शहीद पदमधर सिंह : तिरंगे के लिए सीने पर खाई थी गोली

By: suresh mishra

Published: 12 Aug 2016, 12:55 AM IST


सतना।
देश में अंग्रेजों की दास्ता से मुक्त करवाने में न जाने कितने भारतीय वीर सपूतों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। विषम परिस्थतियों  का सामना करते हुए स्वाधीनता संघर्ष को आगे बढ़ाते रहे। इन्हीं वीरों में अमर शहीद लाल पद्मधर सिंह भी हैं। जिनका जन्म सतना के कृपालपुर में 14 अक्टूबर 1913 को हुआ। संपूर्ण जीवन स्वाभिमान से भरा था। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि, जीवन की सुख-सुविधाएं तथा क्रांति दोनो मार्ग भिन्न हैं।

स्वर्गीय मेजर महेन्द्र सिंह(भतीजे) के अनुसार, पद्मधर सिंह विद्यार्थी जीवन से ही स्वाभिमानी थे। विषम परिस्थतियों में भी चरित्रबल डिगने नहीं दिया। एक बार हाईस्कूल में अध्ययन के दौरान प्रयोगशाला में भौतिक उपकरण प्रिज्म चोरी हो गया। कश्मीरी प्रधानाध्यापक एसके टोपे ने चोरी का आरोप लगाकर कमरे की तलाशी ली। किन्तु  न पाकर टोपे परेशान हुए। लेकिन आत्मसम्मान में आघात पद्मधर सिंह स्वीकार न कर सके। उन्होंने टोपे को गोली मार दी। सात साल कारावास की सजा हुई। रीवा जेल जाना पड़ा। यहां पर परिचय गुढ़ स्कूल के हेडमास्टर हनुमंत प्रसाद से हुआ। जिनके सहयोग से जेल में हिन्दी विशारद उत्तीर्ण किया। लगन के कारण हाईस्कूल भी पास हुए। अच्छे आचरण और व्यवहार से कारावास घटाकर तीन साल कर दिया गया। इसके बाद प्रयाग विश्वविद्यालय चले गए। अन्य निकटतम मित्र स्व. लखन प्रताप सिंह 'उर्गेशÓ निवासी कटिया(रिटायर्ड विक्रयकर आयुक्त) के अनुसार, पद्मधर सिंह खादी का कुर्ता एवं पैजामा पहनते थे। साहित्य में गहरी रुचि थी। राजपूत प्रभात नामक हस्तलिखित पत्रिका का शुभारंभ किया। मौलिक कहानियां परिवर्तन, मित्रता, पड़ोसी, बहते हुए तिनके, दरबार इंटरमीडिएट कॉलेज की पत्रिका में प्रकाशित हुए।

अमकुईं के पूर्व सरपंच मोतीमन सिंह के अनुसार, पद्मधर सिंह डॉक्टर बनना चाहते थे। इसलिए इंटर में विज्ञान विषय चुना। नया विषय होने से एक वर्ष नष्ट करना पड़ा। विचार की दृढ़ता से सफलता मिली। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष स्व. शिवानंद के अनुसार, संवेदनशील व्यक्ति जब असामान्य एवं अमानवीय वातावरण में विकसित होगा तो उसके संवेदनशील स्नायुओं को क्षति पहुंचेगी और उस अमानवीय व्यवहार के विरुद्ध संघर्ष के लिए तैयार हो जाएगा। अंतिम पत्र 81 हिन्दू बोर्डिंग विश्वविद्यालय इलाहाबाद से लिखा था, उसमें तत्कालीन घटनाओं से मानसिक उहापोह और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना को दर्शाता है। पत्र डॉ. लक्ष्मीकांत मिश्रा(संयुक्त संचालक स्वास्थ्य) को इलाहाबाद से 7 अगस्त 1942 को लिखा गया। जो 11 अगस्त को पूर्ण हुआ और 12 को वे शहीद हो गए।


पत्र के प्रमुख अंश
'देश की आवाज बलिबेदी की ओर बढऩे के लिए पुकार रही है। हमारे नेताओं की यह आखिरी तैयारी है, अंतिम लड़ाई है और अंतिम आह्वान है। शायद बहुतों का अंतिम प्रण है, उन्हें हम नवयुवकों विशेषकर विद्यार्थी जगत से बड़ी आशा है। बूढ़ों को गोलियों का निशाना बनते देखकर हमारे नवयुवक बैठे न रह जाएं, इस वक्त अगर हम पीछे हटते हैं तो धोखेबाज एवं कायर कहलाएंगे। हालात यह हैं कि मेरी गति उस तराजू की तरह हो जाती है जिसके एक पलड़े में कर्तव्य पालन रखा है और दूसरे में सुख और वैभव के मीठे-मीठे प्रलोभन। कभी यह पलड़ा झुकता है तो कभी वह मस्तिष्क में एक क्षण के लिए भी स्थिरता नहीं।

कभी जब मैं देखता हूं उन चुलबुलाती हुई युवतियों को पार्क की मंद-मंद शीतल पवन में घूमते हुए उन युगल जोड़ों को मोटर और बग्घी में चलने वाले उन रईशों को तो इस वैभव की स्वर्णमयी प्रतिमा नाचने लगती है। मैं सोचने लगता हूं कि मुझे ही क्या पड़ी है, यह जीवन के आनंद को त्यागकर इस जलती हुई ज्वाला में कूदूं। दोनों बड़ी समस्याएं मेरे सामने हंै एक में जाने से सुख पर कायरता से दूसरे में जाने से दु:ख है परंतु कर्तव्य पालन के साथ। भाई यह समय कितना बहुमूल्य है घटनाएं इतने जोरों से पलटा खा रही हैं कि उनके साथ-साथ चलना कठिन पड़ रहा है। कल जो बातें सोचकर तुम्हे पत्र लिखा था वह आज के लिए बेकार हैं। कल मंसूबे बांधता था आगे बढऩे से हिचकिचाता था, आज अब उसके लिए अवसर ही नहीं रह गया कि किसी से सलाह लूं।Ó 12 अगस्त को छात्रों ने इलाहाबाद में तिरंगा लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। पुलिस ने आंसूगैस के गोले छोड़े और सभी को सड़क पर लेटने के लिए कहा। हाथ में तिरंगा था इस कारण पद्मधर सिंह ने झुकने से इंकार कर दिया, जिसके चलते पुलिस द्वारा चलाई गई गोली में शहीद हो गए। ' करें हम आओ जतन मादरे वतन के लिए, शहीदे हो गए कितने जवां अमन के लिए।
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