सफेद बाघ मोहन का केयरटेकर गुमनामी की जिंदगी में, जानिए कैसे हो रहा भरणपोषण आश्वासनों पर अमल नहीं

सफेद बाघ मोहन का केयरटेकर गुमनामी की जिंदगी में, जानिए कैसे हो रहा भरणपोषण आश्वासनों पर अमल नहीं
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Mrigendra Singh | Updated: 24 Aug 2019, 03:02:04 AM (IST) Rewa, Rewa, Madhya Pradesh, India


- आर्थिक तंगी के चलते उपचार की भी नहीं मिल पा रही पूरी व्यवस्था
- ह्वाइट टाइगर सफारी के लोकार्पण के दौरान दिया गया था सरकारी मदद का आश्वासन

 



रीवा। दुनिया से सफेद बाघों की पहचान कराने में मुख्य भूमिका निभाने वालों में एक सख्श अब भी जीवित है। वह हैं पुलवा बेरिया, जिन्होंने सफेद बाघ मोहन के केयर टेकर के रूप में लंबे समय तक काम किया है। वर्तमान में जहां भी सफेद बाघ हैं, वह मोहन के ही वंशज हैं। दुनिया को यह नायाब तोहफा देने में पुलवा बेरिया की अहम भूमिका रही है। गोविंदगढ़ के किले में 27 मई 1951 को सफेद बाघ मोहन को लाया गया था। उस दौरान महाराजा मार्तण्ड सिंह ने आधा दर्जन की संख्या में केयर टेकरों को मोहन की देखरेख के लिए तैनात किया था। उसमें किशोर अवस्था के पुलवा भी शामिल थे। इनदिनों उम्र के आखिरी पड़ाव में वह हैं, तबियत भी लगातार खराब चल रही है।

दवा कराने के लिए भी पर्याप्त संसाधन नहीं है। सरकार या समाज की ओर से भी कोई सहयोग नहीं मिल रहा, जिससे गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं। इनदिनों रीवा शहर में ही बेटी ऊषा और दामाद राजू पीटर के साथ रह रहे हैं। गोविंदगढ़ स्थित घर भी आना-जाना रहता है। पुलवा ने बताया कि मोहन की मौत के बाद दिल्ली के चिडिय़ाघर में उन्हें नौकरी दी गई थी, लंबे समय तक वहां सेवा करने के बाद वापस लौटे हैं। अब परिवार के साथ रह रहे हैं।


- अधिकारियों ने हर संभव मदद का दिया था आश्वासन
मुकुंदपुर में ह्वाइट टाइगर सफारी की शुरुआत के दौरान पुलवा को विशेष रूप से बुलाया गया था। उस समय सरकार के मंत्री और अधिकारियों की ओर से आश्वासन दिया गया था, पुलवा को प्रशासनिक तौर पर हर संभव मदद की जाएगी। इसके बाद से अब तक न तो किसी जनप्रतिनिधि ने पुलवा और उसके परिवार की सुध ली और न ही कोई प्रशासनिक अधिकारी पहुंचा।
- मोहन के साथ दिल्ली भी भेजे गए थे
सफेद बाघ मोहन को भारत सरकार ने एक कार्यक्रम में विशेष रूप से दिल्ली मंगवाया था। मोहन के साथ पुलवा भी गए थे और उन्होंने उस बड़े कार्यक्रम में मोहन की झांकी के साथ कई देशों के प्रतिनिधियों के सामने पेश हुए थे। मोहन के पालन से जुड़े सभी प्रमुख लोगों की मौत हो चुकी है। वर्तमान में केवल पुलवा बेरिया ही बचे हैं।

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