सागर. ज्ञान का धन, धन के सभी रूपों में सबसे बड़ा है। इसे धन या संपत्ति की तरह चोरी नहीं किया जा सकता। इसे दूर नहीं किया जा सकता है और न ही भूमि की तरह इसे हटाया जा सकता है। न ही इसे विरासत में मिली संपत्ति की तरह भाइयों में बांटा जा सकता है। यह कभी बोझ नहीं होता। यह बात मुख्य अतिथि पद्म विभूषण और इसरो के पूर्व अध्यक्ष डॉ. कृष्णास्वामी कस्तूरीरंगन ने दीक्षांत समारोह के दौरान कही। उन्होंने कहा कि हरिसिंह गौर विवि को मध्य प्रदेश का सबसे पुराना और सबसे बड़ा विवि होने का गौरव प्राप्त है। 1946 में सर गौर द्वारा स्थापित विवि का नाम सागौर विवि था, लेकिन 1983 में इसके संस्थापक डॉ. गौर के सम्मान में मध्य प्रदेश सरकार ने नाम बदलकर डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय रखा।

विवि के 28 वे दीक्षांत समारोह में बतौर मुख्य अतिथि रहे डॉ. कस्तूरीरंगन ने सभी यूजी, पीजी और पीएचडी की उपाधि से सम्मानित होने अभ्यर्थियों को बधाई दी।
सर गौर को लेकर उन्होंने कहा कि सर गौर एक बहुआयामी व्यक्तित्व थे। वे न केवल एक प्रतिष्ठित वकील, एक प्रख्यात न्यायविद्, एक प्रगतिशील विद्वान और एक महान समाज सुधारक थे, बल्कि एक प्रसिद्ध शिक्षाविद् भी थे। शिक्षा के क्षेत्र में उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। उन्होंने सागर को मप्र का हदय कहा। साथ ही हिंदी साहित्य में सागर को विशेष योगदान देने वाला जिला बताया। डॉ. कस्तूरीरंगन ने कहा कि मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि यह विवि प्राचीन भारतीय संस्कृति और पुरातत्व, भाषा, संगीत, योग विज्ञान, अपराध विज्ञान और फॉरेंसिक विज्ञान में यूजी और पीजी के डिप्लोमा पाठ्यक्रम प्रदान करता है।

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned