शासन के कोरे आश्वासनों से मायूस किसानों ने MP के इस जिले में छोड़ दी खेती

-लगातार संकट झेल रहे किसानों को मिलता रहा केवल आश्वासन

By: Ajay Chaturvedi

Published: 11 Jun 2021, 04:32 PM IST

रीवा. सरकारी आश्वासनो का पिटारा इन किसानो को रास नहीं आया और उन्होंने दलहन की इस फसल की खेती ही छोड़ दी। क्या करें जब खून-पसीना एक कर फसल तैयार करें और वो फसल कोई चट कर जाए तो उनके पास चारा भी तो कुछ और नहीं रहा। कोशिश तो बहुत की, मगर हर चुनाव में केवल नेताओं के आश्वासन ही मिले। ऐसे में उन्होंने थक-हार कर ऐसी खेती ही करना बंद कर दिया जिसे नष्ट होने से वो बचा ही नहीं सकते।

किसान एक-दो नहीं बल्कि दो दशक से गंभीर समस्या से परेशान रहे। ऐसा कोई जिम्मेदार नहीं रह गया जिससे उन्होंने फरियाद न की हो। लेकिन हर दरवाजे से मिला सिर्फ कोरा आश्वासन। ऐसे में उन्होंने दिल पर पत्थर रख कर खेती न करने का कठोर निर्णय ले लिया।

बता दें कि जिले के तराई क्षेत्र के किसान नील गाय और छुट्टा पशुओं से परेशान हैं। वो लगातार इस समस्या के निदान की मांग करते रहे। पर कहीं से कोई सुनवाई नहीं हुई। लिहाजा उन्होंने खेती करना ही छोड़ना मुनासिब समझा। हालांकि उन्होने खेती तो बंद कर दी लेकिन अब वो गंभीर आर्थिक समस्या से जूझ रहे हैं। बेरोजगारी बढ़ रही है सो अलग।

बताया जाता है कि जिले के तराई अंचल के करीब ढाई सौ गांवों में अरहर की फसल बहुतायत में होती रही। आलम यह था कि इलाके में अरहर की मंडी लगती थी। इस मंडी में मध्य प्रदेश ही नहीं दूसरे राज्यों से भी व्यापारी अरहर खरीदने रीवा आते थे। लेकिन अब हालाता बदल गए हैं। यहां का (रीवा का) गल्ला व्यवसायी अब कटनी और नरसिंहपुर से अरहर लाता है अपने बाजार के लिए।

तराई के नील गायों और छुट्टा पशुओं की समस्या को लेकर किसानों ने 2007- 2009- 2012 में बड़ा आंदोलन भी किया था। उस वक्त तत्कालीन मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने नीलगाय से निबटने के लिए रोजगार योजना बनाए जाने की घोषणा की थी। आवारा पशुओं को गोशाला में रखकर किसानों को राहत देने का आश्वासन भी मिला था। लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। ऐसे में किसान परेशान हैं।

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