टिकीटोरिया पहाड़ी पर विराजी मां सिंहवाहिनी, भक्तों को मिलते हैं 365 सीढिय़ां चढऩे के बाद दर्शन

रहली से 5 किमी दूर टिकीटोरिया पहाड़ी पर विराजमान मां सिंहवाहिनी का यह स्थान मिनी मैहर के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि सुनार नदी के तट पर स्थित किले के समकालीन ही मंदिर का निर्माण तो रानी दुर्गावती द्वारा करवाया गया।

By: Atul sharma

Published: 11 Oct 2021, 10:20 PM IST

सागर. रहली से 5 किमी दूर टिकीटोरिया पहाड़ी पर विराजमान मां सिंहवाहिनी का यह स्थान मिनी मैहर के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि सुनार नदी के तट पर स्थित किले के समकालीन ही मंदिर का निर्माण तो रानी दुर्गावती द्वारा करवाया गया। यहां पर पत्थर की मूर्ति स्थापित की गई। करीब 55 साल पहले यहां संगमरमर की नयनाभिराम मूर्ति की स्थापना की गई। ३0 साल पहले पहाड़ काटकर पहले मिट्टी की सीढिय़ों, बाद में जन सहयोग से मंदिर में उपर तक जाने के लिए ३65 सीढिय़ों का निर्माण कराया गया।

मंदिर के पुजारी बताते हैं कि करीब दो से तीन बार मंदिर में चोरी का प्रयास किया गया जिसमें माता की प्राचीन प्रतिमा को भी छति पहुंचाई गई। जिसे करीब ३ वर्ष पहले जीणोद्धार समिति द्वारा माता का स्थान बदला गया और विधि विधान से पुन: प्राण प्रतिष्ठा की गई। मंदिर मे ऊपर तक जाने के लिए ३65 संगमरमर की सीढिय़ां हैं। भारत के कोने-कोने के लोगों के दान से यहां संगमरमर की सीढिय़ों के निर्माण में दान दिया है और प्रत्येक सीढ़ी पर परिजनों का नाम अंकित है। इसके अलावा यहां विभिन्न धार्मिक आयोजन शादी,विवाह आदि के लिए लगभग 15 धर्मशालाएं भी हैं जो विभिन्न समाज समितियों द्वारा बनवायी गयी हैं। जीर्णोद्धार समिति बनने के बाद से अभी तक पं अवधेश हजारी समिति के अध्यक्ष है और उनकी अध्यक्षता में टिकिटोरिया क्षेत्र प्रदेश के अलावा पूरे देश में अपनी अलग पहचान बना ली है।

मंदिर में एक गुफा, रामदरबार के होते हैं दर्शन
टिकीटोरिया के मुख्य मंदिर के सामने ही उंचाई पर शंकर जी का मंदिर बना है तथा मंदिर के दाहिनी ओर से एक गुफा है जिसमें राम दरबार तथा पंचमुखी हनुमान जी की विशाल प्रतिमा है। मंदिर के पीछे यज्ञशाला और भैरव बाबा का मंदिर भी है। टिकीटोरिया का पहाड़ सागौन के वृक्षों से भरा है। पहाड़ के नीचे बने तालाब में नहाना और बगीचा में झूला झूलना श्रद्धालुओं की टिकीटोरिया यात्रा को अविस्मरणीय बना देता है। मंदिर के पुजारी भरत शुक्ला के अनुसार ऐसी मान्यता है कि टिकीटोरिया में मां भवानी के दरबार में आकर की गयी हर मान्यता पूरी होती है।

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