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पहली बार आया ऐसा मामला, जानकर हो जाएंगे हैरान

पत्रिका एक्सपोजर: कहीं पर संसोधनों तो कहीं पर कार्य की जरुरत न पडऩे के कारण बच रही राशि, सूत्र बोले- राशि को ठिकाने लगाने बनाई जा रही प्लानिंग, इसलिए दबाया जा रहा है मामला, 350 करोड़ का है प्रोजेक्ट

सागर

Published: March 05, 2022 09:15:11 pm

सागर. जिले के इतिहास में यह पहला मौका है जब कोई प्रोजेक्ट अंडर कॉस्ट में पूरा होने का अनुमान है। सिलसिलेवार समीक्षा के बाद यह तथ्य सामने आए हैं कि 350 करोड़ के वॉटर सप्लाई प्रोजेक्ट में किए गए कुछ संसोधन और कुछ अन्य कारणों के चलते पूरी परियोजना 330 करोड़ रुपए में ही पूरी हो जाएगी। समीक्षा में वे बिंदु भी चिन्हित किए गए हैं जिसकी वजह से प्रोजेक्ट में लागत कम हुई है। इतना बड़ा मामला होने के बावजूद एमपीयूडीसी और वाटर सप्लाई प्रोजेक्ट पर काम करने वाली एजेंसी तथ्यों को दबाने में लगी है, ताकि 20 करोड़ की राशि का उपयोग किया जा सके।

पहली बार आया ऐसा मामला, जानकर हो जाएंगे हैरान
पहली बार आया ऐसा मामला, जानकर हो जाएंगे हैरान
इन मामलों में बची राशि
- शहर के शनिचरी, शुक्रवारी, परकोटा, पुरव्याऊ समेत अन्य ऐसे क्षेत्र जहां पर चट्नानें हैं, वहां पर तय गहराई पर नेटवर्क बिछाने के लिए खुदाई नहीं की गई। टाटा कंपनी को खुदाई करने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा था जिसके कारण एमपीयूडीसी को इस मामले में नियम बदलने पड़े। एजेंसी को एक मीटर की गहराई पर नेटवर्क बिछाना था लेकिन चट्टानी क्षेत्र होने के कारण एक से डेढ़ फीट पर भी पाइपलाइन बिछाई गई। ऐसा लगभग 30 से 35 किलोमीटर के क्षेत्र में किया गया, लिहाजा साढ़े तीन से चार करोड़ की राशि बच गई।
- वाटर सप्लाई प्रोजेक्ट की डीपीआर के मुताबिक एजेंसी को 325 किलोमीटर की सड़क का रेस्टोरेशन करना है लेकिन शहर के ऐसे कई मार्ग रहे, जहां पर सीसी सड़क के बाजू में सामान्य जमीन होने के कारण नेटवर्क बिछा दिया गया और रेस्टोरेशन की जरुरत नहीं पड़ी। इस वजह से रेस्टोरेशन की बड़ी राशि बच गई। कई मार्ग जर्जर थे, इसलिए वहां पर रोड नहीं बनाना पड़ा। इस कार्य में लगभग 5 करोड़ की राशि बचने का अनुमान है।
- शहर में जिन स्थानों पर ओवरहेड टैंक बनाए जाने थे और उसके लिए जो चुनौती बताई जा रही थी, वैसा न होने के कारण इनके निर्माण में कम राशि खर्च हुई है। इसके साथ ही कुछ ओएचटी का स्थान भी परिवर्तित किया गया है जिसके कारण ओएचटी को पानी से भरने वाली पाइपलाइन की लंबाई कम हो गई और इसका असर लागत पर आया। पाइपलाइन की लंबाई कम होने से करीब 3 करोड़ रुपए की राशि बच गई।
- शहरवासियों की मांग पर पिछले एक दशक में नगर निगम प्रशासन ने भी अपने स्तर पर कई क्षेत्रों में नेटवर्क बिछाया था जिसके कारण एजेंसी को ऐसे क्षेत्रों में नेटवर्क नहीं बिछाना पड़ा और इस कार्य की राशि भी बच गई।
- डीपीआर में 6 करोड़ रुपए की राशि उन विभागों के लिए रखी गई थी जिनकी जमीन में से नेटवर्क बिछाने पर उनको हर्जाने के रूप में देना पड़ती है। रेलवे, पीडब्ल्यूडी, वन विभाग समेत अन्य ऐसे विभाग हैं जहां पर संबंधितों को राशि देनी पड़ती है लेकिन निगम प्रशासन की जगह उपलब्ध होने के कारण इस राशि का बड़ा हिस्सा बच गया है।
बची हुई राशि को ठिकाने लगाने की साजिश: सूत्र
सूत्रों की माने तो प्रोजेक्ट के अंडर कॉस्ट पूरा होने की बात सामने आने के बाद नेता और अफसर हरकत में आ गए हैं। इस राशि को ठिकाने लगाने के लिए वर्ष-2003 से 2005 के बीच बिछाए गए नेटवर्क को बदलने पर भी विचार किया जाने लगा है। जबकि डीपीआर में यह बात का विशेष रूप से उल्लेख किया गया था कि उक्त समयावधि में बिछाया गया नेटवर्क बिलकुल सही है और उसका सालों तक उपयोग किया जा सकता है।
डीपीआर में पाइपलाइन
- 40.31 किमी की सीआई पाइपलाइन वर्ष-2003-05 में बिछाई गई
- 33.28 किमी की एसी पाइपलाइन वर्ष-2003-05 में बिछाई गई
- 139 किमी का नेटवर्क वर्ष-1958 में बिछाया गया
- 40 किमी का नेटवर्क दोबारा उपयोग के लायक है

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