2018 asian games : ऐसे तैयार हो रही हॉकी की नींव,GOLD की उम्मीद करना भी बेइमानी

2018 asian games : ऐसे तैयार हो रही हॉकी की नींव,GOLD की उम्मीद करना भी बेइमानी

Samved Jain | Updated: 19 Aug 2018, 02:29:10 PM (IST) Sagar, Madhya Pradesh, India

ऐसे तैयार हो रही हॉकी की नींव, गोल्ड की उम्मीद करना भी बेइमानी

सागर. खेल और खेल भावना के कई किस्से बड़े परदे पर देखने को मिल रहे हैं। 15 अगस्त को ही अक्षय कुमार स्टारर फिल्म गोल्ड रिलीज हुई। यह फिल्म 1948 के लंदन ओलिंपिक्स में हॉकी पर आधारित है। इससे पहले हॉकी पर ही दिलजीत दोसांझ स्टारर फिल्म सूरमा रिलीज हुई थी। इधर, इंडोनेशिया में शनिवार से एशियन गेम्स शुरू होने के साथ ही मेडल जीतने की दौड़ शुरू हो गई है। भारत के राष्ट्रीय खेल हॉकी को देखें तो इसका स्वर्णिम इतिहास रहा है। इन सबके बीच सागर संभाग में महिला हॉकी निराशाजनक तस्वीर के रूप में सामने है।

 

शहर में पुरुष ही नहीं, बल्कि महिला खिलाडि़यों की भी हॉकी के प्रति दीवानगी कम नहीं। परिवार का साथ संसाधन की कमी और खेल के प्रति उदासीनता के कारण ये खिलाड़ी आगे नहीं आ पा रहीं। स्कूलों में लड़कियों को खेल के लिए प्रोत्साहित न करने के कारण ही आज कॉलेज स्तर पर खिलाड़ी ढूंढ़े नहीं मिल रहीं। जो हैं भी उन्हें विनती कर खेलने को कहा जाता है और टीम बनाई जाती है। संभाग की बात करें तो सिर्फ गल्र्स डिग्री कॉलेज की टीम ही संभाग का प्रतिनिधित्व करती है। इस टीम में कई अच्छी प्लेयर हैं, जिनकी बदौलत टीम विवि जोन स्तर तक प्रदर्शन कर चुकी है।

 

 

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मेहनत ज्यादा है

गर्ल्स कॉलेज की हॉकी खिलाड़ी शुभी नायक ने बताया, पहले से प्रैक्टिस नहीं होती। कॉलेज में अगर खेलने के लिए तैयार भी हो जाती हैं तो मेहनत नहीं कर पातीं। पारिवारिक कारण भी होते हैं। कई लड़कियों के परिजन भी चोट आदि के डर से हॉकी जैसा खेल नहीं खेलने देते।

 


कुछ दिन पहले से ही ट्रेनिंग-

गर्ल्स हॉकी टीम के लिए गल्र्स कॉलेज की ही टीम आगे आती है। कुछ पुरानी तो कुछ नई छात्राएं शामिल होती हैं। इन्हें विवि या खेल परिसर में स्पर्धा के कुछ दिन पूर्व प्रशिक्षण देकर तैयार किया जाता है। सागर में स्कूल में कहीं भी गल्र्स हॉकी टीम नहीं है, एेसे में कॉलेज में मुश्किल से खिलाड़ी मिल पाती हैं।

 


इतनी मेहनत की जरूरत
10 किलोमीटर औसतन दौडऩा पड़ता है एक मैच में
05 किमी रनिंग और दो घंटे की प्रैक्टिस रोजाना जरूरी
06 साल की प्रैक्टिस होनी चाहिए किसी टूर्नामेंट में खेलने के लिए

 

औसतन कितने रुपए में क्या


02 हजार रुपए में किट
350 हाफ पेंट,
टी-शर्ट
950 हॉकी स्टिक
150 बॉल
1100 शूज
150 सिनगार्ड
150 मोजे


खिलाड़ी : शुरुआत ही कमजोर


राखी चौधरी बताती हैं, गर्मी में कोच मकसूद अहमद और अनवर खान द्वारा ट्रेनिंग कैम्प लगाए जाते हैं। इनमें काफी संख्या में लड़कियां आती हैं। फिलहाल बारिश और खेल परिसर के हॉकी ग्राउंड में काम लगा होने के कारण अपेक्षित प्रैक्टिस संभव नहीं है। इसके पीछे एक कारण संसाधनों की कमी भी है। खिलाडि़यों को शुरुआत में हॉकी सहित अन्य संसाधन न मिल पाने के कारण भी वे रुचि नहीं लेतीं।

 


अधिकारी : बचपन से प्रैक्टिस की जरूरत, ताकि आदत में आए
&गल्र्स कॉलेज की स्पोट्र्स ऑफिसर मोनिका हार्डीकर के अनुसार हॉकी जैसे खेल के लिए छात्राएं तैयार नहीं होतीं। बचपन से प्रैक्टिस न होने के कारण छात्राएं जल्दी थक जाती हैं। स्कूल स्तर से ही हॉकी खेलने की आदत डाली जानी चाहिए। संभाग में केवल गल्र्स कॉलेज की ही महिला हॉकी टीम बनती है।


कोच : फिर भी सिखाते हैं
हॉकी कोच मकसूद खान के अनुसार लड़कियां इतना वर्कआउट नहीं कर पातीं। पारिवारिक और सामाजिक कारणों के चलते भी लड़कियां हॉकी जैसे गेम्स से दूर रहती हैं। फिर भी जिला हॉकी संघ द्वारा इस वर्ष गर्मी में लड़कियों के लिए खेल परिसर में कैम्प लगाकर हॉकी सिखाई गई।

 

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