मौलानाओं के टीवी डिबेट में शामिल होने के खिलाफ फतवे को देवबन्दी उलेमा ने किया खारिज

कहा, उलेमा का टीवी डिबेट में शामिल होना वक्त की जरूरत

By: Iftekhar

Published: 26 Jan 2018, 05:36 PM IST

देवबन्द. टीवी पर डिवेट कार्यक्रमों में उलेमा के शामिल होने को शरीयत के खिलाफ बताने वाले बरैली के आला हजरत इदारे से जारी फतवे को देवबंदी उलेमा ने खारिज कर दिया है। इदारा आला हजरत के इस फतवे पर प्रतिक्रिया देते हुए देवबंद के मौलाना अशरफ कासमी ने कहा कि टीवी पर होने वाले डिबेट शो में उलेमा का शामिल होना वक्त की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हमारे मुल्क के चार स्तम्भ हैं। इन में मिडिया बुनयादी और अहम स्तम्भ है, जो मुल्क के अवाम को अपनी बात कहने का स्टेज उपलब्ध कराता है। इलैक्ट्रॉनिक मिडिया हो या प्रिंट मिडिया। अगर हम इसका इस्तामाल नहीं करेंगे तो हक कि बात और सही बात या कोई भी ऐसी बात, जो लोगों तक पहुचानी हो इसके लिए इस वक्त मिडिया बुनयादी जरूरत है।

मौलाना ने यह दिया तर्क
मौलाना अशरफ कासमी ने कहा कि जब पैगम्बर मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने नबी होने का ऐलान किया था उससे पहले उन्हेंने एक ऊंची पहाड़ी पर खडे होकर कपड़ा फहरा कर लोगों को इकठ्ठा किया था। इसके बाद उन्होंने अपनी पैगम्बरी का ऐलान किया था। इससे पता चलता है कि मिडिया कि डिबेट में बैठना और अपनी बात रखना इस्लाम में कोई मना नहीं है। हालांकि, उन्होंने इतना जरूर जोड़ा कि ऐसी डिबेट से बचना चाहिए, जिससे हिन्दू-मुस्लिम भाई चारे को नुकसान पहुंचता हो। किसी भी मुद्दे पर बहस में शामिल होने से पहले उलेमा को तैयारी कर के जाना चाहिए, ताकि मजहब-ए-इस्लाम और मुसलमानों की सही तस्वीर देश और समाज के बीच सामने आ सके।

 

 

वहीं, मजलिस इत्तेहाद-ए-मिल्लत के राष्ट्रीय सचिव मौलाना अतहर उस्मानी ने कहा कि टिवी हो या रेडियो, उस डिवेट में बैठना या अपनी बात कहना इस्लाम में मना नहीं है। चाहे शरियत का मामला हो या कोई और जब तक हम अपनी बात दुसरों तक नहीं पहुचाएंगे तो जो गलत फहमियां हैं वह कैसे दुर होगी। इसिलए यह जरूरी है कि डिवेट में बैठने वाले उलेमा जिस भी इसू पर डिबेट हो, उसमें उन्हें पुरी तैयारी से जाना चाहिए, ताकि डिवेट में कोई ऐसी बात न आए, जिससे उका गलत संदेश जाए।

किसी भी इस्लामी इदारे को इस तरह का फतवा नहीं देना चाहिए। देश के लोकतंत्र में जो चार स्तम्भ हैं, मिडिया उन में से एक है। मिडिया के माध्यम से हम अपनी बात दुसरों तक पहुचाते हैं । इस्लाम के बारे में जो गलतफहमिया है अगर हम डिबेट में या बयान देकर नहीं बाताएंगे तो यह गलतफमियां कैसे दुर होंगी। डिवेट में बैठना किसी भी आधार पर इस्लाम में नाजायज नहीं है। ऐसे फतवों से बचना चाहिए।

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