scriptwater plus certification Rewa, swachta survey 2022 | शहर के बीच से गुजरती हैं नदियां, कई तालाब और बावड़ी फिर भी वाटर प्लस नहीं बन सका रीवा | Patrika News

शहर के बीच से गुजरती हैं नदियां, कई तालाब और बावड़ी फिर भी वाटर प्लस नहीं बन सका रीवा


- स्वच्छता सर्वेक्षण में जलस्त्रोतों की सफाई का भी विशेष महत्व
- 214 करोड़ का सीवरेज प्रोजेक्ट मिला फिर भी नदियों का नहीं बना पाए निर्मल

रीवा

Published: February 23, 2022 11:05:57 am


रीवा। स्वच्छता सर्वेक्षण में अब केवल सड़कों का कचरा साफ करने तक का कार्य नहीं है, बल्कि हवा-पानी भी स्वच्छ रखना है। सर्टिफिकेशन में वाटर प्लस की अलग प्रतिस्पर्धा है, जिसमें प्रदेश के इंदौर-भोपाल सहित कुछ ही शहर ऐसे हैं जो इस प्रतिस्पर्धा में शामिल हो रहे हैं। रीवा प्राकृतिक रूप से आकर्षक शहर है। यहां पर दो बड़ी नदियों शहर के बीच से गुजरती हैं, इनमें पानी भी हर समय उपलब्ध होता है। इसके अलावा करीब दर्जनभर की संख्या में तालाब और बावड़ी भी हैं। इसके बावजूद शहर वाटर प्लस की प्रतिस्पर्धा से बाहर है। स्थानीय प्रशासन द्वारा इस दिशा में कोई विशेष प्रयास भी नहीं किए गए। जिसकी वजह से एक हजार अंकों की चुनौती से शहर बाहर हो जाता है। ग्वालियर जैसे कई शहरों ने वाटर प्लस की प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लेने का दावा प्रस्तुत किया है लेकिन रीवा ने इसके लिए प्रयास ही नहीं किया है। गारबेज फ्री सिटी के सेवन स्टार रैंकिंग और वाटर प्लस के लिए कुछ जरूरी मानक भी निर्धारित किए गए हैं, इसमें से अधिकांश का पालन रीवा में नहीं हो रहा है। शहर में बीहर और बिछिया दो बड़ी नदियां बहती हैं, जिसमें बाणसागर बांध का पानी नहर के माध्यम से पहुंचाया जाता है, इस वजह से गर्मी के दिनों में भी इनमें पानी मौजूद रहता है। शहर के भीतर कई तालाब हैं, जिसमें रानीतालाब, चिरहुला तालाब का सौंदर्यीकरण हो चुका है। रतहरा, विभीषण नगर सहित अन्य कई मोहल्लों के तालाबों के उन्नयन का कार्य जारी है। शहर के भीतर कई बावडिय़ां एवं कुएं भी हैं, जिससे जलसंरक्षण को लेकर शहर एक मॉडल के रूप में भी प्रस्तुत किया जा सकता है लेकिन ऐसा नहीं हो सका है।
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नालों के जरिए प्रदूषित हो रही नदियां
शहर में 35 से अधिक बड़े नाले हैं जो बिछिया और बीहर नदियों में अलग-अलग जगह पर मिलते हैं। घरों से निकलने वाला गंदा पानी इन नालों से नदियों तक पहुंचता है। जिसके कारण नदियां भी प्रदूषित हो रही हैं। कुछ वर्षों पहले तक शहर के भीतर कई बड़े नाले जिनमें स्वच्छ पानी बहता था और लोग नहाने तक में इसका उपयोग करते थे। बीते करीब दो दशक से नालों को प्रदूषित करने का कार्य तेजी के साथ हुआ है, जिसके चलते गंदगी बढ़ती ही जा रही है।
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सीवरेज प्रोजेक्ट भी नहीं रहा कारगर
शहर में अमृत योजना के तहत 214.10 करोड़ रुपए की लागत से सीवरेज प्रोजेक्ट की शुरुआत की गई है। इसका कार्य तीन साल में पूरा होना था लेकिन पांच साल के बाद भी करीब 20 फीसदी ही कार्य पूरा हो सका है। इस प्रोजेक्ट के जरिए शहर में 37 एमएलडी क्षमता के सीवरेज वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जाने हैं। जिसमें से 12 एमएलडी का एक एसटीपी पहले से बनकर तैयार है, उसमें केवल सीवर लाइन जोडऩा है लेकिन वह कार्य भी अब तक पूरा नहीं हो सका है। यह प्रोजेक्ट इसीलिए ही शुरू किया गया था कि शहर की नदियों में जो दूषित पानी मिल रहा है, उसे ट्रीटमेंट के बाद नदी में छोड़ा जाए ताकि बीहर और बिछिया का पानी पूरी तरह से निर्मल हो सके। ठेका कंपनी की लापरवाही के चलते अब तक यह कार्य पूरा ही नहीं हो पाया है।
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इंदौर इस तरह से वाटर प्लस सिटी बना
देश के लिए स्वच्छता का मॉडल बने इंदौर शहर ने तेजी से काम भी किया है। वहां पर कुछ साल पहले तक नदियां एवं नाले पूरी तरह से दूषित थे, जिनमें अब दूषित पानी जाने से रोका जा रहा है। वाटर प्लस सिटी के 12 मानकों में इंदौर सफल रहा है। शहर में करीब सात हजार प्वाइंट पर सीवरेज को नदियों में जाने से रोका गया है। सरस्वती और कान्ह नदी का प्रदूषण काफी हद तक कम किया गया है। वर्तमान में इंदौर में 312 एमएलडी सीवरेज वाटर साफ करने के बाद ही नदी में छोड़ा जा रहा है। इस कारण जिन नदियों में काले रंग का पानी था, वह अब पारदर्शी दिखने लगा है।
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वाटर प्लस की इसलिए कराई शुरुआत
स्वच्छता सर्वेक्षण में शहरों के बीच प्रतिस्पर्धा कराकर सरकार ने सफाई व्यवस्था को बेहतर बनाने का प्रयास किया है। इसकी अगली कड़ी में अब शहर के हवा-पानी को भी स्वच्छ रखने की प्रतिस्पर्धा शुरू कराई है। स्वच्छता सर्वेक्षण में वाटर प्लस का सर्टिफिकेशन शुरू करने के पीछे उद्देश्य बताया गया है कि जलाशयों, नदियों को निर्मल रखा जा सके। नदी-नालों का उपयोग केवल बरसाती पानी बहने में किया जाए। सीवरेज के पानी को ट्रीटमेंट के बाद नदी में छोडऩे का मतलब कि वह भी दोबारा उपयोग के लायक रहे। नदी-नालों में न तो सूखा कचरा तैरता मिलना चाहिए और न ही नालों के पानी वजह से उनका पानी प्रदूषित दिखे। वाटर ट्रीटमेंट के बाद उस पानी का करीब 25 प्रतिशत से अधिक उपयोग सड़कों की धुलाई, निर्माण कार्य, गार्डन, खेती आदि के कार्य में होना चाहिए। बीते साल इसके लिए 1800 अंक थे लेकिन इस बार सेवन स्टार सिटी के लिए 1250 अंक और वाटर प्लस के लिए 1000 अंक निर्धारित किए गए हैं।
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