नियोक्ताओं ने 5 माह में 300 की जरूरत बताकर महज 58 को किया काल, सूरत की कंपनी ने बुलाया

जिले में रोजगार सेतु पोर्टल पर 800 नियोक्ता पंजीयन कराकर प्रवासियों को रोजगार देना भूले, मनरेगा में करोड़ो बहाए फिर भी नहीं मिला काम, श्रमिको को मनरेगा में काम देने का दावा

By: Rajesh Patel

Published: 05 Sep 2020, 09:12 AM IST

रीवा. कोरोना काल में सूरत से जैसे-तैसे लौटकर गांव आए। पांच माह से घर बैठे रहे कोई काम नहीं मिला। पैसे भी खत्म हो गए। चार दिन पहले कंपनी ने वाहन भेजकर बुलाया तो परिवार के साथ दर्जनभर युवाओं को साथ लेेकर सूरत के लिए रवाना हो गए। हम बात कर रहे हैं गंगेव के मढ़ी खुर्द गांव के लोलर आदिवासी की। लोलर चार साल से सूरत में की एक धागा कंपनी में काम करता है। लॉकडाउन के दौरान अप्रैल में गांव लौट आया। 15 अगस्त तक काम नहीं मिला। परिवार के लोगों मुताबिक चार दिन पहले सूरत की धागा कंपनी ने गाड़ी भेजी ।

परिवार के सूरत दोबारा चला गया प्रवासी
लोलर परिवार के साथ आस-पास गांव के दर्जनभर युवाओं को सूरत के लिए रवाना हो गया। लॉकडाउन के दौरान मुबई, सूरत, अहमबाद जैसे बड़े शहरों से बड़ी संख्या में गांव लौटे अधिकतर प्रवासियों को रोजार नहीं मिला। कंपनियां चालू होने के बाद प्रवासियों को पलालय एक बार फिर शुरू हो गया। धीरे-धीरे प्रवासियों की भीड़ काम के लिए लौटने लगे हैं।


पंजीयन कराकर, रोजगार देना भूले
प्रवासियों को लौटने के बाद सरकार ने प्रवासियों को रोजगार देने के लिए सूक्ष्म एवं लघु उद्योग, व्यवसायिक प्रतिष्ठान, कंष्ट्रक्शन कंपनी सहित अन्य प्रतिष्ठानों ने रोजगार सेतु पोर्टल पर पंजीयन कराया। लगभग 800 स्थानीय नियोक्ता रजिस्ट्रिेशन करा चुके हैं। स्थानीय नियोक्ताओं ने रोजगार पोर्टल पर 300 कर्मचारियों की जरूरत बताकर अभी तक 58 लोगों को अस्थाई रोजगार दिया है।

मनरेगा में करोड़ो बहाए, नहीं मिला रोजगार
जिले में 45 हजार से ज्यादा प्रवासियों का पंजीयन किया गया है। शासन ने प्रवासियों को रोजगार देने के लिए गांव-गांव मनरेगा के तहत काम चालू कर दिया। कुछ को छोड़ दे तो अधिकांश को रोजगार नहीं मिला। मनरेगा में प्रवासियों को जाबकार्ड तक नहीं बनाए गए। हैरान करने वाली बात तो यह कि पंचायत एवं ग्रामीण विकास कार्यालय के पास प्रवासियों को रोजगार देने को कोई हिसाब तक नहीं है। मनरेगा अधिकारियों का दावा है कि लॉकडाउन के दौरान प्रतिदिन 30-35 हजार मानव दिवस काम दिया जा रहा है। प्रवासियों के जॉबकार्ड बनाए जा रहे हैं।

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