सरकारी दावे खोखले, पथरीले पहाड़ी मार्गों से पैदल ही घर जा रहे प्रवासी मजदूर

-पथरीले रास्तों पर 90 किलोमीटर तक चलना पड़ रहा पैदल

By: Ajay Chaturvedi

Published: 10 May 2020, 03:23 PM IST

रीवा. सरकार चाहे जितने दावे करे पर प्रवासी मजदूरों की कठिनाई बदस्तूर जारी है। कहीं उनके रहने का पर्याप्त इंतजाम नहीं तो कहीं उन्हें बीच रास्ते, पहाड़ों पर जंगलो में छोड़ दिया जा रहा जहां से वो पथरीले रास्तों से हो कर 90 किलोमीटर तक का सफर पैदल तय कर कोई ठिकाना खोज पा रहे हैं। लेकिन इसकी शिकायत करें भी तो किससे करें, कोई सुनने वाला नहीं।

कम से कम रीवा का तो यही हाल है। यहां पहुंचे मजदूरों को सीधी तक ले जाने के लिए एक बस का इंतजाम कर दिया प्रशासन ने। वह बस मोहनिया पहाड़ पर उन्हें छोड़ कर लौट गई। इसके बाद मजदूर किसी तरह पथरीले रास्तों से पैदल ही चल दिए। किसी तरह जान जोखिम में डाल कर वो तो गनीमत रही कि बीच रास्ते एक पुलिसचौकी मिल गई। वहां इन्हें रोक दिया गया। ऐसे में इन्होंने आपबीती सुनाई तो पुलिस वालों ने इस बाबत उच्चाधिकारियों से संपर्क साधा। फिर किसी तरह उन्हें सीधी पहुंचाया गया।

सीधी के गोपाद बनास क्षेत्र के रहने वाले ये मजदूर पुणे में काम करते थे। वहां काम धंधा बंद होने पर लॉकडाउन में पैदल ही घर-गांव की ओर चल दिए थे। जैसे-तैसे खंडवा तक पहुंचे तो वहां भी रोका गया। उसके बाद एक बस करवाई प्रशासन ने। वह बस उन्हें शनिवार को लेकर रीवां पहुंची। रीवां से इन्हें सीधी भेजा गया, पर बताया जा रहा है कि वह बस बीच रास्ते ही चालक ने बस के खराब होने की बात कह कर सबको उतार दिया। फिर वह लौट आया। अब जहां बस वाले ने इन्हें छोड़ा वहां से उनका गांव 90 किलोमीटर दूर है। लिहाजा वो फिर पैदल ही निकल पड़े।

इन पदयात्री प्रवासी मजदूरों में से एक राजभान साहू का कहना रहा कि हम तो पुणे से पैदल ही चले थे गांव-घर को। खंडवा में हमें रोक कर बस से रीवा भिजवाया गया। रीवा से सीधी भेजने का इंतजाम हुआ। लेकिन सीधी से 50 किलोमीटर दूर पड़री गांव जाना था पर बस चालक हमें बीच रास्ते ही छोड़ गया। हमने बहुत मिन्नत की लेकिन वह कुछ सुनने को तैयार ही न था। पैदल चलते-चलते पुलिस चौकी के पास पहुंचे तो पुनः रोका गया जहां दिन भर बैठे रहे, कुछ खाने-पीने को भी नहीं मिला।

सुधीर सिंह कहते हैं कि आधे रास्ते में बस वाले ने उतार दिया। पुलिस वाले सीधी तक की व्यवस्था करने की बात कहे। लेकिन वहां से भी हमें अपने गांव तक जाने का कोई साधऩ नहीं था। अब घर के लोग इतने सक्षम नहीं कि संसाधन जुटा कर हमें लेने आएं। ऐसे में पैदल ही घर जाना हुआ।

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