सियासी जंग में खूब निभेंगे रिश्ते, कहीं बेटा पिता के लिए करेगा प्रचार-प्रसार तो कहीं पिता बेटे के लिए बढ़ाएंगे हाथ

सियासी जंग में खूब निभेंगे रिश्ते, कहीं बेटा पिता के लिए करेगा प्रचार-प्रसार तो कहीं पिता बेटे के लिए बढ़ाएंगे हाथ

Suresh Kumar Mishra | Publish: Nov, 10 2018 01:04:17 PM (IST) | Updated: Nov, 10 2018 01:04:18 PM (IST) Satna, Madhya Pradesh, India

राजनीति के रंग: चुनावी दंगल में यूं लगते हैं रिश्ते दावं पर

रीवा। सियासत का रंग भी अजीब होता है। कब-क्या हो जाए, किसी को नहीं पता। कभी अर्श पर रहे लालकृष्ण आडवाणी व मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता आज फर्श हैं। इसी तरह पार्टियां कब-किसको टिकट पकड़ा देंगी कुछ तय नहीं। जो राजनीति करते हैं और राजनीति का माद्दा रखते हैं उनका टिकट यूं ही कट जाता है। लेकिन जिन्होंने राजनीति का कखग तक नहीं सीखा उनको टिकट मिल जाता है।

कुछ इसी तरह का हाल विंध्य की सियासत में भी है। गुरु का टिकट काटकर शिष्य को थमा दिया गया तो पति का टिकट पत्नी की झोली में पहुंच गया। बेटे का पत्ता काटकर पिता पर दावं खेला गया। तो कहीं पिता बेटे को आगे बढ़ाने के चक्कर में खुद ही पीछे हट गए। अब देखना यह है कि इस सियासी जंग में रिश्ते कैसे निभाए जाते हैं।

बेटे के लिए मंत्री पिता ने छोड़ी कुर्सी
सियासी रिश्ते की चर्चा रामपुर बाघेलान में भी खूब चल रही है। मंत्री ने अपनी जगह बेटे के लिए टिकट मांगा और अब प्रचार-प्रसार में जुट गए हैं। इस तरह वे अपने उत्तराधिकारी को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं। राज्यमंत्री हर्ष सिंह 60 साल की उम्र पार कर चुके हैं। वे अस्वस्थ भी रहने लगे हैं, जिसके चलते राजनीतिक सक्रियता भी कम देखने को मिल रही थी। लिहाजा उन्होंने विस टिकट वितरण के दौरान खुद की दावेदारी नहीं की और अपनी जगह बेटे विक्रम सिंह का नाम प्रस्तावित कर दिया। राजनीतिक समीकरण को देखते हुए पार्टी ने भरोसा जताया और बेटे को मैदान में उतार दिया। अब रामपुर की जंग को जीतने के लिए पूरा परिवार मैदान में है। नामांकन के दौरान ये नजारा देखने को भी मिला। विक्रम सिंह जब जिला निर्वाचन कार्यालय पहुंचे, तो उनके साथ पिता हर्ष सिंह व पत्नी शुभांगी सिंह भी थीं।

बेटा-बहू कर रहे थे दावेदारी, अब पिता के लिए करेंगे प्रचार
रैगांव में बागरी परिवार का सियासी रिश्ता भी चर्चा का विषय बना है। परिवार में करीब 4 सदस्य भाजपा में टिकट की दावेदारी कर रहे थे। बेटा विगत चुनाव में प्रत्याशी भी रह चुका है। पार्टी ने सभी को दरकिनार करते हुए अनुभवी चेहरे के रूप में जुगुल किशोर बागरी को मैदान में उतारा है। पूर्व मंत्री जुगुल किशोर सहित उनके बेटे पुष्पराज बागरी, देवराज बागरी व बहू बंदना बागरी टिकट की दावेदारी कर रहे थे। पुष्पराज बागरी गत 2013 चुनाव लड़ चुके हैं। अब सभी मिलकर पिता के लिए प्रचार-प्रसार करेंगे।

श्यामलाल द्विवेदी-रमाकांत तिवारी
राजनीति में श्यामलाल द्विवेदी और रमाकांत तिवारी की जोड़ी किसी से छिपी नहीं है। दोनों में गुरु-शिष्य के रिश्ते रहे हैं। रमाकांत तिवारी के चुनावी सिपहसलार हमेशा से श्यामलाल द्विवेदी ही रहे हैं। तभी वे त्योंथर विधानसभा की चुनावी जंग फतह करते आ रहे थे। वर्ष 2013 के चुनाव में भी रमाकांत तिवारी का चुनावी दारोमदार श्यामलाल द्विवेदी पर ही था। अब 2018 में समीकरण बदल गए हैं, इस बार गुरु रमाकांत तिवारी के घराने से टिकट काटकर बीजेपी ने उनके ही राजनीतिक रणनीतिकार श्यामलाल को दे दिया है। हालांकि रमाकांत तिवारी अपने बेटे या बहू को टिकट चाहते थे, पर उन्होंने श्यामलाल का नाम भी आगे बढ़ाया था। घर से टिकट चले जाने से तल्खी जरूर है लेकिन रिश्ते निभाने की बारी रमाकांत के कंधों पर है। श्यामलाल कहते हैं कि दोस्ताने संबंध में सियासी रिश्ते आड़े नहीं आएंगे।

पुष्पराज सिंह-दिव्यराज सिंह
चुनावी दंगल में अक्सर रिश्ते भी दांव पर लग जाते हैं। पुत्र, पिता के खिलाफ एवं भाई, भाई के विरुद्ध मैदान में उतर जाते हैं। इससे रीवा का राजघराना भी अछूता नहीं रहा। वर्ष 2013 में पूर्व मंत्री पुष्पराज सिंह भाजपा से टिकट चाहते थे, लेकिन भाजपा ने उनके बेटे युवराज दिव्यराज सिंह को तवज्जो दी। इससे ऐन वक्त पर पुष्पराज सिंह कांग्रेस के पक्ष में हो गए। उन्होंने पारिवारिक रिश्ते को ताक पर रख दिया और बेटे के खिलाफ कांग्रेस के प्रचार में पहुंच गए। अब 2018 के रण में भी वही स्थिति है। पुष्पराज सिंह कांग्रेस में हैं और विधायक बेटे दिव्यराज सिंह भाजपा की टिकट पर पुन: मैदान में हैं। किले के सूत्रों का कहना है कि पारिवारिक रिश्ते अपनी जगह हैं, लेकिन बेटे का प्रचार करने पुष्पराज सिंह नहीं जाएंगे। युवराज दिव्यराज सिंह का कहना है कि उनको पिता का केवल आशीर्वाद ही बहुत है।

अरुणा तिवारी-विवेक तिवारी
2013 में कांग्रेस ने सिरमौर से विवेक तिवारी बाबला को उम्मीदवार बनाया गया था। विवेक छात्र जीवन से ही राजनीति से जुड़ गए थे। उनके बाबा पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी चाहते थे कि उनका नाती विधायक बने। इसके लिए 2013 के चुनाव में पूर्व विस अध्यक्ष अपनी सीट छोड़कर विवेक के लिए टिकट लेकर आए। घर-घर जाकर विवेक को जिताने की जीवन की आखिरी मांग पूरी करने मतदाताओं से याचना की। लेकिन हुआ उल्टा। विवेक तिवारी, सिरमौर क्षेत्र से राजघराने के युवराज दिव्यराज सिंह के 40018 मतों के मुकाबले 34730 वोट पाकर 5288 मतों से चुनाव हार गए थे। इसके बाद भी विवेक 2018 की टिकट की उम्मीद पाले हुए थे। इसके लिए दिल्ली तक दौड़ भी लगाई पर उनका टिकट काटकर पार्टी ने उनकी पत्नी अरूणा तिवारी को मैदान में उतार दिया है। अब सियासी जंग में किस तरह से रिश्ते निभेंगे यह देखने की बारी है। लिहाजा विवेक पत्नी अरूणा को लेकर पर्चा भराने पहुंचे थे। उन्होंने पत्नी के लिए प्रचार की तैयारी की है। अभय मिश्रा की तरह विवेक भी पत्नी के चुनाव की कमान संभालेंगे और पारिवारिक रिश्ते भी बिगडऩे नहीं देंगे। ऐसा उनका भी मानना है। टिकट नहीं मिलने से वे मायूष जरूर हैं पर पत्नी के लिए अब सारी ताकत झोंकेगे। उन्होंने कहा कि जितनी शिद्धत के साथ पारिवारिक रिश्ते चला रहे हैं, उसी तरह सियासत में भी पत्नी का साथ देंगे।

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