रीवा के डॉ. प्रदीप ने जुनून और जज्बे से बदली विभाग की सूरत

5 बेड की थी यूनिट, बना दिया ३5 बेड का विभाग, एसएस मेडिकल कॉलेज के अन्य विभागों के लिए प्रेरणास्रोत बने

By: Dilip Patel

Published: 24 May 2018, 01:11 PM IST

रीवा. मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो पहाड़ सी चुनौती भी आसान हो जाती है। ऐसा ही जज्बा, जुनून दिखाया है मानसिक रोग विभागाध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार ने। उन्होंने लगन और मेहनत के दम पर छोटी सी यूनिट को विभाग में तब्दील कर दिया है। अपने कार्यों के चलते वे श्यामशाह मेडिकल कॉलेज के अन्य विभागों के लिए नजीर बन गए हैं।


बात शुरू होती है अप्रैल 1987 से। जब डॉ. प्रदीप कुमार लखनऊ पीजीआई छोड़कर रीवा के मेडिकल कॉलेज आए। यहां असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्य संभाला। उस समय मानसिक विभाग की एक यूनिट हुआ करती थी, जो मेडिसिन विभाग के अंडर में थी। यूनिट में महज 5 बेड थे। इन्हें आइसोलेशन वार्ड की जर्जर बिल्डिंग यूनिट के लिए दी गई थी। विंध्य क्षेत्र में वे अकेले मानसिक रोग के डॉक्टर थे। डेढ़ साल में यूनिट में 15 बेड किए। मरीज बढ़े तो ढाई साल में 30 बेड का वार्ड स्थापित कर लिया। पर चुनौती यह थी कि वह अकेले डॉक्टर थे। प्रयास शुरू किया तो 2004 में एसोसिएट प्रोफेसर का पद स्वीकृत कराने में सफल रहे। इस पद पर प्रमोशन पाने के बाद भी वह अकेले ही रहे, जबकि मरीज बढ़ते गए। नई-नई मानसिक बीमारियों ने चुनौती को और बढ़ा दिया। फिर चिकित्सा शिक्षा विभाग और एमसीआई में प्रयास किए। नतीजा 2009 में 1 पद प्रोफेसर, 1 एसोसिएट प्रोफेसर और 2 असिस्टेंट प्रोफेसर के पद बढ़े। इसी के साथ मेडिसिन की यह यूनिट मानसिक रोग विभाग में तब्दील हो गई। 2010 मेें उनकी डिमांड पर एक और सफलता हाथ लगी। असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर डॉ. निमिषा मिश्रा की नियुक्ति हुई। कुछ दिन बाद वह एसोसिएट प्रोफेसर बन गईं। तत्पश्चात डॉ. सुनील आहुजा और डॉ. अमरीश मिश्रा असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुए। इससे विभाग में नई ऊर्जा का संचार हुआ।

...और जनभागीदारी से रखी आधारशिला
तीन डॉक्टरों का साथ मिलने के बाद एक और प्रयास शुरू हुआ। जिसने विभाग की सूरत बदल दी। 2016 में जनभागीदारी के तहत धनराशि जुटाई। सांसद से 5 लाख, समाज के नागरिकों व संस्थाओं से करीब 10 लाख, स्वशासी समिति से 7.50 लाख प्राप्त हुए। इस धनराशि से संजय गांधी अस्पताल के ग्राउंड फ्लोर में मानसिक एवं स्वास्थ्य विभाग की आधारशिला रखी। करीब 31 साल बाद आइसोलेशन वार्ड की जर्जर बिल्डिंग से फरवरी 2017 में विभाग नई बिल्डिंग में शिफ्ट हुआ। अब स्थिति ये है कि विभाग में 35 बेड हैं। इमरजेंसी सेवाएं मौजूद हैं। मानसिक रोगियों को टहलने के लिए गार्डन है। विभाग के परिसर में चारों तरह बाउंड्रीवाल है। गंभीर बीमारियों का इलाज भी संभव है। इसी साल मेडिकल कॉलेज में पीजी की मान्यता मिलने के बाद मानसिक रोग की दो सीटों पर प्रवेश भी हुए।


ये है भविष्य की तैयारी
भविष्य की कार्ययोजना में 16 बेड का नशा मुक्ति केंद्र और जीरियाट्रिक सेंटर प्रस्तावित है। इसका प्रस्ताव केंद्र को भेजा था जिसे मंजूर कर लिया गया है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत केंद्र से 45 लाख रुपए का बजट मिला है। इससे यह सेंटर खोले जाएंगे। साथ ही संभागभर के मेडिकल अफसरों और नर्सिंग स्टॉफ को 14-14 दिन की ट्रेनिंग का कार्यक्रम शुरू होने जा रहा है। इससे हर जिले में मानसिक बीमारी के बेसिक डॉक्टर और प्रशिक्षित नर्स तैयार होंगे।


इन बीमारियों का है उपचार
एक्यूट साइकोसिस, सीजोफ्रेनिया, बीएमडी, एमडीडी, एनेक्टी डिसआर्डर, सबस्टेंस डिपेंडेंस, सोमेटोफार्म डिस आर्डर, तनाव, सीजर डिस आर्डर, आरगेनिक मेंटल डिस आर्डर, एमआर पीडीडी, डायमेंशिया सहित अन्य बीमारी शामिल हैं। विद्युत शॉक की सुविधा भी है।


बढ़ते मरीजों का ग्राफ
यूनिट 2014 , 2015, 2016 , 2017
ओपीडी 7964, 8716, 12814 , 9990
वार्ड भर्ती 759 , 790 , 801 , 771

Dilip Patel
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