नाटक के कैनवास पर रंगमंच का कखग

नाटक के कैनवास पर रंगमंच का कखग
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Jyoti Gupta | Publish: Mar, 27 2019 09:37:48 PM (IST) | Updated: Mar, 27 2019 09:37:49 PM (IST) Satna, Satna, Madhya Pradesh, India

वल्र्ड थ्रियटेर डे : दर्शकों के अभाव में भी हौसला नहीं होता कम

सुविधाओं की कमी के बावजूद विंध्य बघेली नाटक कला को जीवन देते चंद लोग

सतना. समय के साथ रंगकर्मियों की संख्या लगातार कम हो रही है। वहीं दर्शक व प्रशंसक भी सिमट गए हैं। उसके बावजूद कुछ लोग ऐसे हैं, जो पंरपरागत कला को सहेजने में लगे हुए हैं। अपने हुनर के माध्यम से लगातार विंध्य व बुंदेलखंड की नाट्य कला को ऊंचाई देने में नित प्रयास कर रहे हैं। तमाम चुनौतियों के बीच कुछ चेहरे नाट्य कला की पहचान बन चुके हैं। सीधे तौर पर कहें तो वे अपनी कला के माध्यम से नाट्य विधा के कैनवास पर रंग भरने में लगे हुए है। जिससे विंध्य क्षेत्र में ये विधा लगातार समृद्ध हो रही है।

नए चेहरे आ रहे सामने

विगत दो दशक ऐसे थे, जब नए लोगों का नाट्य क्षेत्र में आने में रूचि नहीं दिखा रहे थे। जिसका असर रहा कि दिलीप मिश्रा, पृथ्वीआयलानी, सविता दाहिया, ठाकुर खिलवानी, संजय पांडय, अनिमेश मिश्रा जैसे रंगकर्मी लंबे समय तक संघर्ष करते रहे। लेकिनए इनका संघर्ष बेमानी नहीं गया। समय के साथ रंग कला की दुनिया में नए चेहरों का आगमन हुआ। वर्तमान में धनीराम प्रजापति, जीतेंद्र दीक्षित, इस्तियार खान, ज्योति शर्मा, विवेक मिश्रा, विवेक तिवारी, शुभम बारी जैसे दर्जनों चेहरों पहचान बने हुए हैं।

पुरुस्कार ने बना दिया रंगकर्मी, हुनर ने सिखा दिया निर्देशन करना

रंगकर्मी द्वारिका दाहिया को आज कौन नहीं जानता। 45 वर्षीय द्वारिका ने लगभग देश विदेश में मिलाकर 400 से अधिक नाटक में काम किया है। इतना ही नहीं 100 से अधिक नाटकों का निर्देशन भी अलग अलग स्टेट में किया। द्वारिका ने 60 नाटक का मंचन राष्ट्रीय स्तर भी किया। जिसमें से मुख्य नाटक नागमंडल, जानकी मंडल, भगवद्ज्जुकम, सैया भाएं कोतवाल, भाड़ से आए हैं, महाश्राप, जात ही पूछो साधु की खास रहे। इन नाटकों की वजह से आज द्वारिका दाहिया विंध्य का नाम रास्ट्रीय स्तर पर रोशन कर रहे हैं। द्वारिका बताते हैं कि वह भी साधारण परिवार से हैं। पिता की नौटंकी कंपनी थी। जिसमें वह बचपन में नौटकी देखने जाते। इसी नौटकी से उनमें अभिनय सीखने का जज्बा जागा। फिर स्कूलों में भी नाटक करने लगा। स्कूल में आयोजित होने वाले नाटक में मैंने भाग लिया। यहां मिलने वाला पुरस्कार ने मेरे व्यक्तित्व में निखार ला दिया और इसी के चलते इस विधा में इतनी दूर तक आ गया। दिल्ली एनएसडी ज्वाइन करना चाहता था पर राह आसान नहीं थी। रुपए नहीं थी। परफॉमे्रंस में कमी थी। इसलिए पहले भोपाल गया। फिर काम खोजा। फिर एक थ्रियेटर को ज्वाइन किया। यहां पर रंगविदूषक संस्था की पद्मश्री बंसी कौल से मुलाकात हुई। उन्हीं के मार्गदर्शन में कई छोटे मोटे नाटक में काम करने का मौका मिला। उन्हीं के मार्गदर्शन में द्वारिका को अमेरिका, पेरिस, वेनजुला, भूटान में आयोजित इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल में कई नाटक में मंचन करने का मौका मिला। भोपाल से ही दिल्ली एनएसडी के लिए तैयारी की। सन 2000 में पहले ही प्रयास में दिल्ली एनएसडी में दाखिला मिल गया। तीन साल तक कड़ी मेहनत ही और फेमस कलाकार रंजीत कपूर द्वारा निर्देशित नाटक बेगम का ताकिया में 96 वर्ष के बूढ़े का रोल किया। इसी नाटक से लोकप्रियता मिली। यहां तक का सफर बहुत ही मुश्किलों भरा रहा। मां बाप को छोड़ कर बाहर रहना पड़ा। थ्रियेटर करने के लिए पैसे जुटाने पड़ें, महंगी किताबे पढऩे के लिए लाइब्रेरी में काम किया। तब जाकर यहां तक पहुंचा। फिलहाल द्वारिका सतना में अपना एक आर्ट ग्रुप चला रहे हैं। जिसके माध्यम से नए नए नाटकों का मंचन करते हैं और शहर के युवाओं को भी रंगमंच में काम करने के लिए प्रेरित करते हैं।

प्रतिभा के धनी ने रंगमंच के जरिए मायापुरी में बनाई पहचान

उचेहरा तहसील करही कला गांव निवासी धनीराम प्रजापति 28 वर्ष के हैं। वे बेहद गरीब परिवार से नाता रखते हैं। बचपन से ही इन्हें एक्टर बनने का शौक रहा। पर, गरीबी के चलते इस हुनर को भूल कर सतना में आकर काम करना पड़ा। यहीं से धनीराम ने अपनी 12 वीं की शिक्षा पास की। आजीविका की पूर्ति के लिए इन्हें सतना छोड़कर मुम्बई जाना पड़ा। वहां इन्होंने कई होटल्स में बतौर वेटर काम किया। बात 2011 की है। उनको एयरटेल सुपर अवार्ड फंक्शन में होटल की तरफ से सर्विस देने के लिए भेजा गया। धनी ने यहां लगातार चार दिन तक काम किया। बड़े-बड़े एक्टर्स को देखा तो वे उनके मन में फिर पुराना सपना घर कर गया। फिर क्या, उन्होंने फिर से एक्टिंग की दुनिया में आने की सोची। इसी बीच किसी ने धनी को सतना के अशोक मिश्रा की जानकारी दी और कहा कि अपने शहर वापस जाओ। मुम्बई महंगा शहर है। यहां एक्टिंग सीखना आसान नहीं। इसके बाद धनीराम मुंबई छोड़कर सतना आ गए। यहां उनकी मुलाकात रंगकर्मी सविता दाहिया और द्वारिका दाहिया से हुई। उनके साथ जुड़कर धनीराम ने जीतोड़ मेहनत की। परिणाम रहा कि राष्ट्रीय स्तर पर जानकी मंगल, नागमंडल, जाति पूछो साधु की जैसे नाटक में काम करने का मौका मिला। बीच-बीच में गुरु अशोक मिश्रा, अनिमेष मिश्रा का मार्गदर्शन लेते रहे। धनीराम ने दमोह में आयोजित राष्ट्रीय फेस्टिवल किसान लोककला महोत्सव में खुद का लिखा नाटक खाका खइया: एक प्रेम कथा नाटक का मंचन किया। 2016 में एमएसडी ज्वाइन किया। इसके बाद संजय उपाध्याय, अलोक चटर्जी, कन्हैयालाल जैसे बड़े कलाकारों के साथ बहुत कुछ सीखा। इतने साल संघर्ष करने के बाद अब धनीराम का चयन मोवो चैनल के कुछ एेसे बंधन सीरियल में काम करने के लिए हुआ है। फिलहाल धनीराम मुंबई में इसी नाटक की शूटिंग में व्यस्त हैं। उनका कहना है कि अगर कुछ बनने का जज्बा है तो हर तरह की परेशानियां होने के बाद भी आप अपना मुकाम खोज सकते हैं।धनीराम क हते हैं कि यहां तक पहुंचने में अनिमेष मिश्र और अशोक मिश्र विशेष मार्गदर्शन रहा । मेरे उन सभी गुरुओं का जिन्होंने रंगमंच पर मुझे तरासा और एक अभिनेता के रूप में गढ़ा मुझे और मेरे सभी सहपाठी और जो मेरे साथ रंगमंच में मुख्यरूप से कम किये और हर सम्भव मेरे मदद करते थे, उनका दिल से आभारी हूं। । नूर सिद्दीकी, राम जायसवाल, दिलीप मिश्र, सविता दाहिया, पूजा सेन, नंद किशोर प्रजापति, विकास सोनी, प्रदीप मिश्र, अशोक दीक्षित, सुरेश दाहिया व इंजीनियर तोषण सिंह शिवराज सिंह करही कला व सबसे बड़ा सपोर्ट सतना से जिला प्रजापति संघ का रहा।

एक नाटक ने शुभम को बना दिया हीरो

विराटनगर निवासी 24 वर्षीय शुभम बारी नए रंगकर्मी के तौर पर उभर कर आए हैं। शुभम बताते हैं कि मैंने कभी रंगकर्मी बनने का सोचा ही नहीं था। बात 2015 की है। किसी अखबार में अशोका पैलेस में मंचित होने वाले नाटक की जानकारी दी गई थी। उसे पढ़कर नाटक देखने गया। उस नाटक ने मन-मस्तिष्क में इतना गहरा असर छोड़ा कि इसी विधा में आगे बढऩे की सोचने लगा। फिर कॉलेज में यूथ फेस्टिवल हुआ। इसमें मंचित होने वाले नाटक में उन्होंने अभिनय किया और लोकगीत भी गाया। 2016 में रंगकर्मी द्वारिका दाहिया से मुलाकात हुई। उनका ग्रुप ज्वाइन कर एक्टिंग सीखना शुरू कर दिया। मई 2016 में पहला प्रोफेशनल शो भगवद्ज्जुकम में काम करने का मौका मिला। इसी बीच विट्स कॉलेज की तरफ से आइआइटी गोवाहटी, आइआईटी भूवनेश्वर, आईआईटी गुजरात में खुद से लिखा नाटक संदेह का संदूख का मंचन किया और एक्टिंग भी। इसे लोगों ने खूब सराहा। शुभम कहते हैं कि रंगकर्मी बनना इतना आसान नहीं है। बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं। सबसे पहले तो साहित्य के ज्ञान के लिए किताबें पढऩी पढ़ती हैं। फिजिकली फिट रहने के लिए एक्सरसाइज, आवाज की रियाज करनी होती है। इन सबके लिए हर दिन समय निकलना पड़ता है। नाटक विधा में महारथ हासिल करने के लिए वे हर दूसरे सप्ताह भोपाल जाते थे। वहां भारतभवन में राष्ट्रीय स्तर के नाटक देखते थे। 2017 में शुभम बारी का दाखिला एमपीएसडी में हुआ। यह वह जगह है जहां से पूरी तरह से प्रोफेनल एक्टर तैयार किए जाते हैं। इलाहाबाद पेस्पो राष्ट्रीय कार्यक्रम में 'भाड़ से आए हैं ' नाटक में काम किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित महाउर रंगोत्सव सीधी में नाग मंडल में काम किया। ट्राइबल म्यूजियम में भगवदज्जुकम नाटक में काम किया। एमएसडी से ही गोवाइंटर नेशनल फिल्म फेस्टिवल जाने का मौका मिला। वहां 60 देशों की फिल्मों का आर्टफार्म देखने को मिला। शुभम ने बताया कि वह खुद का ग्रुप तैयार कर शहर के युवाओं के अंदर नाटक के प्रति रुझान लाने का प्रयास करेंगे।

1978 से काम कर रही कखग समिति

सतना के रंगकर्म का इतिहास लगभग 50 वर्ष पुराना है। पहले स्कूल कालेजों तक ही प्रस्तुतियां सीमित थी। वर्ष अठत्तर उन्यासी में प्रख्यात नाटककार लेखक अशोक मिश्र द्वारा जुलूसएरस गंधर्व आदि नाटकों का मंचन किया गया। उन्ही की प्रेरणा से नाट्य संस्था कखग की स्थापना हुयी। दिलीप मिश्र द्वारा 1976 में बाल कलाकारों के साथ पहला नाटक अंधेर नगरी मंचित किया। वर्ष 1978 रायपुर में उनके द्वारा लिखित नाटक रोते हंसते हम के अनेकानेक प्रदर्शन हुए। तथा वे रायपुर के लगभग पंद्रह नाटकों के निर्देशन, अभिनय से जुड़े रहे। सतना में नाट्य संस्था कखग की स्थापना के साथ ही उनके द्वारा लिखित, निर्देशित नुक्कड़ नाटक ठाढ़ दुआरे ***** के अनेक स्थानों पर 172 प्रदर्शन हुए और दो प्रदर्शन पिछले वर्ष रायपुर और भिलाई में किये गए। कखग द्वारा अंधेर नगरी, ठाड़ दुआरे नंगा, रोते हंसते हम, नशा मुक्ती, ताज महल का टेंडर, अजब गज़ब फैसला, भेड़े और भेडिय़े, राम चंद्र का राशन कार्ड, कचरे की हिफ ाजत, टिकिट चेकर रास बिहारी, प्रथम स्मगलर, मौत एक नोटंकी, एक संवेदनशील मामला जैसे नाटकों का मंचन किया गया। कखग समिति द्वारा बाल रंगमंच की प्रस्तुति बीरबल की खिचड़ी, आलू बस्ते जी, हिंदी का भूत, दद्दा मोहि पढ़ें की भी प्रस्तुतिया दी गई।सारंग सेठ, अभिलाष, श्रवण, पारुल, अनिमेष, धनीराम, प्रकाश तिवारी, निखिल जैन, अशोक केवट, सिद्धार्थ, अर्चना, संदीप, राजेश, रावेन्द्र शिवानी, नूर सिद्दकी, अशोक दीक्षित, दिलीप मिश्र इस संस्था से जुड़े कलाकार हैं।

लोक रंगमंच समिति से जुड़ चुके 250 कलाकार
लोक रंग समिति रंगमंचीय और गैर रंगमंचीय विधाओं को साक्षा करने वाली संस्था। रंगकर्मी सविता दाहिया और द्वारिका दाहिया के नेतृत्व में 2012 में इस संस्था का निर्माण हुआ। अब तक इस संस्था से 250 कलाकार जुड़ चुके हैं। इस संस्था में इच्छुक और एक्टिंग सीखने वाले बच्चे और युवाओं को निशुल्क एक्टिंग सीखाई जाती है। स्कूल, कॉलेज के स्टूडेंट्स को नाटक में भाग लेने के लिए प्रेरित कर उन्हें नाटक में एक्टिंग करने का मौका दिया जाता है। संस्था द्वारा 100 से अधिक नाटक का मंचन किया जा चुका है। इसी ग्रुप में एक्टिंग सीखते सीखते आशीष गर्ग मंडी हिमाचल प्रदेश, धनीराम एपीएसडी भोपाल, शुभम बारी एमपीएसडी भोपाल, पूजा सेन का एनएसडी बनारस, एकता परिहार का एमपीएसडी, पूजा मिश्रा का एमपीएसडी , नीरज सेन का आईएफटीआईआई अरुणाचंल प्रदेश और विकास सोनी एनएसडी फाइनलिस्ट के लिए चयनित हो चुके हैं। फिलहाल संस्था द्वारा प्रख्यात लेखक और खुद के द्वारा लिखित नाटकों का मंचन बराबर किया जाता है। नागमंडल, जानकी मंगल, भगवदज्जुकम, सैयां भये कोतवाल, भाड़ से आए है, महाश्राप, जात ही पूछो साधु की का मंचन किया जा चुका है।

 

 

गौर करने वाली बात

1-अब तक शहर में रंगमंच का न होना ?
रंगकर्मी दिलीप मिश्रा का कहना है कि स्मार्ट सिटी सतना में आज भी सुव्यवस्थित प्रेक्षागृह का न होना गम्भीर समस्या है। आर्थिक समस्या भी जटिल है। जिसके कारण नगर में उपलब्ध महंगे प्रेक्षागृहों का उपयोग सम्भव नहीं हो पाता। नगर की शासकीय, व्यापारिक, राजनैतिक, संस्थाओं से सहयोग अपेक्षा है। विंध्य की इस विधा को जीवित रखने के लिए शहर में एकमंच का होना जरूरी है। इस डिजिटल और औद्योगिक युग में शहर में रंगमंच न होना खलता है।

2-थ्रियेटर करना कितना महंगा, कितना कठिन ?

रंगकर्मी अनिमेश मिश्र कहते हैं कि थ्रियेटर करना बिल्कुल भी महंगा नहीं है। इसके लिए शहर में दो संस्थाएं है जो निशल्ुक प्रशिक्षण देती हैं। अगर आप पढ़ाई में अच्छे हैं तो एपीएसडी या फिर एनएसडी के लिए प्रयास कर सकते हैं। स्कॉलरशिप से इसकी पढ़ाई पूरी की जा सकती है। हां यह कठिन जरूर है। थ्रियेटर मेहनत मंागता है। कौशल मांगता है। हुनर मांगता है। अगर आपकी रूचि किताब पढऩे में नहीं है तो तो आप इस विधा में नहीं आ सकते। आप को अगर साहित्य का ज्ञान नहीं तो आप इस विधा में आगे नही बढ़ सकते। फिजकली, मेंटली काम करना होगा। रियाज जरूरी है। इन सबके लिए समय निकलना जरूरी है। थ्रियेटर वक्त भी मांगता है जो जितना वक्त देगा वह इस विधा में उतना ही महारथ हासिल कर पाएेगा।
3- दर्शकों का कितना अभाव ?

रंगकर्मी नूर सिदद्की कहते हैं कि अपने शहर में दर्शकों का बहुत ही अभाव है। यहां नाटक देखने के लिए टिकेट भी नहीं खरीदने पड़ते फिर भी लोग नाटक देखना नहीं पसंद करते। इतने अच्छे और तरह तरह के नाटकों का मंचन किया जाता है फिर भी दर्शक नहीं पहुंचते। नाटक एक एेसी विधा है। जिसमें किसी विषय पर जीवंत प्रस्तुति दी जाती है। इससे बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
4- फिर भी बढ़ रहे रंककर्मी ?

रंगकर्मी अशोक दीक्षित कहते हैं कि शहर में रंगमंच नहीं है। यहां सुविधाएं भी नहीं है। यहां दर्शकों का नाटक के प्रति रुझान भी नहीं है। फिर यहां रंगकर्मी की संख्या बढ़ रही। औद्योगिक करण और डिजिटल युग के चलते रंगमंच के प्रति युवाओं का रुझान बढ़ रहा है। स्कूल और कॉलेज के स्टूडेंट में रंगकर्मी बनने की चाहत दिख रही है।

5- थ्रियटेर बड़े कलाकारों को निकालते हैं ?
प्रख्यात नाटककार लेखक अशोक मिश्रा कहते हैं हम सभी जानते हैं फिल्मों में दो ही तरह से काम करने को मिलता है। एक उसे जिसका रिश्तेदार पहले से फिल्मों में काम कर रहे। दूसरा उसे जिसने किसी अच्छे ड्रामा कंपनी से अभिनय का प्रशिक्षण लिया हो। अनुपम खेर, नसुरुदीन शाह, अक्षय कुमार, शहरूख खान पहले थ्रियेटर आर्टिस्ट थे फिर जाकर फि ल्मों में काम किया। अपने शहर की बात करें तो जीतेंद्र दीक्षित, रजनीश खुन्नर, इस्तियार खान, विवेक मिश्रा, विवेक तिवारी वर्तमान में इसके उदाहरण है।

 

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