डीएनए सैंपलिंग में पुलिस की मामूली सी भी त्रुटि से सजा से बच सकते हैं आरोपी

डीएनए सैंपलिंग में पुलिस की मामूली सी भी त्रुटि से सजा से बच सकते हैं आरोपी

Nitin Sadafal | Publish: Sep, 10 2018 11:10:34 AM (IST) Sagar, Madhya Pradesh, India

ब्लड-बोन सैंपलिंग के 30 फीसदी मामले हो जाते हैं मिसमैच

सागर. आपराधिक वारदातों की विवेचना के दौरान लिए जाने वाले सैंपलिंग में पुलिसकर्मियों की मामूली सी चूक डीएनए सेंपलों के नतीजों को प्रभावित कर सकती है। सैंपल लेने में हुई यही एक गलती आरोपी को कानून के फंदे से बचा सकती है और इससे पीडि़त न्याय से वंचित हो सकता है। डीएनए टेस्ट के लिए ब्लड, बोन, स्पर्म या अन्य सेंपलों में पुलिसकर्मियों की इन्हीं छोटी भूल के कारण अब तक कई मामलों में टेस्टिंग के नतीजे फेल हुए हैं। आपराधिक वारदातों में पड़ताल के दौरान पुलिस द्वारा डीएनए लैब भेजे जाने वाले सैंपलों में त्रुटि न हो इसीलिए अब प्रदेश में ई-फोरेंसिक सिस्टम तैयार किया जा रहा है।
बलात्कार, हत्या जैसी संगीन आपराधिक वारदातों में आरोप सिद्ध कर आरोपी को सजा दिलाने में वैज्ञानिक साक्ष्य सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इसीलिए फोरेंसिक और मेडिकोलीगल साक्ष्यों के तथ्यों को सबसे सटीक होने से जिन मामलों में पुलिस के हाथ ये साक्ष्य होते हैं, उन प्रकरणों में आरोपियों पर दोष सिद्ध होने से सजा की सबसे अधिक संभावना होती है। प्रदेश की इकलौती डीएनए लैब में हर दिन करीब 15 सेंपल परीक्षण के लिए पहुंचते हैं। निर्धारित प्रक्रिया, फोरेंसिक एक्सपर्ट या डॉक्टर के निर्देशन के बिना की गई सेंपलिंग के कारण करीब 30 से 35फीसदी सेंपल मिसमैच या फेल हो जाते हैं। 12 सितम्बर 2015 में हुए पेटलावद ब्लास्ट को आसानी से नहीं भूला जा सकता। बस्ती के बीच जिलेटिन रॉड का स्टोरेज ब्लास्ट और दर्दनाक हादसे की वजह बना था। ब्लास्ट में करीब 78 लोगों की मौत हुई थी जिनमें से कुछ के तो परखच्चे उडऩे से शवों की पहचान तक नहीं हो सकी थी। इसी में गोदाम का मालिक और ब्लास्ट के गायब आरोपी राजेन्द्र कांसवा की पहचान डीएनए टेस्ट से ही हो सकी थी। ब्लास्ट के समय वह मौके पर मौजूद थे और फिर लापता हो गया था। पुलिस ने उसकी पहचान के लिए मौके पर मिले ब्लड, हड्डियों के करीब दो दर्जन सेंपल पहुंचाए थे लेकिन लगभग 80 फीसदी सेंपलिंग सही न होने से मिसमैच या फेल हो गए थे। आखिर में बोनमेरो के सेंपल से उसकी मौत की पुष्टि सागर फोरेंसिक लैब के वैज्ञानिक अधिकारियों द्वारा की जा सकी थी।

डीएनए टेस्ट ने दिलाई आरोपियों को सजा
2005-06 में खंडवा से लापता हुए युवक की तलाश में पुलिस महीने-दो महीने भटकती रही। पुलिस ने जब उसी के एक साथी पर सख्ती दिखाई तो उसने हत्या के बाद शव जलाकर राख मिट्टी में मिलाने की बात कबूल की थी। पड़ताल करते हुए पुलिस ने खेत की कई जगह खुदाई कराई तो उसमें एक दांत और कुछ अधजली हड्डियां बरामद हुई थी। दांत व हड्डी से डीएनए सेंपल लेकर उसके माता-पिता के डीएनए से मैच कर पहचान की गई थी। इन वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर हाल ही में हत्या के आरोपियों को पुलिस उम्रकैद से दण्डित करा पाई।

अब रियल टाइम बेस्ड होगा सिस्टम
वैज्ञानिक साक्ष्यों की प्रमाणिकता कोर्ट में सबसे ज्यादा मान्य होती है। इसीलिए अब प्रदेश में हाइकोर्ट के निर्देशन में ई-फोरेंसिक सिस्टम तैयार किया जा रहा है। जिसमें सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन में मुताबिक वारदात के बाद वैज्ञानिक साक्ष्य एकत्रित करने से लेकर हर कार्रवाई की वीडियो बनाकर उसे पोर्टल पर अपलोड किया जाएगा। इससे फोरेंसिक, मेडिकोलीगल साक्ष्य व परीक्षण की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और रियल टाइमबेस्ड हो जाएगी। फिर सेंपल लेने से लेकर परीक्षण के नतीजों पर किसी प्रकार की आशंका भी नहीं जताई जा सकेगी। इसलिए इनकी प्रमाणिकता भी रहती है।

ये हैं जरूरी मानदड
1. ब्लड या अन्य तरल के सैंपल साफ बाक्स में लिए जाने चाहिए।
2. ब्लड सैंपल यदि नमीदार एयर टाइट बॉक्स में होगा तो उसमें कीड़े पडऩे से परीक्षण योग्य नहीं होगा।
3. स्पर्म, ब्लड सैंपल दूषित या मिश्रित नहीं होने चाहिए।
4. फोरेंसिक एक्सपर्ट की मौजूदगी या मौके से लाए सैंपल डॉक्टर की मार्गदर्शन में तैयार होने चाहिए।

फोरेंसिक व मेडिकोलीगल साक्ष्य सबसे ज्यादा ठोस और सटीक होते हैं। अन्य साक्ष्य और गवाह भले ही प्रभावित हो जाएं लेकिन वैज्ञानिक साक्ष्यों में बदलाव संभव नहीं है। इसलिए इन्हें कोर्ट सबसे महत्वपूर्ण मानता है।
डीसी सागर, एडीजी (तकनीकी) मप्र पुलिस

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