MP Elections 2018 हमें शब्दों के बजाय कृत्यों और चिंतन पर ज्यादा ध्यान देना होगा

MP Elections 2018 हमें शब्दों के बजाय कृत्यों और चिंतन पर ज्यादा ध्यान देना होगा

manish Dubesy | Publish: Sep, 16 2018 05:25:31 PM (IST) Sagar, Madhya Pradesh, India

मैं सरकारी अफसर की पत्नी/गृहिणी, मेरा नजरिया

सागर. सामान्य तौर पर एक गृहिणी से अपेक्षा की जाती है कि वह चौका-चूल्हा संभाले और अपनी सीमित आय से अपने परिवार का समुचित रूप से सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त कर सके। वर्तमान राजनीतिक दशा लोकतंत्र के बजाय भीड़तंत्र की ज्यादा दिख रही है, जो वोटों की राजनीति के लिए तुष्टिकरण को अपना संबल बना रही है। मेरा मानना है कि सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय विकास, आर्थिक प्रगति और राजनीतिक शुचिता के लिए यह आवश्यक है कि हमारे लोकतंत्र के प्रहरी जाति, धर्म, वर्ग, क्षेत्र, भाषा के संकीर्ण चश्मे से राज को ना देखें।
आज जरूरत है एेसे राष्ट्रधर्म, राष्ट्र कर्म, राष्ट्र व्यवहार, और राष्ट्र मनोविज्ञान की, जो संक्रमण काल में संघर्ष को त्याग कर सावयवी सामंजस्य के साथ देश को बढ़ा सके। हमें शब्दों के बजाय कृत्यों और चिंतन पर ज्यादा ध्यान देना होगा। लोकतंत्र की महान परंपरा भारत में हजारों सालों से चली आ रही है। महा जनपद काल में गणतंत्रों का उदय लोकतंत्र की परिकल्पना से ही संभव हुआ।
लोकतंत्र को एेसे वैचारिक मंच के रूप में स्थापित किया गया, जो एक तरफ रामराज्य की परिकल्पना को साकार कर सके और दूसरी तरफ राष्ट्र निर्माण के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक सुदृढ़ीकरण के लिए अपना सार्थक योगदान दे सके। आज मैं एक गृहिणी हूं। मैं एक मां हूं। साथ ही एक प्रशासनिक अधिकारी की पत्नी, लेकिन मैं एक आम गृहिणी की तरफ से अपनी इन भावनाओं को अभिव्यक्त कर रही हूं।
लोकतंत्र में सत्ता का प्रभाव आम जनता से राजनेताओं की तरफ होता है। जनता यह उम्मीद रखती है कि राजनीति और सत्ता का सदुपयोग करके जनता को वह सभी सुविधाएं देंगे जो यथेष्ट रूप से उसकी आकांक्षा को पूरा करेंगे। लोकतंत्र 'सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया सर्वे भद्राणि पश्यंतु मां कश्चित् दुख भाग्भवेतÓ का एक वैचारिक ढांचा है।
(जैसा कि सागर कलेक्टर आलोक कुमार सिंह की पत्नी प्रीति सिंह
ने शशिकांत ढिमोलेे को बताया)

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