गुमनामी का जीवन जी रही सतना में शहीदों की कॉलोनी, अगल-बगल के लोग भी नहीं जानते

- राज्य शासन ने 14 शहीदों में सिर्फ 4 शहीदों को दे पाई आर्मी क्वाटर
- वो भी जी रहे गुमनामी का जीवन, नौकरी का वादा आज तक नहीं हुआ पूरा
- सिर्फ स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर याद करता है जिला प्रशासन
- गुमनामी के अंधेरे में शहीदों के परिजन, जिला प्रशासन प्रशासन की अनदेखी

सुरेश मिश्रा@सतना/ भारत-पाक 1965 के युद्ध में देश के लिए प्राणों की आहुति देने वाले शहीदों की कॉलोनी शहर में गुमनामी का जीवन जी रही है। आलम है कि अगल-बगल कॉलोनी के लोग भी आर्मी क्वॉटर के बारे में नहीं जानते हैं। दरअसल, 1975 के आसपास तत्कालीन कलेक्टर द्वारा चार शहीदों को दो-दो कमरे का मलेट्री क्वाटर एलाट किया गया था। इसके बाद कई सरकारें आईं और गईं पर शहीद परिवारों की ओर किसी ने मुड़कर नहींं देखा।

जिला प्रशासन को सिर्फ स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर याद आती है, जो शॉल और श्रीफल तक ही सीमित रहती है। सम्मान में मिली शॉल भी ऐसी रहती है कि उसको ज्यादा दिन उपयोग नहीं कर सकते हैं। एक दिन पहले सूचना भेजी जाती है और सरकारी वाहन भेज कर पुलिस परेड ग्राउंड बुलाकर सम्मान करते हुए वापस घर भेज देते हैं।

आंसुओं के साथ बीत रही जिंदगी
1965 में शहीद हुए स्व. बंसराज सिंह बघेल की पत्नी सुखरजा देवी ने पत्रिका को बताया कि वो मूलत: रामपुर बाघेलान के समीपी ग्राम त्यौंधरी की निवासी हैं। जब पति शहीद हुए तो मेरी उम्र 22 वर्ष और उनकी 25 वर्ष थी। बेटा एक साल का और बेटी दो साल की। उस समय मेरे पति की आर्मी में दो से ढाई साल की ही नौकरी थी। मेरे कंधों पर ही परिवार का जिम्मा था। बड़े जेठ भी आर्मी में थे, इसलिए समय-समय पर मदद मिलती गई। पति की मौत के बाद जिंदगी आंसुओं के साथ बीत रही है।

जब अचानक कैंसिल हो गई थी छ्ट्टी
शहीद की पत्नी ने बताया कि जब भारत-पाक का युद्ध शुरू हुआ तो सबकी छुट्यिां अचानक से कैंसिल हो गईं थीं। घर से जवानों को अचानक बुला लिया गया था। वो जाते समय बोले थे कि सरहद में युद्ध भयंकर तरीके से छिड़ा हुआ है, क्या पता लौट कर आऊं या न आऊं?

18 दिन बाद मौत की खबर, वहीं कर दिया था अंतिम संस्कार
शहीद की पत्नी बताती हैं 1965 के युद्ध में हजारों सैनिक शहीद हुए थे। इसलिए उस समय तार 18 दिन बाद मिला था। भयंकर लड़ाई के बीच जब सरहद पर कई दिनों तक शव बाहर नहीं आए तो वहीं पर अंतिम संस्कार कर दिया गया था। उस दौरान कलेक्टर सिर्फ एक हजार रुपए की सहायता दिए थे। बाद में जेठ शव की तलाश में जम्मू कश्मीर गए तो सिर्फ सेना प्रशासन ने कपड़े दिए थे।

शहीद कॉलोनी सिंधी कैम्प के निवासी
1. बंसराज सिंह बघेल शहीद 7 सितंबर 1965 निवासी त्यौंधरी गांव, पत्नी सुखरजा देवी
2. दुर्गा प्रसाद पयासी शहीद 1971 निवासी बगहा, पत्नी क्रिमिया
3. रामपाल सिंह परिहार शहीद 7 सितंबर 1965 निवासी मांधवगढ़ मौहार, पत्नी रामपति
4. सुग्रीम चौधरी शहीद 7 सितंबर 1965 निवासी कटरा मौहारी, पत्नी जानकी चौधरी

एक नजर में
- 7 सैनिक शौर्य पारितोषिक
- 14 शहीद
- 2791 पूर्व सैनिक
- 422 सैनिकों की विधवा पत्नियां

रिटायर्ड सैनिकों की संख्या
- थल सेना 2697
- जल सेना 62
- वायु सेना 32

तीनों सेनाओं की विडो पत्नियां
- 410 थल सेना
- 8 जल सेना
- 4 वायु सेना

Story of Martyrs Colony in Satna 4 soldiers martyred in Indo-Pak 1965
patrika IMAGE CREDIT: patrika
suresh mishra Reporting
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