अभिभावक बोले-आखिर कैसे भेजें बच्चों को स्कूल

स्कूल संचालकों ने बस की व्यवस्था करने से खड़े किए हाथ

By: Mahesh Singh

Published: 07 Jul 2019, 10:11 PM IST

 

रीवा. स्कूली बच्चों की सुरक्षा को लेकर शासन के मापदंड पूरा करने वाली जिले में महज 250 स्कूल बसें हैं। स्कूल बसों की संख्या कम होने के कारण अभिभावकों की मुश्किलें बढ़ गई है। उनका कहना है कि जब स्कूलों में बसें नहीं है तो वे बच्चों को स्कूल आखिर कैसे भेजें। बसें नहीं होने से बच्चों को असुरक्षित तरीके से स्कूल भेजना पड़ रहा है। पुलिस व परिवहन विभाग के अधिकारियों से अभिभावकों ने कहा कि इस शैक्षणिक सत्र में स्कूल संचालक बसों की व्यवस्था कराने तैयार नहीं है। इसलिए निजी वाहनों में बच्चे भेजते हैं लेकिन वे स्कूल वाहन में पंजीकृत नहीं है। ऐसे में उनसे सुरक्षा मापदंडों को पूरा करने की अपेक्षा कैसे करें।

शहर की बारह बड़ी स्कूलों में एक भी स्कूल वाहन नहीं है। ऐसे में इन स्कूलों के 70 फीसदी बच्चे निजी वाहनों से आते-जाते हैं। इनमें कोई भी वाहन स्कूल बस के रुप पंजीकृत नहीं है। वहीं स्कूली बच्चों की सुरक्षा को लेकर परिवहन विभाग ऐसे वाहनों पर अभियान चला रहा है। वहीं लगातार स्कूल वाहनों की घटना के बाद अभिभावकों की भी चिंता बच्चों की सुरक्षा को लेकर बढ़ गई है। लेकिन वे स्कूल प्रबंधन की मनमानी के आगे मजबूर है।

मान्यता शर्तों का उल्लंघन
बताया जा रहा कि बोर्ड से मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों में 25 फीसदी छात्रों के परिवहन की व्यवस्था रखना अनिवार्य है। लेकिन बिना वाहनों के इन स्कूलों की मान्यता लगातार रिन्युवल होती आ रही है। यही कारण है कि स्कूल प्रबंधन स्कूली बस खरीदने तैयार नहीं हैं। ऐसे में पूरी जिम्मेदारी अभिभावकों पर डाल कर वह बेफ्रिक हैं। यहां तक कि स्कूल में आने वाले निजी वाहनों की पूरी जिम्मेदारी भी अभिभावकों पर डाल रहे है।

एक रुपए प्रति सीट लगता है टैक्स
एआरटीओ ने बताया कि स्कूल वाहनों को सरकार की तरफ से टैक्स प्रति सीट एक रुपए निर्धारित किया गया है। स्कूली वाहन में अन्य व्यवसायिक वाहनों की अपेक्षा कम कीमत है। इसके बावजूद शहर में बहुत कम स्कूल वाहन पंजीकृत हैं । जो निजी वाहन स्कूल वाहन के रुप में चलना चाहते हैं वह आवश्यक मापदंड पूरा कर चल सकते हैं । इसके लिए उन्हें चार दिनों को समय दिया गया है।

अब स्वंय लेकर आते हैं बच्चे
स्कूल में वाहन नहीं है, ऑटो में बच्चे असुरिक्षत रहते है। पहले ऑटो से बच्चों को भेजते थे, लेकिन बच्चों की हालत ऑटो में देखकर हम स्वंय उनको लेेने आते हंै। स्कूल प्रबंधन इसे लेकर गैरजिम्मेदार है वही प्रशासन भी स्कूल संचालकों की मनमानी के आगे बेबश रहता है।
रामस्वरुप कुशवाहा, महाजन टोला

बच्चों को तो पढ़ाना है
हमे बच्चों को तो पढ़ाना है इसलिए हम ऑटो में बच्चों की दुर्दशा देखने के बाद भी भेजते हैं। क्योकि अकेले ऑटो में बच्चों के भेजने का खर्च उठा नहीं सकते। जब तक बच्चे घर नहीं आ जाते है चिंता सताती रहती है, लेकिन क्या करें स्कूल तो भेजना पड़ेगा।
आरती वर्मा ,चिरहुला कॉलोनी

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Mahesh Singh Desk
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