आचार्यश्री के चरण सागर में पड़ें तो लेंगे दीक्षा,जिले से 25 मुनि और 57 आर्यिकाओं ने ली है दीक्षा

अब तक जिले से २५ और ५७ आर्यिकाओं ने ली है दीक्षा

By: Samved Jain

Published: 07 Jun 2018, 12:01 PM IST

सागर. युग बीतते हैं और सृष्टियां बदलती रहती हैं। इसमें कुछ व्यक्तित्व अपनी गाथाओं को चिरस्थाई बना देते हैं। इस बीच उन्हीं महापुरुषों का जीवन स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाता है, जो जनमानस को अंधेरे से निकालकर प्रकाश में लाते हैं।
ऐसे ही स्वावलंबी जीवन जीने वाले सर्वोच्च जनों में जैन संत आचार्य विद्यासागर महाराज का नाम आता है। इन्होंने अनुशासन को अपनी ढाल बनाया और तैयार कर दी हजारों संयमी युवाओं की सुगठित धर्म सेना। इन संयमी युवाओं में सागर का नाम सबसे आगे आता है।
आचार्यश्री ने जिले के २५ मुनि, ५७ आर्यिकाओं को दीक्षा दी है। प्रदेश में जिले से सबसे अधिक दीक्षाएं हुई हैं। १९८० से शुरू हुआ यह सिलसिला अभी रुका नहीं है। अब चूंकि टीकमगढ़ जिले के पपौराजी में विराजमान आचार्यश्री को चातुर्मास के लिए सागर के श्रद्धालुओं ने श्रीफल भेंट किया है। यदि उनका शहर में चातुर्मास होता है तो ब्रह्मचारी व्रत का पालन कर रहे भैया मुनि दीक्षा लेंगे, जो नौकरी, व्यापार छोड़ आचार्यश्री का सानिध्य पाना चाहते हैं।
इनमें ब्रह्मचारी राजा भैया, ब्रह्मचारी डॉ. अमित जैन बीएमसी, ब्रह्मचारी राजेश जैन, ब्रह्मचारी राकेश भैया, ब्रह्मचारी आकाश भैया का नाम शामिल है।
पीएचडी करके रच रहे जैन साहित्य
ब्रह्मचारी भरत भैया ने २० वर्ष पहले आचार्य विद्यासागर महाराज से ब्रह्मचर्य व्रत लिया था। जैन दर्शन से एमफिल, पीएचडी करने के बाद जिनवाणी की सेवा कर रहे हैं। उन्होंने आचार्यश्री द्वारा लिखित ५० ग्रंथों का संपादन करते हुए आधा सैकड़ा से ज्यादा पुराने ग्रंथों को पुन: प्रकाशित भी किया है। इसके अतिरिक्त धर्मोदय विद्यापीठ की स्थापना की। उन्होंने बताया कि अभी आचार्यश्री से दो प्रतिमा लेकर संयम के मार्ग पर चल रहे हैं।
आचार्यश्री के बुलावे का इंतजार
२००८ में आचार्यश्री से ब्रह्मचारी राजेश भैया ने व्रत लिया था। इससे पहले २००६ में बीएसएनएल में सरकारी नौकरी लग चुकी थी और अभी जेपीओ के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने बताया कि परिवार में सभी सरकारी नौकरी में हैं। मां गेंदाबाई भी शिक्षिका रहीं। भाई भी शिक्षक हैं। मुनि दीक्षा के भाव हैं और आचार्यश्री के बुलावे का इंतजार है। जब ब्रह्मचर्य व्रत लिया तो आचार्यश्री का कहना था कि घर पर रहकर साधना करें और संयम के मार्ग पर चलें।

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