सागर. धरा हो गई धन्य तपन का मौसम गुजर गया हे, प्रेम नगर पर आ कर कोई बादल ठहर गया है। ये जहरीला घूंट कसम से हंसकर पी जाऊंगा, मेरी लाश को मिले तिरंगा मरकर के जी जाऊंगा। सर्द रात में गौर प्रांगण में आयोजित कवि सम्मेलन में जयपुर के अशोक चारण की इन कविताओं की पंक्तियों ने गौर प्रांगण में मौजूद दर्शकों को कुर्सी से बांधे रखा। बता दें कि सर गौर की १५० वीं जयंती पर विवि में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस कवि सम्मेलन में देश के जाने माने प्रसिद्ध कवियों को आमंत्रित किया गया है। जयपुर के प्रसिद्ध कवि ने अशोक चारण ने महिला अत्याचार, देश के सैनिकों और जेएनयू पर आधारित कविता प्रस्तुत की। उनकी यह प्रस्तुति बेहद सराही गई। आयोजन स्थल पर मौजूद छात्र-छात्राओं ने तालियों से उनकी कविताओं को सराहा। अन्य कवि अशोक सुंदरानी सतना, अर्चना अर्चन जबलपुर, डॉ. श्याम मनोहर सिरोठिया सागर, श्रीराम बदावर इटावा, अशोक मिजाज सागर, शिव कुमार अर्चन ने भी सर गौर से जुड़ी कविताएं कहीं। कविताओं का दौरान देर रात तक चलता रहा। गौर प्रांगण में बड़ी संख्या में दर्शकों की मौजूदगी रही।

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned