scriptStubble is becoming a problem in Madhya Pradesh too | खेती के बदले तरीके से मध्यप्रदेश में भी पराली बन रही समस्या | Patrika News

खेती के बदले तरीके से मध्यप्रदेश में भी पराली बन रही समस्या

लेबर की कमी से हार्वेस्टर का बढ़ता उपयोग और कृषि यंत्रीकरण में विभागीय उदासीनता बड़ा कारण

प्रदेश में सर्वाधिक मामले सिवनी जिले में, रीवा संभाग में सतना जिले में नरवाई जलाने के सर्वाधिक मामले

सतना

Published: November 08, 2021 09:43:01 am

सतना. खेतिहर मजदूरों की संख्या में तेजी से आई कमी और कृषि यंत्रों में तेजी के चलते मध्यप्रदेश में खेती के परंपरागत तरीके बदल रहे हैं। इससे किसानों को तो लाभ हो रहा है लेकिन दूसरी ओर किसानों के खेतों की उर्वरता तेजी से प्रभावित हो रही है वहीं पर्यावरण में वायु प्रदूषण भी तेजी से बढ़ है। इसकी वजह है पराली का संकट। पराली (नरवाई) के संकट से निपटने के लिये किसान आसान उपाय इसे जलाना मानते हैं। यही वजह है कि मध्यप्रदेश में भी अब पराली का संकट काफी बढ़ गया है। हालात यहां तक पहुंच गये हैं कि शासन ने इस मामले में दखल देते हुए कलेक्टरों और कृषि अधिकारियों को आगाह किया है। मध्यप्रदेश में पराली के अब तक के सर्वाधिक 675 मामले सिवनी जिले में सामने आए हैं तो रीवा संभाग में सबसे ज्यादा 60 मामले सतना जिले में सामने आए हैं।
खेती के बदले तरीके से मध्यप्रदेश में भी पराली बन रही समस्या
Stubble is becoming a problem in Madhya Pradesh too
खेतिहर मजदूरों की कमी

एक दशक पहले तक ज्यादातर फसल की कटाई खेतिहर मजदूरों के माध्यम से होती थी और गहाई में भी वही काम करते थे। लिहाजा धान के सीजन में पुआल आसानी से उपलब्ध हो जाता था जो न केवल पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल होता था बल्कि इसका उपयोग कंडे पाथने सहित अन्य ईंधन के रूप में होता था। लेकिन विगत कुछ साल से खेतिहर मजदूरों की कमी के चलते किसान के लिये कटाई बड़ी समस्या बन गई है। अगर मजदूर मिलते भी है तो उनकी मजदूरी इतनी ज्यादा है कि किसान की कमाई पर असर पड़ता है। उधर कृषि यंत्रीकरण के कारण हार्वेस्टर आसानी से गांव-गांव तक पहुंच बन चुके हैं। लिहाजा अब 40 फीसदी तक कटाई इसी पर निर्भर हो गई है।
डंठल बने समस्या

हार्वेस्टर फसल की कटाई उपरी बाली वाले हिस्से में करता है और नीचे डंठल का पूरा हिस्सा छोड़ देता है। इस वजह से पूरी फसल खेत में खड़ी रह जाती है। मजदूरों द्वारा हाथ से की जाने वाली कटाई में फसल नीचे से काटी जाती थी। नीचे से कटाई होने के कारण आसानी से जुताई में फसल के डंठल नष्ट हो जाते थे। लेकिन हार्वेस्टर की कटाई से बचे डंठल को जुताई से नष्ट नहीं किया जा सकता है। ऐसे में किसान इन्हें जलाकर अगली फसल के लिये खेत खाली करते हैं। इसका असर यह है कि नरवाई जलाने के मामले बड़ी तेजी से बढ़ने लगे हैं।
सेटेलाइट मॉनीटरिंग शुरू

इसको देखते हुए भारत सरकार की संस्था आईसीएआर-क्रीम्स ने पराली जलाने की घटनाओं की सेटेलाइट मॉनीटरिंग शुरू कर दी गई है। इसके साथ ही कलेक्टर और कृषि विभाग के अधिकारियों को जानकारी से सतत अपडेट कराया जा रहा है।
यह है पराली जलाने की स्थिति

धान के सीजन में पराली जलाने के मामले को अगर देखें तो सबसे ज्यादा 864 मामले जबलपुर संभाग में सामने आए हैं। अन्य संभागों में भोपाल में 169, चंबल में 152, ग्वालियर में 190, इंदौर 14, नर्मदापुरम 549, रीवा 79 और सागर संभाग में 66 मामले पराली जलाने के सूचीबद्ध हुए हैं।
ये हैं टॉप फाइव जिले

पराली जलाने में सबसे आगे रहने वाले टॉप फाइव जिलों में सिवनी 675, होशंगाबाद 521, श्योपुर 102, दतिया 83 और सीहोर 64 है। 50 से ज्यादा पराली जलाने के मामले जहां दर्ज हुए हैं उनमें सीहोर, दतिया, ग्वालियर, जबलपुर, मंडला, सिवनी, होशंगाबाद, सतना जिले शामिल हैं।
रीवा संभाग की स्थिति

रीवा - 17

सतना - 60

सीधी - 02

सिंगरौली - 00

यह है पराली जलाने से नुकसान

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली की सूक्ष्म जीव-विज्ञान संभाग की रिपोर्ट के अनुसार, धान के पुआल को जलाने से एक बहुत बड़ी आर्थिक हानि होती है, क्योंकि इसमें लगभग 51.76 प्रतिशत आर्गेनिक कार्बन, 0.65 प्रतिशत नाइट्रोजन, 0.20 प्रतिशत फस्फोरस और 0.30 प्रतिशत पोटाश होता है। इसे जलाने से पौषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। साथ ही फसल को लाभ पहुंचाने वाले वैक्टीरिया और जीव जन्तु भी नष्ट हो जाते हैं। दूसरी ओर इसके कारण बहुत ही जहरीली गैसें जैसे कार्बनडाइऑक्साइड, कार्बनमोनोऑक्साइड, नाइट्सऑक्साइड, मीथेन, बैंजीन और एरोसोल निकती है। ये गैसें हवा में मिलकर उसे प्रदूषित कर देती है और पूरा वातावरण दूषित हो जाता है। इससे कई बीमारियां जैसे त्वचा, आंखों की बीमारी, सांस-फेफड़े की बीमारियां फैलती हैं।
विभाग भी जिम्मेदार

इसके लिये कृषि और पंचायत विभाग संयुक्त रूप से जिम्मेदार है। पराली से कंपोस्ट खाद बनाई जा सकती है लेकिन कृषि विभाग इस दिशा में कोई प्रयास नहीं करता है तो कस्टम हायरिंग केन्द्रों में धान की खड़ी फसल से पुआल बनाने वाले कृषि यंत्रों को भी प्रचारित नहीं कर सका न, ही ऐसी व्यवस्था कर सका। मनरेगा में बनी गौशालाओं में भी पशुओं के लिये चारे का प्रबंध इसके माध्यम से किया जा सकता है। लेकिन यह भी नहीं किया गया।

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