मोबाइल ने खत्म कर दिया 'इतिहास', अब यादों में 'ट्रिन-ट्रिन'

मोबाइल ने खत्म कर दिया 'इतिहास', अब यादों में 'ट्रिन-ट्रिन'
Telephone Day

Jyoti Gupta | Publish: Apr, 25 2019 07:59:18 PM (IST) | Updated: Apr, 25 2019 07:59:19 PM (IST) Satna, Satna, Madhya Pradesh, India

टेलीफोन डे: स्टेटस सिंबल के साथ अपनों को जोड़कर रखने में करता था मदद

 सतना. 'ट्रिन-ट्रिन'..., की आवाज आज भी पुराने लोगों के जेहन में बसी है। आज से 50 साल पहले मोबाइल फोन काम नहीं करते थे। अगर कुछ काम करता था तो वह था टेलीफोन। जिसे हम दूरभाष के नाम से जानते हैं। लोगों को इस घंटी का सारा-सारा दिन इंतजार रहता था। जैसे ही घंटी बजती वैसे ही घर के लोग एक जगह एकत्रित हो जाते और अपनी बारी का इंतजार करते थे। जिन घरों में टेलीफोन होते थे, उनका रुतबा ही समाज में कुछ और होता था। आसपास के लोग उनके यहां अपनों से बात करने के लिए पहुंचते थे। क्योंकि, हर किसी को टेलीफोन लगाने की सुविधा नहीं मिलती थी। बहुत ही जोर शोर, सिफारिशों और वीआइपी कोटे के तहत ही टेलीफोन लगाने की इजाजत मिलती थी। हालांकि सन दो हजार के बाद शहर के घर-घर में टेलीफोन लग गया था। इधर कुछ वर्षों से टेलीफोन का गौरवशाली इतिहास धुंधलाता जा रहा। अब टेलीफोन लोगों की यादों में ही जीवित है।

अपनों को रखता था पास
शहर के महेश मलिक बताते हैं, उनके यहां १९८८ में टेलीफोन लगा था। वह भी वीआइपी कोटे के तहत। हर किसी के घर में टेलीफोन लगवाना अलाऊ नहीं था। हमंे आज भी टेलीफोन की घंटी की आवाज याद है। यह वह घंटी होती थी, जो सबको एक साथ एक ही जगह पर लाकर खड़ा कर देती थी। पर अब जबसे हर हाथ में मोबाइल आ गए हैं लोग अपने-अपने कमरे में बंद हो चुके हैं। आज से तीस चालीस साल पहले अपने रिश्तेदार से मिलने के लिए लोग तरसते थे, क्योंकि आवागमन के इतने अच्छे साधन नहीं होते थे। तब यह टेलीफोन ही हम सबका हमदर्द बनता था। दूर-दराज के रिश्तेदारों से टेलीफोन पर ही बात हो जाती थी।

हम सब होते थे आंनदित

भरहुत नगर निवासी डॉ. एचके अग्रवाल का कहते हैं कि एक समय पर टेलीफोन की बहुत डिमांड थी। उनके यहां 1990 में टेलीफोन लग गया था। जिन घरों में टेलीफोन लगे होते थे वहां आस-पास के लोगों का आना जाना बना रहता था। लोग इस हफ्ते बात करते थे और बातों ही बातों में दोबारा टेलीफोन से बात करने का दिन और समय निर्धारित कर लेते थे। फिर हफ्ते और महीने टेलीफोन का इंतजार करते थे। इसी बहाने आस-पास के लोगों का एक-दूसरे से मिलना भी हो जाता था। टेलीफोन की घंटी आते ही सभी आनंदित हो उठते थे। अब एेसा नहीं है। भले ही मोबाइल के आने से सुविधा बढ़ गई है, कॉल रेट भी कम हो गए पर टेलीफोन उन दिनों स्टेटस सिंबल की तरह काम करते थे।

कनेक्शन लेना टेढ़ी खीर जैसा
खंूथी निवासी शिक्षक राकेश मिश्रा बताते हैं कि बात उन दिनों की है जब टेलीफ ोन परिवार का स्टेटस सिंबल हुआ करता था और कनेक्शन बड़ी मुश्किल से मिलता था। उन्होंने खुद 1992-1993 के समय सतना सासंद के विशेष कोटे से दिल्ली जाकर पत्र लिखवाया था। उन दिनों टेलीफ ोन कनेक्शन लेना टेढ़ी खीर था। तीन से चार साल तट वेटिंग हुआ करती थी। जब कनेक्शन लगा तो सब घर वाले बहुत खुश हुए। टेलीफ ोन की उपयोगिता तो थी ही पर परिवार का स्टेटस सिंबल ज्यादा बन गया था। उस समय खूंथी मोहल्ले में दो तीन ही कनेक्शन हुआ करते थे। आज भी याद है जब कनेक्शन लेना था तो घर तक पांच खंभे लगाकर विभाग वालों ने मेरे घर कनेक्शन किया था। अब तो परिवार के हर सदस्य के हाथ में यहां तक बच्चों के हाथ मे मोबाइल नाचने लगा।

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