lockdown: दिव्यांग बेटे को कंधे पर लादकर सूरत से सतना पहुंची बेबस मां

मजबूर हैं, क्योंकि मजदूर हैं हम : 1100 किमी के सफर में नहीं मिली अपेक्षित मदद

By: Sonelal kushwaha

Published: 13 May 2020, 02:40 AM IST

सतना/पन्ना. मजदूरों की बेबसी बयां करती यह तस्वीर सिस्टम के नकारेपन की बानगी है। एक बेबस मां दिव्यांग बेटे को कंधे पर लेकर सूरत से पन्ना तक करीब 1100 किमी. का फासला नाप चुकी है। अब मंजिल तक पहुंचने के लिए उसे 150 किमी. का दर्द और सहन करना है। दरअसल, सतना जिले के आदिवासी बहुल मझगवां क्षेत्र की राजकुमारी (बेवा) रोजगार की तलाश में अपने तीन बेटों के साथ सूरत गई थी। लौटने के लिए बस-ट्रेनें नहीं मिलीं तो तीनों बेटों के साथ पैदल ही रवाना हो गई। एक बेटा विकलांग है। इस कारण उसे कंधे पर लादकर चल रही है। यह आदिवासी परिवार 10 दिन से पैदल चल रहा। मंगलवार को पन्ना पहुंचने पर प्रशासन ने स्वास्थ्य परीक्षण कराया और उन्हें बस से मझगवां के लिए रवाना किया।

राजकुमारी ने बताया कि पति की मौत हो गई है। तीन बेटे हैं। क्षेत्र में रोजगार के साधन नहीं, इसलिए काम की तलाश में सूरत गई थी। वहां कुछ दिन काम धंधा किया, लेकिन लॉकडाउन के चलते काम धंधे बंद हो गए। जो रुपए बचाकर रखे थे, वह भी खत्म होने लगे। इसलिए घर लौटने का निर्णय लिया, लेकिन वाहन नहीं थे। सब लोग पैदल निकल रहे थे तो मैं भी तीनों बेटों के साथ रवाना हो गई। विकलांग बेटे को चादर व लकड़ी की पालकी में लिटाया और चार साल के मासूम बेटे को पैदल चलाती रही। बीच-बीच में मददगार भी मिले, जिससे सफर में थोड़ी राहत मिली, लेकिन ज्यादातर रास्ता पैदल ही तय करना पड़ा।

बस चालक ने लिए 200 रुपए
राजकुमारी की मानें तो सूरत से कुछ दूर पैदल चलने के बाद बस मिल गई। चालक ने २०० रुपए किराया लिया, लेकिन हाइवे पर उतार दिया। वहां से फिर पैदल चल दिए। लकड़ी के सहारे चादर पर लेटे बच्चे को एक तरफ मां कंधे पर लादे थी तो दूसरी ओर बड़ा भाई। यह मार्मिक दृश्य देखकर सबकी आंखें झलक जाती, लेकिन किसी की इतनी हिम्मत नहीं पड़ी कि उसे घर पहुंचने की व्यवस्था करे। पन्ना पहुुंचने पर प्रशासन ने उनके खाने-पीने की व्यवस्था की और स्वास्थ्य परीक्षण कराने के बाद मां-बेटों को बस मंे बैठाकर सतना के लिए रवाना किया। इससे १५० किमी का सफर आरामदायक हो गया।

मालिक ने मदद से कर दिया मना
सतना जिले के ही संतोष मिश्रा ने बताया कि हम लोग परिवार सहित आठ दिन पूर्व मुंबई से चले थे। वहां बटन बनाने का काम करते थे। फैक्ट्री बंद हो गई, मालिक ने रुपए देने से मना कर दिया। न खाने को था न रुपए बचे थे। इस कारण परिवार के लोगांे ने घर लौट आने को कहा। बताया कि पूरे रास्ते में पैदल चलते लोग ही दिखाई देते हैं। कोई साइकिल, कोई ऑटो तो कोई बाइक व ट्रकों के सहारे लौट रहा है।

Sonelal kushwaha Reporting
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