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11 प्रसूताओं की मौत हुई उनमें से 6 मौतें प्रसव बाद हुए रक्त स्त्राव से हुईं 

सागर. बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज की कार्यकारिणी समिति की नव नियुक्त अध्यक्ष डॉ. अरूणा कुमार गुरुवार को पहली बार सागर पहुंचीं। बीएमसी कार्यकारिणी समिति की अध्यक्ष होने के साथ-साथ व एनएचएम की नीति व विनियम निर्देशक भी हैं लिहाजा सागर आने पर उन्होंने सिविल लाइन के एक होटल में मातृ मृत्यु दर को लेकर राज्य स्तरीय […]

सागरJun 21, 2024 / 11:22 am

Murari Soni

सागर. बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज की कार्यकारिणी समिति की नव नियुक्त अध्यक्ष डॉ. अरूणा कुमार गुरुवार को पहली बार सागर पहुंचीं। बीएमसी कार्यकारिणी समिति की अध्यक्ष होने के साथ-साथ व एनएचएम की नीति व विनियम निर्देशक भी हैं लिहाजा सागर आने पर उन्होंने सिविल लाइन के एक होटल में मातृ मृत्यु दर को लेकर राज्य स्तरीय बैठक भी की। बैठक में संभाग के 11 प्रसूताओं की मौत के मामले रखे गए और इन मामलों में वर्चुअल रूप से जुड़े प्रदेशभर के स्वास्थ्य अधिकारियों ने अपने विचार रखे।बैठक में खुलासा हुआ कि अप्रेल माह में संभाग के सागर, दमोह, छतरपुर और पन्ना में जिन 11 प्रसूताओं की मौत हुई उनमें से 6 मौतें प्रसव बाद हुए रक्त स्त्राव से हुईं हैं। वहीं 11 में से सिर्फ 4 मौतें जिसमें जबलपुर, सागर और झांसी मेडिकल कॉलेज में 1-1 और एक मौत छतरपुर जिला अस्पताल में हुई है। जबकि अन्य मौतें निजी अस्पताल में दर्ज हुईं। बैठक को संबोधित करते हुए डॉ. अरूणा कुमार ने कहा कि निजी अस्पताल भी सरकारी अस्पताल की गाइडलाइन का पालन करें। प्रसूताओं के मामले में छोटी सी लापरवाही भी गंभीर हो जाती है। सरकारी-निजी अस्पतालों आपस में कम्युनिकेशन बनाकर कार्य करें तो निश्चित ही मातृ मृत्यु दर कम की जा सकती है।

कार्बोप्रोक्ट इंजेक्शन से रोक सकते हैं रक्त स्त्राव-

बैठक में स्वास्थ्य विभाग की क्षेत्रीय संचालक डॉ. ज्योति चौहान ने बताया कि प्रसव बाद होने वाले रक्त स्त्राव को रोकने के लिए मरीज को 15-15 मिनट में आठ बार कार्बोप्रोक्ट इंजेक्शन लगा सकते हैं। लेकिन कई बार निजी अस्पताल के डॉक्टर्स डर के कारण सिर्फइंजेक्शन ही लगाते हैं और मरीज का सही इलाज नहीं हो पाता।

4 गुना बढ़ी रिपोर्टिंग-

संभाग के 6 जिलों की करीब सवा करोड़ की आबादी में मातृ मृत्युदर कम होने की जानकारी स्वास्थ्य अधिकारियों ने दी। निजी अस्पताल भी प्रसूताओं की मौत की रिपोर्टिंग कर रहे हैं। विगत सप्ताह डीन कार्यालय में हुई निजी नर्सिंग होम की बैठक में दिए गए निर्देश के कारण अब पोर्टल पर रिपोर्टिंग 4 गुना बढ़ी है। 84 केस की जानकारी अपलोड हो गई है। अभी तक 132 में से सिर्फ 25-26 केस की जानकारी ही निजी अस्पताल संचालकों ने दर्ज की थी।बैठक में ये रहे शामिल-प्रदेश स्तरीय बैठक में प्रदेशभर के स्वास्थ्य अधिकारी वीडियो कांफ्रेंस से जुड़े रहे। वहीं संभाग के जिला अस्पतालों के सिविल सर्जन, सीएमएचओ। 11 केस के परिजन, मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर्स, संबंधित केस की आशा, एएनएम, सीएचओ, नर्सिंग ऑफिसर आदि बैठक में शामिल रहे।

प्रसूताओं की मौत में ये गैप निकले-

-सरकारी व निजी अस्पतालों में ब्लड प्रेशर की दवाइयों में अंतर।

-निजी व सरकारी अस्पताल के डॉक्टर्स में कम्युनिकेशन गैप।

-दवाईयों का ब्यौरा मरीज के साथ में न रखना।
-वेंटीलेटर के मरीज को सामान्य एम्बुलेंस में भेजना।

-लेडी डॉक्टर्स का अभाव।

-सरकारी अस्पतालों की गाइडलाइन का पालन न करना।

एक दूसरे का नंबर रखें और बात करें अस्पताल प्रबंधन-

बैठक में चर्चा हुई कि मालथौन से गंभीर हालत में आई महिला पहले बीएमसी गई और वहा कैजुअल्टी से वापिस चैतन्य हॉस्पिटल गई। मरीज की हालत खराब थी और ब्लड प्रेशर की वजह से उसकी मौत हो गई। पता चला कि मरीज मालथौन में हुई दवाओं का पर्चा वहीं भूल गई, बीएमसी में क्या इलाज हुआ इसकी जानकारी एक दूसरे अस्पतालों से पूछने की जहमत किसी ने नहीं उठाई। निर्देश दिए गए कि सभी सरकारी और प्राइवेट अस्पताल एक दूसरे के नंबर रखें, प्रसूता आएं तो उनकी हिस्ट्री, इलाज पूछे, संबंधित डॉक्टर्स से भी जानकारी लें।

पन्ना के जिला अस्पताल में भी लेडी डॉक्टर नहीं-

बैठक में सामने आया कि पन्ना जिला अस्पताल में लेडी डॉक्टर्स ही नहीं है। यहां 5 ब्लॉक में सिर्फ एक लेडी डॉक्टर हैं। यहां क्षेत्रीय संचालक ने क्लास वन अधिकारी डॉक्टर को ड्यूटी करने के निर्देश दिए हैं।

अप्रेल में हुई 11 प्रसूताओं के मामले-

जिला ग्रामीण शहर

सागर 3 0

दमोह 0 1

पन्ना 2 0

छतरपुर 4 1

टीकमगढ़ 0 0-

डॉ. अरूणा कुमार मैडम ने संभाग में प्रदेश स्तरीय बैठक ली और संभाग के 11 केस पर चर्चा की। अच्छी बात ये रही कि सभी केस से संबंधित स्वास्थ्य अधिकारी-कर्मचारी मौजूद रहे। यहां तक की निजी अस्पतालों के लोग भी बैठक में थे, सभी ने मातृ मृत्यु दर कम करने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए। हमारे यहां मातृ मृत्यु का रेशियो कम है फिर भी हमारी कोशिशें जारी हैं कि इसको और कम किया जाए।
डॉ. ज्योति चौहान, क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य सेवाएं।

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