बिहार-यूपी होते हुए सागर में फैला जापानी बुखार का वायरस, 8 साल का मासूम पीड़ित

बिहार-यूपी होते हुए सागर में फैला जापानी बुखार का वायरस, 8 साल का मासूम पीड़ित

Manish Kumar Dubey | Publish: Sep, 08 2018 04:45:06 PM (IST) Sagar, Madhya Pradesh, India

मरीज, 20 दिन से भोपाल के निजी मेडिकल कॉलेज में भर्ती, हालत गंभीर, राज्य बीमारी सहायता से महज मिले 25 हजार, 2.50 लाख रुपए का है खर्चा

आकाश तिवारी.
सागर. उप्र और बिहार में फैले जापानी बखार यानी एन्सेफलाइटिस वायरस ने सागर में दस्तक दे दी है। यह वायरस खुरई के एक गांव में रहने वाले आठ साल के मासूम में निकला है। वर्तमान में मासूम भोपाल के निजी मेडिकल कॉलेज में भर्ती है, जहां उसकी हालत गंभीर बताई जा रही है। विशेषज्ञों की मानंे तो इस वायरस की चपेट में आने वाले मरीज के बचने की उम्मीद 30 फीसदी रहती है। यदि मरीज बच भी जाता है तो उसे कभी भी लकवा, हाथ पैर काम न करने जैसी शिकायत हो सकती है। उधर, स्वास्थ्य विभाग ने इस वायरस के पॉजीटिव मिलने से सागर में अलर्ट भी जारी किया है और विभाग को पीडि़त के गांव में सर्वे के निर्देश भी दिए हैं।
तेज बुखार की थी शिकायत
पीडि़त मासूम के पिता धर्मेंद्र ने बताया कि १६ अगस्त को उसके बेटे को तेज बुखार आया था, जिसे खुरई में डॉक्टर को दिखाया। उन्होंने मलेरिया की आशंका जताई थी और जांचें कराई, लेकिन उससे कोई फायदा नहीं मिला। इसके बाद उसे वह कटरा स्थित एक निजी अस्पताल लेकर आया, जहां डॉक्टर ने उसकी हालत गंभीर बताते हुए भोपाल के चिरायु मेडिकल कॉलेज जाने की सलाह दी। पिता धमेंद्र ने पहले वह छोटी चिरायु अपने बेटे को लेकर गया, जहां तीन दिन तक भर्ती रहा। इसके बाद डॉक्टरों ने उसे बड़े चिरायु अस्पताल रेफर कर दिया।
यह है इस बीमारी का कारण
चावलों के खेतों में पनपने वाले मच्छरों से (प्रमुख रूप से क्युलेक्स ट्रायटेनियरहिंचस समूह)। यह मच्छर जापानी एन्सेफलाइटिस वायरस से संक्रमित हो जाते हैं। (सेंट लुई एन्सेफलाइटिस वायरस एंटीजनीक्ली से संबंधित एक फ्लेविवायरस)। जापानी एनसिफेलिटिस वायरस से संक्रमित मच्छरों के काटने से होता है। जापानी एन्सेफलाइटिस वायरस से संक्रांत पालतू ***** और जंगली पक्षियों के काटने पर मच्छर संक्रांत हो जाते है। इसके बाद संक्रांत मच्छर पोषण के दौरान जापानी एन्सेफलाइटिस वायरस काटने पर मानव और जानवरों में जाते हैं। जापानी एन्सेफलाइटिस वायरस पालतू ***** और जंगली पक्षियों के रक्त प्रणाली में परिवर्धित होते हैं। जापानी एन्सेफलाइटिस के वायरस का संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं होता है।
इसकी कोई विशेष चिकित्सा नहीं है। गहन सहायक चिकित्सा की जाती है। यह रोग अलग अलग देशों में अलग अलग समय पर होता है। क्षेत्र विशेष के हिसाब से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले, वहां प्रतिनियुक्त सक्रिय ड्यूटी वाले सैनिक और ग्रामीण क्षेत्रों में घूमने वालों को यह बीमारी अधिक होती है। शहरी क्षेत्रों में जापानी एन्सेफलाइटिस सामान्यत: नहीं होता है।

रीड़ की हड्डी का पानी निकालकर हुई जांच
मासूम के पिता ने बताया कि अस्पताल में बेटे की रीड़ की हड्डी का पानी निकाला गया था, जिसके सेंपल दिल्ली जांच के लिए भेजे गए थे। तीन दिन बाद उसकी रिपोर्ट आई, जिसमें जापानी बीमारी होना बताया गया था। पिता ने बताया कि उसे २५-२५ हजार रुपए के इंजेक्शन लग रहे हैं। पिता ने बताया कि उसने एक लाख रुपए का स्टीमेट बनाकर राज्यबीमारी सहायता के तहत दिया था, लेकिन उसे सिर्फ २५ हजार रुपए की सहायता राशि ही वहीं से मिल सकी है। पीडि़त पिता मजदूरी करता है और उपचार में दो लाख रुपए खर्च आना है। उसे अब बेटे के
इलाज की चिंता सता रही है।
यह हैं लक्षण
चिकित्सकों के अनुसार यह बीमारी होने पर मरीज को सिर दर्द के साथ बुखार को छोड़कर हल्के संक्रमण में और कोई प्रत्यक्ष लक्षण नहीं होता है। गंभीर प्रकार के संक्रमण में सिरदर्द, तेज बुखार, गर्दन में अकडऩ, घबराहट, कोमा में चले जाना, कंपकंपीं, कभी-कभी ऐंठन और मस्तिष्क निष्क्रिय होता है।

संभाग में पहला केस
& यह बीमारी बिहार और यूपी में कॉमन है। सागर संभाग में यह पहला केस हैं। इस तरह की बीमारी का उपचार संभव नहीं है। भागलपुर में शिशुओं की मौत भी इसी बीमारी की वजह से हुई थी।
डॉ. मनीष जैन, मेडिसिन
विशेषज्ञ बीएमसी
सर्वे के दिए हैं निर्देश
यह मामला मेरे संज्ञान में आया है। मैंने मलेरिया अधिकारी को पीडि़त के गांव में सर्वे के निर्देश दे दिए हैं। वहां
फॉगिंग भी कराई जाएगी।
टीम आज गांव जाएंगी।
डॉ. इंद्राज सिंह, सीएमचओ

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