लेखकों ने खोला मोर्चा, बोले-हम भारतीय राष्ट्रवादी हैं, हिंदू राष्ट्रवादी नहीं

suresh mishra

Publish: Sep, 17 2017 02:53:38 (IST)

Satna, Madhya Pradesh, India
लेखकों ने खोला मोर्चा, बोले-हम भारतीय राष्ट्रवादी हैं, हिंदू राष्ट्रवादी नहीं

41 साल बाद फास्टि विरोधी लेखकों का सतना में जमावड़ा

सतना। तर्कवादियों और विचारकों की हत्या से बिफरे लेखकों ने मोर्चा खोल दिया है। उनके निशाने पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद रहा। दो टूक शब्दों में कहा, हम भारतीय राष्ट्रवादी हैं, हिंदू राष्ट्रवादी नहीं। इसलिए साम्प्रदायिक विचारधारा से लडेंग़े और अभिव्यक्ति की आजादी को जीतेंगे। लेखकों ने किसी का नाम तो नहीं लिया पर मौजूदा दौर को आपातकाल से जोडऩे से भी नहीं चूके।

करीब ४१ साल बाद यह पहला मौका था जब प्रगतिशील लेखक संघ से लेकर जनवादी लेखक संघ से जुड़े साहित्यकार सतना में एक मंच पर जुटे और सामाजिक चिंताओं को साझा किया। भूखंड तप रहा है ध्येय वाक्य को लेकर आयोजित इस सम्मेलन को फासिस्ट विरोधी लेखकों का जमावड़ा नाम दिया गया।

एकजुटता समय की जरूरत

इससे पहले इस तरह का सम्मेलन १९७६ में तब हुआ था जब आपातकाल चरम पर था। इस मौके पर जनवादी लेखक संघ के महासचिव मनोज कुलकर्णी ने कहा कि एकजुटता समय की जरूरत है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम से फासिज्म हमारे सामने है। प्रेमशंकर ने कहा सत्ता के झूठ को स्वीकारे, तभी जीवित रह पाएंगे। अतीत की शिकायतों को स्थगित रखने का समय है।

साम्प्रदायिक विचारधारा के खिलाफ लडऩा जरूरी

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रगतिशील लेखक संघ के प्रांतीय अध्यक्ष राजेन्द्र शर्मा ने कहा कि अब प्रेमचन्द्र का साहित्य निशाने पर है। हिन्दी साहित्य संस्थान से प्रेमचन्द्र के गोदान को हटाया गया है। दूसरे सत्र में गार्गी चक्रवर्ती ने कहा कि आपातकाल में राज्य के खिलाफ आवाज उठाने वालों पर कार्रवाई होती थी, अब आम जनता पर हो रही है। साम्प्रदायिक विचारधारा के खिलाफ लडऩा जरूरी है। फासीवाद के खिलाफ ही देश मे प्रगतिशील लेखक संघ का गठन हुआ था। हम भारतीय राष्ट्रवादी है, हिन्दू राष्ट्रवादी नहीं।

सत्य पर कोड़े बरसाये जा रहे है

अलीगढ़ से आये वेद प्रकाश ने कहा मध्यम वर्ग बदला है सत्ता का भय कायम है, लोग झुकने को तैयार बैठे हुये है, चारों ओर चापलूसी का माहौल है। आम आदमी के मन में राजनीति का गंदा चेहरा स्थापित कर दिया गया है। छत्तीसगढ़ से आये प्रभाकर चौबे ने कहा व्यक्ति की पक्षधरता जानना जरूरी है। मनुष्य विरोधी हर काम के खिलाफ हम हर व्यक्ति के साथ है। रमाकान्त श्रीवास्तव ने कहा कि सत्य पर कोड़े बरसाये जा रहे है, बुद्धजीवी खामोश है। सच के साथ खड़े होना साहित्यकार का दायित्व है।

'पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या हैÓ
सम्मेलन का आगाज वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी दिल्ली के वक्तव्य से शुरु हुआ। उन्होंने अपनी बात साहित्य के पुरखों के साथ शुरू की। उन्होंने साठ के दशक से अब तक के उन घटनाओं को याद किया, जब विचारों पर बेडि़यां डालने के प्रयास किए गए। उन्होंने कहा, जब भी लेखक तर्क संगत ढंग से अपनी बात रखने का प्रयास करते हैं, उन्हे दबाने का प्रयास किया जाता रहा है। ये शुरू से है, हर सरकार ने ऐसा किया है।

वर्तमान राजनीति का चेहरा सामने रखा

लेखकों ने गजानन माधव मुक्तिबोध के संदर्भ से साहित्य और राजनीति के अंतर्संबंध पर 'पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या हैÓ विचार सत्र में वर्तमान राजनीति का चेहरा सामने रखा। कार्यक्रम में राजेंद्र शर्मा, प्रेमशंकर, विनती तिवारी, मनोज कुलकर्णी, संतोष खरे ने बिना नाम लिए कथित फासिस्ट ताकतों को जमकर खरी-खरी सुनाई।

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