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Mahua: आदिवासियों की खुशियों का मीटर है महुआ, जायदाद की तरह बंटते हैं पेड़

- महुआ ही तय करता है कि बेटी की शादी कब होगी

सतना। महुआ आदिवासियों की खुशियों का मीटर है। महुआ अच्छा तो साल भर की गृहस्थी का काम अच्छा। नहीं तो सभी तरह के खर्चे टालने पड़ते हैं। सीधी जिले के पोंडी के बुद्धसेन बैगा की बेटी की शादी बीते साल तय हो गई थी। महुआ की फसल अच्छी नहीं हुई, जो हाथ आया भी वह कोरोना महामारी के कारण बिक नहीं पाया था।

सागर

Updated: April 16, 2022 05:52:09 pm

इस बार बाजार में अच्छी मांग होने से बुद्धसेन इसी गर्मी के सीजन में बेटी के हाथ पीले कर देने की तैयारी में जुट गए हैं। उनके जैसे लाखों आदिवासी परिवारों के लिए महुआ खुशियों का मीटर है। इसी से उनके मांगलिक आयोजन तय होते हैं और सालभर के लिए गृहस्थी का बजट भी तैयार होता है। प्रदेश में महुआ का कारोबार 300 करोड़ से अधिक का है।
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महुआ के फूल संग्रहीत करती महिला
सदियों से महुआ आदिवासियों के लिए जीविका का आधार है। यही वजह है कि वे महुआ को किसी देवता से कम नहीं मानते। आज भी आदिवासियों के बीच महुआ के हरे पेड़ काटना सामाजिक अपराध की श्रेणी में है। उन्हें निजी या सरकारी जमीन पर लगे महुआ के पेड़ से फर्क नहीं पड़ता। जिसके व फल और फूल चुनते हैं वह किसी पुस्तैनी संपत्ति से कम नहीं है। परिवारों के बीच महुआ के पेड़ों का बंटवारा जायदाद की तरह होता है। 72 वर्षीय सुखलाल बैगा बताते हैं कि उन्हें पिता से महुआ के 40 पेड़ मिले थे। उम्र बढ़ते ही तीन बेटों को 10-10 पेड़ बांट दिए। 10 पेड़ मेरे पास हैं, जिनके फूल वह अधिया बटाई पर चुनवाते हैं और जो मिलता है, उसी से सालभर का खर्च चलता है। महुआ की फसल अच्छी है इसलिए हरीदीन साकेत भी बेटी की शादी की योजना बना रहे हैं।
जल्दी उतर गया सीजन
आमतौर पर महुए के फूल गिरने का सीजन एक महीने का रहता है। होली बीतते ही फूल चुनने की तैयारी शुरू हो जाती है, जिन परिवारों के बच्चे बाहर होते हैं उन्हें भी बुला लेते हैं। इस साल महुआ के फूल तो खूब आए और गिरे भी पर सीजन जल्दी चला गया। शिवचरण साहू बताते हैं कि महुआ का संबंध रजाई भर ठंड से है। शीत ऋुतु जब उतार पर आती है तो रात 12 बजे से सुबह 5 बजे तक फूल झड़ते हैं। इस बार जल्दी गर्मी शुरू हो गई, इसलिए फूल गिरने का सीजन 15 दिन में खत्म हो गया। फिर भी इस काम में लगे लोगों को अच्छी फसल मिली है।
बिचौलियों के हाथ कारोबार
सरकार ने वनोपज की खरीद में महुआ को भी शामिल किया है। इसका समर्थन मूल्य 35 रुपए किलो तय किया गया है। लेकिन अनाज की तरह इसकी खरीद नहीं होने के कारण आदिवासी परिवार बिचौलियों के हाथ औने-पौने दाम पर इसे बेचने को मजबूर हैं। अभिलाष तिवारी बताते हैं कि सीधी और सिंगरौली जिले में बड़े पैमाने पर महुआ का संग्रहण होता है। लेकिन मंडी नहीं होने के कारण गांव-गांव घूमने वाले बिचौलियों को फूल बेचने को लोग मजबूर हैं। अभिलाष ने बताया कि कुसमी आदिवासी ब्लॉक से लगे छत्तीसगढ़ के जनकपुर में बड़ी महुआ मंडी है। बिचौलिए यहां से खरीदी कर वहां पहुंचा देते हैं। सरकार ने स्वसहायता समूहों को खरीदी का काम सौंपा है, लेकिन अनिश्चितता बहुत होने के कारण आम आदिवासी इसे नहीं बेच पाते हैं।
300 करोड़ का कारोबार
आदिवासियों की नकदी फसल महुआ का प्रदेश में 300 करोड़ से अधिक का कारोबार है। मध्यप्रदेश वन विकास निगम के आंकड़ों के मुताबिक महुआ के फूल और फल का उत्पादन 54 हजार टन से अधिक का है। लेकिन उपयुक्त बाजार नहीं मिल पाने के कारण आदिवासियों को उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। सीधी लुरघुटी के वीरेंद्र पाण्डेय बताते हैं कि आदिवासियों के सामने सबसे बड़ी समस्या भंडारण की है। यही वजह है कि फूल के सूखते ही वे बेच देने को मजबूर होते हैं। अगर सरकार भंडारण की व्यवस्था बनाए तो और अधिक दाम मिल सकते हैं।
शराब में समेट दिया
महुआ स्वाद और पौष्टिकता में बेजोड़ है, लेकिन दुर्भाग्य से इसे शराब में ही समेट दिया गया। जबकि इसके कई सह उत्पाद बनाए जा सकते हैं। कभी महुआ पकवान बनाने के काम में आता था लेकिन अब रसोई से बाहर हो चुके हैं। हालांकि सरकार ने हेरिटेज ड्रिंक के रूप में महुआ के सह उत्पाद को प्रमोट करने के लिए योजना बनाई है।

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