साउथ अफ्रीका में इंडिया की कला का अहसास

पत्रिका स्पेशल: पूरे मध्य प्रदेश में किसी के पास नहीं एेसी प्रतिभा
एपोक्सि आर्ट: बेकार लकडि़यों से बना देते हैं इनोवेटिव फर्नीचर

ज्योति गुप्ता. अभी तक आप सोशल मीडिया अथवा देश के बड़े होटलों में प्रकृति को जीवंत करती कला देखे होंगे। उसमें नेचुरल चीजों का अहसास होता है। देखते ही कुछ समय के लिए मन आनंदित हो उठता है। ये कलाकृतियां महानगरों के संग्रहालय सहित राजनेताओं के घरों की शान बन रही हैं। एक एेसी ही कला अपने शहर में भी लोगों को भा रही है। वह है एपोक्सि आर्ट। इसको शहर ही नहीं बल्कि पूरे मध्यप्रदेश में बहुत ही कम लोग जानते हैं लेकिन अपनी खूबसूरती, नेचुरलिटी और इनोवेशन के दम पर यह जल्द ही हर मन को छू जाती है। आज हम एेसे सख्श से रूबरू करा रहे हैं जो इस कला के धनी हैं। सिंधी कैम्प निवासी विनोद जगवानी (34),पिता स्व. अशोक जगवानी , माता जगवानी एपोक्सि आर्ट से घरों के इंटीरियर में चार-चांद लगा रहे हैं। कबाड़, यूजलेस लकडि़यां, पेबल्स, नेचुरल फ्लॉवर, खाने की ठोस सामग्री, घास, रेसिन और हार्डनर की मदद से सीनरी, फर्नीचर, डेकोरेटिव आइटम्स को इनोवेशन के साथ तैयार कर रहे हैं।

पुणे से शुरुआत, साउथ अफ्रीका में चलन
पत्रिका से विनोद जगवानी ने बताया कि छह वर्ष के वीजे पर वे साउथ अफ्रीका गए थे। वहां एपोक्सि आर्ट की कलाकृतियां चरम पर थीं। समय के अभाव और आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण इस आर्ट को सीखना वहां संभव नहीं था। छह साल बाद जब भारत आया तो मन में इस आर्ट को सीखने की लालसा हुई। इसके बाद यू-ट्यूब और इंटरनेट की मदद से इस आर्ट के बारे में जानकारी खोजना शुरू किया। पता चला कि भारत में इसकी शुरुआत पुणे से हुई थी। बोहरी अली नाम की एक संस्था है जो भारत में एपोक्सि के सबसे बड़ी सप्लायर है, वह इस कला को सिखाती भी है। फिर क्या, मैं वहां पहुंचा और पूरे तीन माह तक इस आर्ट की बारीकियों को समझा।


कला की यह है खासियत

विनोद बताते हैं, एक द्रव्य पदार्थ होता है जो सूखने के बाद पत्थर जैसा बन जाता है। यह दो तरह के कैमिकल रेसिन और हार्डनर के सही अनुपात से मिलकर बनता है। इसका उपयोग ज्यादातर टेबल टॉप बनाने में होता है। इसके अलावा इससे मलबींपद, फैंसी ज्वेलेरी, किचन ट्रे या फि र कोस्टर जैसे डेकोरेटिव आइटम्स बनाया जाता है। सीनरी, टेबल लैंप, वॉल लैंप, फोटो फ्रेम बना सकते हैं। इसकी खासियत है कि यह बहुत मजबूत और देखने में सुंदर होता है। इसकी चमक कभी समय के साथ कम नहीं होती। इसका प्राकृतिक रंग क्लियर पानी जैसा होता है पर इसमे पिग्मेंट मिलाकर कोई भी रंग बनाया जा सकता है। इससे इसकी सुंदरता और बढ़ जाती है। इसके मेटालिक, लोरेसेंट और ग्लो इन डार्क कलर आते हैं।

ऐसे मिली प्रेरणा
विनोद बताते हैं कि आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी पर एक सुंदर घर की चाह होती थी। इसलिए घर के इंटीरियर के लिए कई चीजें बनाते रहते हैं। कई बार असफ ल भी हुए पर जब सफ ल होते तो हौंसला बढ़ जाता था। फि र कुछ नया करने का आत्मविश्वास जग जाता। इसी आत्मविश्वास के कारण एपोक्सि आर्ट की ओर कदम बढ़ाया। इस कला के माध्यम से पहले खराब मटेरिल से एक अधूरी टेबल को पूरा किया। जब वह एक बेहतरीन शेप, डिजाइन में बनकर तैयार हुई तो उनका आत्मविश्वास इस आर्ट के लिए और बढ़ गया। अभी तक अपने ही परिचितों को 22 टेबल बनाकर दी है जो सतना के अलावा भोपाल, छतरपुर, रीवा और सागर में रहते हैं। भविष्य में शहर के लोगों को इस कला का प्रशिक्षण जरूर दूंगा ताकि लोग इसे प्रोफेशन के लिए भी अपना सकें।

Jyoti Gupta Reporting
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