आंखों की रोशनी ने तोड़ा नाता लेकिन संगीत ने दिया सहारा

आंखों की रोशनी ने तोड़ा नाता लेकिन संगीत ने दिया सहारा

By: manish Dubesy

Published: 03 Dec 2019, 03:10 PM IST

शारीरिक क्षमता में कमी हुनर में नहीं बनी बाधा
राजेश ने थामी ढोलक, हारमोनियम तो सीताराम बने नगडीया के उस्ताद
पंकज शर्मा. रहली. कहते है जहां चाह होती है, वहां राह अपने आप निकल आती है, जी हां यहां हम बात कर रहे है। रहली नगर के पंढलपुर वार्ड क्रमांक 11 के दो दृष्टी बधिरों की। जिनके पास आंखो की रोशनी तो नही है, लेकिन संगीत की आखों से अपने अधियारे जीवन में भी रोशनी की धुन सुना रहे है। 33वर्षीय राजेश सेन बताते हैं कि जन्म से ही आंखे कमजोर रही हैं, जिनसे नाम मात्र का दिखाई देता है। पारिवारिक परिस्थति एवं कम दिखाई देने के कारण शुरू से ही स्कूल नहीं जा पाए। शुरू से ही संगीत का शौक था तो घर में ही डिब्बा, पीका बजाते थे।
धीरे-धीरे समय काटने के लिए पड़ोस के लोगों के साथ साप्ताहिक भजन मंडलियों में जाने लगे और वहीं ढोलक पर हाथ आजमाया, और आज कुशल ढोलक बजा लेते हैं। शंकर जी के मंदिर में बैठकर उल्टे-सीधे हारमोनियम बजाते बजाते अब हारमोनियम पर भजन भी गा लेते हैं। शासन द्वारा दिव्यांग पेंशन मिलती है।
उसी में स्वयं का खर्चा चलाते हैं, हालांकि परिवार में छोटे बड़े भाई मां, बहन का भरपूर सहयोग मिलता है।

नींद से जागे तो चारों तरफ था अंधेरा
इसी वार्ड के सीताराम कोरी, जो युवा अवस्था में रामलीला के कुशल कलाकार थे। वह लक्ष्मण जी का पाठ बखूबी करते हैं, लेकिन करीब 13 साल रामलीला में मंचन करने वाले इस कलाकार के साथ वक्त ने ऐसा खेल खेला की रात में अच्छे भले सब कुछ देख कर सोया, लेकिन जब सुबह आंख खुली तो चारो तरफ अंधेरा ही अंधेरा था। डॉक्टरों को दिखाया तो उन्होने जबाब दिया कि अब ये कभी नहीं देख पाएंगे। सीताराम बताते हैं कि आंखो की रोशनी जाने के करीब 3 वर्ष बाद जीवन का एक मात्र सहारा पत्नी की मृत्यु हो गई। अब घर में एक बेटा और बूंढी मां है। शुरू से ही संगीत एवं रंगमंच का शौक रहा है। अब नगडिय़ा बजाते तो हैं, लेकिन उसे छूकर ही महसूस करता है। सैकड़ो लोगों के सामने रामलीला का पाठ करने वाले को अब स्वयं का चेहरा भी याद नहीं है।

manish Dubesy Desk
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