vedio यहां पानी में तैरती है पत्थर की नाव और सूर्य घड़ी से देखते है समय

Reshu Jain | Publish: May, 18 2019 07:01:01 AM (IST) Sagar, Sagar, Madhya Pradesh, India

- अनेक देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को अब गैलरी में मिली जगह

- पत्थर की नाव और सूर्य घड़ी भी देख सकेंगे अब लोग

 

 

 

सागर. यह है संभागीय मुख्यालय सागर का पुरात्तव संग्रहालय, जो ऐतिहासिक विरासत को सहेजे हुए है। यहां १०वीं सदी से 18वीं सदी तक की बेशकीमती पत्थर की प्रतिमाएं व अन्य सामग्री महफूज हैं। यहां शैव प्रतिमाएं, वैष्णव प्रतिमाएं , जैन धर्म की प्रतिमाओं के सहित कई दुर्लभ पत्थर हैं। साथ ही एक पत्थन की नाव और सूर्य घड़ी भी मौजूद है। इस संग्रहालय में ४८० प्रतिमाएं हैं, जिसमें से लगभग अब १५५ प्रतिमाओं को गैलरी में लगाया जा चुका है। जिसमें इनके इतिहास को भी दर्शाया जा रहा है, ताकि यहां आने वाले दर्शकों को आसानी से जानकारी मिल सके।

शिव का है पूरा परिवार

शिव एक पारिवारिक देवता के रूप में पूजे जाते हैं। शिव को अनेकों नामों से जाना जाता है। चंद्रशेखर, विश्वनाथ, नीलकंठ, मृत्युंजय आदि। इस संग्रहालय में शिव से संबधित- प्रतिमाओं में उमा-महेश्वर, अन्धकासुरबध, रावणा-नुग्रह,महाकाल शिव जो कि भारतीय कला में दुर्लभ कृति है। ग्राम मढ़पिपरिया से प्राप्त अष्टभुजी महाकाल शिव प्रतिमा, जो कला और स्वरूप में अनूठी है। यहां शिव त्रिमुंडल जटा जूट से सुशोभित हैं।

संयुक्त देवी-देवताओं की हैं प्रतिमा
संग्रहालय में संयुक्त देवताओं की प्रतिमाएं भी संग्रहित हैं। जो कि उस समय के समाज की धार्मिक भावना की सूझ-बूझ की परिचायक हैं। बीना से प्राप्त हरिहर की प्रतिमा है। इसके अलावा ग्राम मढ़पिपरिया से ही प्राप्त एक अर्धनारीश्वर की प्रतिमा का संग्रह है।

पहले तीर्थंकर हैं यहां

जैन धर्म के पहले तीर्थंकर भगवान आदि की ११वीं सदी की प्रतिमा है, जो बांदकपुर से प्राप्त हुई थी। वर्षों पुरानी यह प्रतिमा आकर्षक है, इसके अलावा भगवान पारसनाथ की कई प्राचिन प्रतिमाएं यहां है। भगवान बौद्ध की १०वीं और ११वीं सदी की प्रतिमाएं हैं। जो बूंदी से प्राप्त हुई हैं।

वर्षों पुरानी है सूर्य घड़ी

संग्रहालय में मौजूद पत्थर की सूर्य घड़ी 17वीं शताब्दी की बताई जा रही है। 1989 तक यह घड़ी कलेक्टर बंगले में रखी थी। इसके बाद इसे संग्रहालय में रखा गया था। घड़ी का प्रयोग सूर्य की दिशा से समय का ज्ञान करने के लिए किया जाता था। इन्हीं घडिय़ों के आधार पर आधुनिक घडिय़ों का अविष्कार हुआ। भारत में प्राचीन वैदिक काल से सूर्य घडिय़ों का प्रयोग होता रहा है।

पानी में तैरती है पत्थर की नावं

यहां एक पत्थर की नाव है। पांच किलो वजनी इस नाव का निर्माण 19वीं शताब्दी में होना बताया जा रहा है। 36 सेमी लंबी इस नाव की ऊंचाई व चौड़ाई 7 सेमी है। यह नाव 800 ग्राम वजन भी ढो सकती है। जानकारी के अनुसार इसे भूरे खान ने बनाकर दिया था। अब इसे दर्शक भी देख सकते हैं।

यह है पूरा सफरनामा

पुरातत्व विभाग ने 1988 में वृंदावन बाग परिसर में संग्रहालय की स्थापना की थी। मूर्तियों की संख्या बढ़ गई, तो इसे शहर के शेर बंगला में लाया गया। लेकिन वहां यह 5 साल ही टिक पाया। फिर उसे डीईओ कार्यालय के खुले परिसर में शिफ्ट करना पड़ा। दो साल बाद सौ साल पुराने डफरिन भवन में संग्रहालय शिफ्ट हुआ। यहां अभी पूरा प्रतिमाएं गैलरी में नहीं लग पाई है। अभी भी एतेहासिक महत्व की यह प्रतिमाएं, सिक्के स्टोर रूम में कैद हैं।

संग्रहालय में ४८० प्रतिमाएं हैं, इनमें से लगभग १५५ को गैलरी में लगाया जा चुका है। इनमें प्लेट भी लगाई जा रही है ताकि पता चला की यह कब और कहां से प्राप्त हुई। लोगों का इस ओर ध्यान बढ़े इसके लिए वल्र्ड म्यूजियम डे मौके पर आज से यहां प्रदर्शनी का आयोजन भी किया जा रहा है।

आरके मिश्रा, वरिष्ठ मार्गदर्शक पुरात्तव विभाग

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