चलो फिर बसाते हैं गौरैया का बसेरा

चलो फिर बसाते हैं गौरैया का बसेरा
Let's settle down the sparrows sprawl

Jyoti Gupta | Publish: Apr, 09 2019 09:07:54 PM (IST) Satna, Satna, Madhya Pradesh, India

पर्यावरण में बढ़ते प्रदूषण का संकेत भी देती है यह चिडि़या

सतना. याद है आपको अपना बचपन। आज से २० वर्ष पहले हर घर में गौरैया का बसेरा होता था। उसकी चहचहाहट से तो हमारी नींद खुलती थी। घर आंगन में उसका फुदुक-फुदुक कर चलना और बच्चों का उसके आगे-पीछे का भागना, अफसोस इतने खूबसूरत नजारे आज के बच्चे नहीं देख पा रहे हैं। जंगलों का तेजी से कटना, कंक्रीट का घर बनाना, खेतों में अत्यधिक रसायनों का यूज करना गौरैया के लिए घातक बन गया। अब बहुत ही कम गौरैया का चहचहाना सुनाई देता है। पर हम थोड़े से प्रयास से सीमेंट के घरों में भी इनकी आवाजों को सुन सकते हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, गौरैया की कम होती संख्या की बड़ी वजह खेतों में तेजी से और बड़ी मात्रा में उपयोग किया जा रहा फ र्टिलाइजर है। फ सल की बुवाई से लेकर सुरक्षित रखने तक किसान खेत में फ र्टिलाइजर डाल रहे हैं। इससे गौरैया की लाइफ प्रभावित हो रही है। इसका बुरा असर उनके अंडे तक होता है। अंडे का कवच कमजोर होकर कुछ ही दिनों में टूट जाता है। दूसरी बात गौरैया एक ऐसी चिडिय़ा है जो पर्यावरण प्रदूषण का संकेत भी है। वातावरण के बढ़ते तापमान और घटते पेड़-पौधों की वजह से इनकी संख्या में कमी आ रही है। नदी और तालाब का गंदा पानी पीते ही गौरैया के शरीर में टॉक्सिन बन जाते हैं। इससे इनके अंडों के बचे रहने की क्षमता कम हो जाती है।

घरों में छोडं़े घोंसला बनाने की जगह
विशेषज्ञों के मुताबिक, अब घरों में गौरैया को घोंसला बनाने की जगह नहीं मिलती। पीने के लिए पानी मिलना भी मुश्किल होता है। इन्हीं वजहों से गौरैया का दिखाई देना कम हो गया है। घर बनवाते समय पक्षियों के बैठने या घोंसले बनाने की जगह छोड़ी जा सकती है। छतों पर पानी से भरे बर्तन रखे जा सकते हैं। छत के ऊपर दाने भी बिखेरे जा सकते हैं ताकि उन्हें चुन सकें।


बच्चों ने पक्षियों के लिए रखे मिट्टी के बर्तन

पत्रिका अभियान पक्षी मित्र शुरू हो गया है। अब हर दिन पक्षियों के लिए घरों में पानी की व्यवस्था के लिए मिट्टी के बर्तन को पेड़, आंगन, घर की छतों और बरामदे पर रखने की अपील और अभियान चलाया जाएगा। इसी के तहत किंडर गार्टेन स्कूल नागौद में बच्चों द्वारा स्कूल परिसर में मिट्टी के बर्तन रखवाए गए। स्कूल संचालक द्वारा बच्चों को पक्षियों का महत्व भी बताया गया।

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