VIDEO: छलका एसआे का दर्द, एक रिक्शा वाले काे भी नहीं हटा सकते

  VIDEO: छलका एसआे का दर्द, एक रिक्शा वाले काे भी नहीं हटा सकते
saharanpur police

अफसरों के सामने ही छलका एसआे का दर्द

सहारनपुर। सहारनपुर पुलिस लाईन में अफसराें के सामने एक पुलिसकर्मी ने कहा कि पुलिस कार्यप्रणाली आैर मानव अधिकार संरक्षण के बीच सामंजस्य कभी स्थापित हो ही नहीं सकता। इस दौरान एक पुलिसकर्मी ने कहा कि बगैर डर के किसी भी बदमाश से काेई भी बात उगलवाई नहीं जा सकती इसलिए यह बेहद जरूरी है कि एेसे हालाताें में मानव अधिकार आयाेग पुलिस के गले में फंदा ना डाले।


पुलिस लाईन सभागार में मानव अधिकार संरक्षण आैर पुलिस कार्यप्रणाली में सामंजस्य हाे सकता है या नहीं, विषय पर आयाेजित वाद विवाद प्रतियाेगिता के दौरान पुलिस वालों ने अपने विचार व्यक्त किए। यहां कांस्टेबल से लेकर थाना प्रभारियाें ने अपने विचार रखे आैर निर्णायक मंडल में पुलिस अफसराें के अलावा न्याया विभाग के अफसर आैर गणमान्य लाेग माैजूद रहे। 

आपकाे यह जानकर हैरानी हाेगी कि वाद-विवाद के विपक्ष में अपना तर्क रखने पर प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले सिपाही नरेंद्र कुमार ने जब मानव अधिकार आयाेग संरक्षण आैर पुलिस के बीच सामंजस्य विषय के विपक्ष की आेर से बाेलते हुए अपना समर्थन दिया ताे यहां नानाैता थाना प्रभारी मनाेज कुमार ने  ताे यह तक कह दिया कि मानव अधिकार आयाेग हाेना ही नहीं चाहिए। थाना प्रभारी का दर्द इस बात काे लेकर भी छलका कि आज हालात एेसे हाे गए हैं कि एक रिक्शा वाले काे भी हटाने के लिए साेचना पड़ता है। यह अलग बात है कि यहां पक्ष में भी कई पुलिसकर्मियाें ने अपनी बात रखी आैर समझाया कि किस तरह से पुलिस अपनी शक्तियाें का प्रयाेग करते हुए भी मानव अधिकार आयाेग संरक्षण के नियमाें का पालन कर सकती है।

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पुलिस मानव अधिकार संरक्षण विषय पर रखती है एेसे विचार

इस वाद विवाद प्रतियाेगिता के बीच पुलिस का दर्द का भी साफ निकलकर सामने आया। यहां पुलिसकर्मियाें ने मुख्य रूप से यह कहने का प्रयास किया कि उनसे 24 घंटे काम लिया जाता है आैर समाज में हाेने वाले सभी तरह के अपराध आैर घटना के लिए पुलिस काे जिम्मेदार ठहराया जाता है। कांस्टेबल सारिका मिश्रा ने ताे यह तक कहा कि पुलिस के लिए भी एक अधिकार आयाेग हाेना चाहिए।

इन्हाेंने इस तरह से समझाया कि जब पुलिस वाले किसी सफेदपाेश के चमचे काे हिरासत में लेते हैं ताे एेसे हालात में पुलिस काे दबाने का प्रयास किया जाता है। इन स्थितियाें में पुलिस का भी समर्थन करने वाला काेई हाेना चाहिए। एक सिपाही का दर्द पुलिस की कार्यप्रणाली काे लेकर भी छलका। इन्हाेंने कहा कि पुलिस काे एकदम आदेश दे दिया जाता है कि 25 किलाेमीटर दूर ड्यूटी पर जाईए, लेकिन एेसे में सिपाही काे यह पता नहीं हाेता कि कैसे जाएंगे आैर खाना कहां खाएंगे। यह पुलिसकर्मी कहना चाह रहे थे कि मानव अधिकार आयाेग आैर पुलिस के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए पुलिस महकमें भी सुधार करने हाेंगे।

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मानव अधिकार ना हाे ताे जंगलराज

एडीएम एफ हरीश चंद्र ने यह समझाने का प्रयास किया कि मानव अधिकार अगर ना हाे ताे समाज एक जंगल हाे जाएगा। पुलिस की छवि हाबू जैसी बन जाएगी आैर लाेग पुलिस से डरने लगेंगे। यह गलत है मानव के अधिकाराें का हनन नहीं हाेना चाहिए। पावर आदमी काे भ्रष्ट कर देती आैर पुलिस के पास बेइन्ताह पावर हाेती है। यदि सभी काे खुला छाेड़ दिया जाए ताे हालात बेहद खराब हाे जाएंगे।

मानव अधिकार सरंक्षण ही कानून है

एडीजे ज्ञान प्रकाश जाे निर्णायक मंडल में मुख्य भूमिका में माैजूद रहे। उन्हाेंने कहा कि मानव अधिकार सरंक्षण बेहद जरूरी है आैर पुलिस की यह जिम्मेदारी है कि वह मानव अधिकाराें का सरंक्षण करें, उन्हाेंने यह बताने का प्रयास किया कि मानव अधिकार का हनन ही क्राईम है।
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