हो रहा है।
खेत में पड़ा कचरा
खेत में पड़ा कचरा, भूसा, डंठल सडऩे के बाद भूमि को प्राकृतिक रूप से उपजाऊ बनाते हैं जिन्हे जलाकर नष्ट करना ऊर्जा को नष्ट करना है। आग लगने से हानिकारक गैसों का उत्सर्जन होता है जिससे पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए नरबाई जलाना प्रतिबंधित किया गया है।

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Rajesh Patel Reporting
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