अंतरराष्ट्रीय तैराक कैप्टन बजरंगी प्रसाद ने यहां सीखी थी तैराकी, अब जानिए ऐतिहासिक तरण ताल का हाल...

अंतरराष्ट्रीय तैराक कैप्टन बजरंगी प्रसाद ने यहां सीखी थी तैराकी, अब जानिए ऐतिहासिक तरण ताल का हाल...
The international swimmer Captan Bajrangi Prasad learned here swimming

Mahesh Kumar Singh | Publish: May, 18 2019 09:00:53 PM (IST) Rewa, Rewa, Madhya Pradesh, India

जनप्रतिनिधियों ने कर दी उपेक्षा, प्रशासन भी बना अनजान, पानी की जगह है केवल घास

 

रीवा. अंतरराष्ट्रीय तैराक कैप्टन बजरंगी प्रसाद ने यहां तैराकी सीखी थी। इसके बाद उन्होंने पूरी दुनियां में भारत का नाम रोशन किया था। एक समय था जब यह तरणताल हरा-भरा था, लेकिन अब गुमनामी के अंधेरे में है। शासन-प्रशासन ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण का दम तो भरते हैं लेकिन उनकी लगातार उपेक्षा की जा रही है। बड़ीहर्दी का ऐतिहासिक तरण ताल प्रशासन द्वारा उपेक्षित कर दिया गया है तो वहीं जनप्रतिनिधियों ने भी इसकी सुध नहीं ली। लिहाजा उसका अस्तित्व नष्ट होने की कगार पर है।

जिले के ग्राम पंचायत बड़ीहर्दी में स्थित इस तरण ताल में कभी तैराकी की संभागीय प्रतियोगिता हुआ करती थी, लेकिन अब यहां पर सन्नाटा पसरा रहता है। एक समय था जब यह हराभरा था और बड़ी स्पर्धांएं आयोजित की जाती थी। लेकिन वर्तमान में यह तरण ताल जगह-जगह से क्षतिग्रस्त हो गया है। गर्मी में पानी नहीं रहता, जल्दी ही सूख जाता है। ताल में घासफूस उग आई है। प्रशिक्षक की कमी तो है ही साथ ही चेंजिंग रूम सहित कई कमियां हैं जिससे इस तरण ताल का अस्तित्व ही समाप्त होता जा रहा है।

ग्रामीण लेवल का पहला स्वीमिंग पूल
बड़ीहर्दी के तरण ताल की खासियत यह है कि भारत का ग्रामीण लेबल का यह पहला स्विमिंग पूल है। जिसमें तैराकी के साथ ही डायविंग एवं वॉटर पोलो एक साथ खेला जा सकता है। यह जेड आकर का बना हुआ है। यहीं कारण था कि इस तरण ताल में ये प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती थीं। लेकिन अब सन्नाटा पसरा रहाता है।

यहीं जन्में थे कैप्टन बजरंगी प्रसाद
छोटे से ग्राम बड़ीहर्दी में कैप्टन बजंरगी प्रसाद शुक्ला पिता रामभाऊ शुक्ला का जन्म 3 मार्च 1929 को हुआ था। बजरंगी प्रसाद बचपन से माता गुजरतिया देवी के साथ तालाब अक्सर जाया करते थे, 6 साल के थे तभी से इस ताल में गोताखोरी किया करते थे और पैरों से छलांग लगाकर डायविंग किया करते थे। उन्होंने इसी तरणताल में तैराकी सीखी।

1961 में एशिया के श्रेष्ठ गोताखोर बने
1956 में राष्ट्रीय डायविंग चैम्पियन शिप में चैयनित हुए और उम्दा डायविंग लगाकर चैम्पियन बन गए। 1956 से 1961 तक राष्ट्रीय डायविंग चैम्पियन बने रहे। 1958 में दो गोल्ड मेडल प्राप्त किया। 1961 में थ्री एण्ड ए हॉफ समर साल्ट लगाकर इतिहास रच दिया और एशिया के श्रेष्ठ गोताखोर घोषित किया गया। उन्होंने सेवा निवृत्ति के बाद गांव में बच्चों को गोताखोरी सिखाया। उनके निधन के बाद से उपरोक्त तरण ताल भी उपेक्षित हो गया।

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