ये किसी इंजीनियर से कम नहीं..माटी सानते-सानते बन गए पेशेवर मूर्तिकार

ये किसी इंजीनियर से कम नहीं..माटी सानते-सानते बन गए पेशेवर मूर्तिकार
special on Engineer Day

Jyoti Gupta | Updated: 15 Sep 2019, 10:21:18 PM (IST) Satna, Satna, Madhya Pradesh, India

इंजीनियर डे पर विशेष: 19 वर्षीय रेशू अकेले ही हर सीजन में 100 मूर्तियों को देते हैं आका

सतना. 'गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढि़-गढि़ काढ़े खोट, अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट' कुछ इन्हीं पंक्तियों को साकार किया है कंधी गली निवासी 19 वर्षीय रेशू दाहिया ने। रेशू एक पेशेवर मूर्तिकार हैं। कभी वे अपने गुरु के लिए माटी सानने और पानी भरने का काम करते थे। गुरु ने उनके गुणों को पहचाना और निखारा भी। नतीजा यह हुआ कि आज वे अकेले ही 100 से अधिक दुर्गा व गणेश प्रतिमा को आकार दे रहे हैं।
रेशू बताते हैं, 10 साल की उम्र में उन्होंने एक बौरा मूर्तिकार की शरण ली। परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति की वजह से पढ़ाई के बाद वे सीधे बौरा गुरु के पास पहुंच जाते। वहां गुरु के लिए हर दिन मिट्टी सानने और पानी भरने का काम करते रहे। एेसा करते-करते चार साल गुजर गए। लगन कुछ ऐसी थी कि पानी भरने और माटी सानने के बाद जो समय बचता उसमें वे गुरु को मूर्ति बनाते हुए बड़े ध्यान से देखते थे। एक दिन वे गुरु को बिना बताए चार छोटी-छोटी मूर्तियों को आकार दे दिया। यह देख गुरु भी दंग रह गए। इसके बाद गुरु ने रेशू को पूरी तरह से पेशेवर बनाने की ठानी। गुरु बोल नहीं सकते थे फिर भी इशारों-इशारों में रेशू को दुर्गा, काली और गणेश प्रतिमा बनाने का प्रशिक्षण दिया। एक साल के बाद रेशू को पेशेवर मूर्तिकार बना दिया।

परफेक्ट मेजरमेंट के साथ करते हैं मूर्तियों को तैयार

बकौल रेशू जब वे 15 साल के थे तभी गुरु का निधन हो गया। इसके बाद वे वहां से अपने घर आ गए और घर में ही मूर्ति बनाने का काम शुरू दिया। पहले वे परम्परागत मूर्तियों को बनाते थे, अब समय के अनुसार मूर्तियों में इनोवेशन करने लगे। हर साल कुछ नई स्टाइल में मूर्तियों को तैयार करते हैं। उनका कहना है कि लोगों को यह काम बेहद आसान लगता है। पर ऐसा नहीं। इसके लिए भी आपको एक इंजीनियर की तरह ही सोचना पड़ता है। मूर्ति की साइज, बॉडी मेजरमेंट, फेस शेप, बैकग्राउंड को सही मापदंड के अनुसार ही बनाना पड़ता है। जरा सी चूक हुई तो पूरी मूर्ति का आकार बदल सकता है या फिर मूर्ति बीच से टूट या डिसबैलेंस हो सकती है। जब कलर करते हैं तो उसमें भी रंगों के तालमेल का ख्याल रखना पड़ता है।

खुद का खोल लिया कारखाना
रेशू बताते हैं कि दो साल पहले ही उन्होंने एक छोटा सा कारखाना बना लिया है। इसमें वे हर साल सैकड़ों मूर्तियों को तैयार करते हैं। इन मूर्तियों को कपड़े पहनाने और कलर करने में उनकी बड़ी बहनें साथ देती हैं। उनकी मूर्तियां सतना, सीधी, सिंगरौली, मझगवां और आसपास के क्षेत्रों में जाती हैं।

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