Pitra Paksha 2017: शास्त्रों में तर्पण और श्राद्ध करने की ये बताई गई हैं 4 विधियां, इन बातों का जरूर रखें ख्याल

हिन्दू धर्म में तर्पण और श्राद्ध का विशेष महत्व बताया गया है। खासतौर से जब पितरों की बात आती है तो हर इंसान के अंदर भक्ति-भावना जागृत हो जाती है।

By: suresh mishra

Published: 11 Sep 2017, 07:07 PM IST

सतना। हिन्दू धर्म में तर्पण और श्राद्ध का विशेष महत्व बताया गया है। खासतौर से जब पितरों की बात आती है तो हर इंसान के अंदर भक्ति-भावना जागृत हो जाती है। ऐसे में बड़े-बुर्जूग पितरों की याद में अपनी श्रद्धा के अनुसार दान करते है। इससे जहां मृत आत्माओं को शांति मिलती है। वहीं उनका अगला जन्म सफल हो जाता है। क्योंकि तर्पण और श्राद्ध में दान बहुत ही अहम माना गया है।

पंडित हरिनारायण शास्त्री की मानें तो पुरखों के लिए ग्रास निकालना, पूजा की विधि तथा प्रार्थना करना, तर्पण के समय जल चढ़ाना, ग्रास विसर्जन करना आदि विधियां सबसे जरूरी होती है। पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्राद्ध, बरसी, मासिक अमावस्या पर जो लोग दान करते है। इससे हमे सदैव आशीर्वाद मिलता है।

1-पुरखों के लिए ग्रास निकालना
कर्मकांड़ी पंडितों की मानें तो चावल को पकाने के बाद काले तिल में मिलाकर एक थाली में एक प्याला पानी के साथ रखना अनिवार्य किया गया है। इसको रखने का उचित स्थान घर के पीछे, बरामदें और घर के बाहर भी है। इस ग्रास में शामिल करने के लिए आप शुद्ध शाकाहारी भोजन भी बना सकते है। ग्रास रखने के लिए उचित समय भी निर्धारित किया गया है। सुबह ११ से शाम ४ बजे का सही समय बताया गया है।

2. पूजा के बाद करें प्रार्थना
पंडित हरिनारायण शास्त्री ने बताया कि पूजा के बाद प्रार्थना करते हुए इस जन्म में और पिछले जन्मों में मृत पुरखों को मानस पद्धति से पुकारकर ग्रास गृहण करने के लिए बुलाया जाता है। कहतें है कि इससे पूर्वजों और पुरखों के सूक्ष्मदेह कौआ के रूप में ग्रास गृहण करने पहुंचते है। भगवान दत्तात्रेय की प्रार्थना कर कहा जाता है कि हे मेरे पूर्वज इस ग्रास में तृप्त हों।

3. इस तरह तर्पण में देना चाहिए जल
घर में दक्षिण की ओर चेहरा कर खड़े हो जाएं। फिर घास की बड़ी पत्ती लें यानी दर्भ। प्रार्थना करते हुए कहें यह पवित्र हो। इसके बाद दर्भ को दाएं हाथ की अनामिका पर अंगूठी के समान बांध लें। बाएं हाथ में पानी का प्याला पकड़ें और दाई हथेली से पानी उडेंले। पंडितों की मानें तो इस पानी को अंगूठे व तर्जनी के बीच में बह जाने दें। यदि संभव हो सकता है तो नीचे सोने, चांदी और तांबे की थाली ही रखें।

4. ग्रास का करें विसर्जन
पौराणिक जानकारों की मानें तो यदि शाम तक कौआ भोजन को नहीं छूता है तो भोजन को सूर्यास्त के बाद विसर्जित कर देना चाहिए। भोजन को विसर्जित करने की सर्वश्रेष्ठ विधि बहता जल जैसे नदी, समुद्र में प्रवाहित करें। यदि संभव न हो तभी तालाब में प्रवाहित कर सकते है। अंतिम विकल्प यह है कि भोजन को भूमि में गाड दें। क्योकि इसको पुन: घर लेकर नहीं जाना चाहिए।

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